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आज के अखबार : ‘सरकार’ का काम सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के जिम्मे, संसद जजों के मामले में उलझी

संजय कुमार सिंह

आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, लावारिस कुत्तों व पशुओं से मुक्त हों सड़कें काटते ही नहीं, हादसों की भी बन रहे वजह। यह सुप्रीम कोर्ट का आदेश है और अखबार के अनुसार, सर्वोच्च अदालत ने दो टूक कहा है, कुत्तों के चलते आखिर कब तक परेशानी झेलेंगे आम लोग। नवोदय टाइम्स और देशबन्धु की लीड हाईकोर्ट के आदेश पर दिल्ली के तुर्कमान गेट से अवैध कब्जे हटाने की खबर है। देशबन्धु के अनुसार, मस्जिद परिसर से अतिक्रमण हटाने के दौरान पुलिस और स्थानीय लोगों में झड़प हुई। यह खबर दि एशियन एज में भी लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड का शीर्षक है, देर रात तोड़-फोड़ (बुलडोजर) अभियान से पुराने शहर (दिल्ली) के पास झड़प। हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड का शीर्षक है, मस्जिद के पास झड़प; अतिक्रमण हटाए गए। द टेलीग्राफ की लीड सुप्रीम कोर्ट के आदेश या इजाजत से इसके खिलाफ तमाम अपीलों और खबरों के बावजूद चल रहे एसआईआर की है। इसके अनुसार, चुनाव आयोग के अधिकारी पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन में नोबल विजेता, मशहूर अर्थशास्त्री, भारतरत्न 92 वर्षीय अमर्त्य सेन के घर पहुंचे और उनके लिए एसआईआर से संबंधित सुनवाई का एक नोटिस दिया। यह मतदाता सूची में नाम के लिए उनके आवेदन में एक ‘तर्कसंगत गड़बड़ी’ के सिलसिले में है। चुनाव आयोग के अनुसार अमर्त्य सेन और उनकी मां की उम्र का अंतर 15 साल से कम है इसलिए नोटिस जारी किया गया है या स्पष्टीकरण चाहिए।

अदालत के आदेश पर जब मस्जिद के पास से अतिक्रमण हटाए गए हैं, मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा है नागरिकों को परेशान करने तथा सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग के ढेरों उदाहरण हैं तब दि इंडियन एक्सप्रेस में आज ही छपी खबर के अनुसार, उत्तर प्रदेश में एसआईआर के तहत लोगों के नाम कटने के बाद भाजपा का लक्ष्य हरेक बूथ में 200 मतदाताओं के नाम जुड़वाना है। प्रक्रिया ऐसी ही लग रही है। ड्राफ्ट मतदाता सूची में जो है सो आपने पढ़ लिया। तथ्य है कि उत्तर प्रदेश में 2.89 करोड़ लोगों के नाम हटाए गए हैं या हट गए हैं। अब जब हर बूथ में 200 लोगों के नाम जोड़ने की योजना है तो देश या उस क्षेत्र की मतदाता सूची नहीं बनेगी असल में भाजपा के मतदाताओं की सूची तैयार हो रही है। जो भी हो, आज की खबरों का यही मतलब है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का उपशीर्षक है, मुख्यमंत्री, राज्य भाजपा प्रमुख मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों के साथ बैठक करेंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि मतदाता सूची से नाम हटाने का अपना नियम है और उन्हें बदले जाने की कोई सूचना नहीं है। एसआईआर में यह सब किया जाना है – कब, कैसे किसने, क्या-क्या तय किया यह बताया नहीं गया है। फिर भी खबरें इसकी नहीं होती हैं। आज भी नहीं हैं। आज जो खबरें हैं उनमें एक यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे एंगमो की याचिका पर सुनवाई होगी। आप जानते हैं कि सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत गिरफ्तार किया गया था। लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग पर हुए आंदोलन के हिंसक होने के बाद आरोप लगा कि उन्होंने प्रदर्शनों को भड़काया। तब से वे जोधपुर केंद्रीय जेल, राजस्थान में हैं।

आज दि एशियन एज में खबर है, सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को मणिपुर की हिंसा से जोड़ने वाले 48 मिनट के पूरे ऑडियो क्लिप की फोरेनसिंक जांच के आदेश दिए हैं। मणिपुर की हिन्सा आप जानते हैं। इससे मुख्यमंत्री का ही संबंध होने की शिकायत है और इससे संबंधित लीक हुए ऑडियो पर कार्रवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ रहा है जबकि दिल्ली दंगे के लिए गिरफ्तार उमर खालिद और शर्जिल इमाम को पांच साल से भी ज्यादा समय जेल में रहने के बावजूद जमानत नहीं मिली। साजिश, हिंसा और नुकसान के मामले में दिल्ली दंगे की तुलना मणिपुर से तो नहीं ही की जा सकती है लेकिन सरकारी (और अदालती) कार्रवाई का यह हाल है। इसी तरह आज खबर है कि जेएनयू कैम्पस में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ नारे लगाने के मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है। इसपर जेएनयू, जमानत, जनवरी पांच, जांच और जेबी पर अच्छी खबर हो सकती है लेकिन अब ऐसी खबरें होती कहां हैं? इन मामलों की चर्चा मैं कल यहां करता रहा हूं। सुप्रीम कोर्ट ने अखलाक और शर्जिल इमाम को जमानत देने के लिए जो तर्क बताये लगभग उसका उल्टा अरविन्द धाम के मामले में सुनाया। कल मैंने उसपर भी लिखा था। अदालत से संबंधित इतनी खबरों के बीच आज एक खबर दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा से संबंधित है। आप जानते हैं कि होली के समय दिल्ली के इनके घर में आग लगी थी और तब घर में नोट जलने की भी खबर थी। इसके बाद इनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था। उन्ही दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव का मामला भी चर्चा में था। 8 दिसंबर 2024 को एक कार्यक्रम में उनके भाषण को लेकर विवाद था। उनकी टिप्पणियाँ कुछ समुदायों के खिलाफ भी मानी गईं। कई लोगों ने इन्हें भेदभावपूर्ण और समुदाय-विशेष के खिलाफ बताया था। इस संबंध में राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाने का प्रयास किया गया था। तबके उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा था कि हस्ताक्षरों के सत्यापन की प्रक्रिया चल रही है। 24 जून 2025 की बिजनेस स्टैंडर्ड की एक खबर के अनुसार, राज्यसभा सचिवालय ने 55 में से 44 सांसदों के हस्ताक्षरों की पुष्टि कर ली थी। कपिल सिबल और नौ अन्य ने अपने हस्ताक्षर की पुष्टि नहीं की थी। असल में वे इस नोटिस पर शीघ्र कार्रवाई को लेकर बेहद मुखर थे और वेरिफिकेशन की ज़रूरत पर सवाल उठाया था। उन्होंने 13 दिसंबर, 2024 को नोटिस दिए जान के बाद मार्च में प्रक्रिया शुरू करने यानी इसमें हुई देरी पर सवाल उठाया था। जाहिर है न्यायमूर्ति यादव के खिलाफ किसी कार्रवाई की सूचना नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में आज छपी खबर के अनुसार, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि (जज को) हटाने के प्रस्ताव के लिए संयुक्त जांच पैनल ज़रूरी है। खबर के अनुसार, जस्टिस वर्मा लोकसभा में पद से हटाने के प्रस्ताव का सामना कर रहे हैं। अदालत ने उनसे पूछा है कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा उनके घर पर पैसे मिलने के आरोपों की जांच के लिए एक कमेटी बनाने से उन्हें क्या नुकसान हुआ। उन्होंने दलील दी थी कि यह राज्यसभा के चेयरमैन से सलाह करके किया जाना चाहिए था। वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि जजों की जांच अधिनियम, 1968 के अनुसार, अगर (किसी जज को) हटाने का प्रस्ताव (संसद के) दोनों सदनों में एक ही दिन पेश किया जाता है, तो जांच कमेटी स्पीकर (लोकसभा अध्यक्ष) और चेयरमैन (राज्य सभा के सभापति) द्वारा संयुक्त रूप से बनाई जानी थी। इस मामले में स्पीकर ने एकतरफा कमेटी बना दी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी खबर के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है, न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने का प्रस्ताव (महाभियोग) ‘खामियों’ (डिफेक्ट्स) के कारण राज्यसभा में स्वीकार नहीं किया गया। खबर के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त 2025 को इसपर कार्रवाई शुरू करने का निर्णय किया था जब ऐसा ही एक प्रस्ताव राज्य सभा में लंबित था।

यहां यह उल्लेखनीय है कि उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा 21 जुलाई 2025 की रात उनके आधिकारिक एक्स अकाउंट पर आया था। आरटीआई कार्यकर्ता अजय वसुदेव बोस ने आरटीआई दायर की थी तो जवाब में राष्ट्रपति भवन ने कहा था, 21 जुलाई को उनसे (धनखड़ से राष्ट्रपति की) मुलाकात की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। गृह मंत्रालय ने कहा था, 22 जुलाई को उपराष्ट्रपति के इस्तीफे की अधिसूचना जारी हुई थी। इससे यह स्पष्ट नहीं हुआ कि उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रपति को इस्तीफा दिया या एक्स की सूचना पर ही अधिसूचना जारी हो गई। यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि इस्तीफा कब स्वीकार हुआ। नए उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन का शपथग्रहण 12 सितंबर 2025 को हुआ। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, “जिस समय राज्यसभा के चेयरमैन ने सदन को प्रस्ताव मिलने की जानकारी दी, उस समय न तो प्रस्ताव की कोई जांच की गई थी और न ही चेयरमैन द्वारा प्रस्ताव को स्वीकार करने के बारे में कोई फैसला लिया गया था। राज्यसभा चेयरमैन द्वारा प्रस्ताव को स्वीकार करने का कोई फैसला नहीं लिया गया और न ही सदन को जानकारी देते समय या उसके बाद उनके द्वारा प्रवेश का कोई आदेश पारित किया गया।” यह बात लोकसभा के सेक्रेटरी जनरल उत्पल कुमार सिंह द्वारा दायर जवाब में कही गई है।

आज द हिन्दू की खबर का शीर्षक ही है, लोकसभा अध्यक्ष के बारे में न्यायमूर्ति वर्मा के दावों से असहमत है सुप्रीम कोर्ट। उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति वर्मा के घर पर नोटो का जखीरा पाए जाने पर कार्रवाई तो जरूर हो रही है लेकिन इस बात की जांच नहीं हुई कि पैसे कहां से आए और अगर न्यायमूर्ति वर्मा के थे तो किन मामालों में मिले होंगे। न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा है कि उन्हें इनकी जानकारी नहीं है यानी पैसे उनके नहीं हैं। लिहाजा, संभव है कि किसी ने पैसे रखवाए हों और आग लगने पर देखे गए और खबर बन गई। बदले में इनकी साख खराब हुई, बदनामी हुई, तबादला हुआ और अब नौकरी जाने की नौबत है। बीच में मध्य प्रदेश के एक मंत्री के मामले में स्वतः संज्ञान लेने वाले एक जज के तबादले और रिटायरमेंट के बाद ईनाम पाए जजों के लिए बीएमडब्ल्यू के प्रस्ताव जैसी खबरें आई हैं। किसी को बदनाम करने और फंसाने के मामलों में अमूमन मीडिया ट्रायल होता रहा है। फिल्म अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती समेत तमाम राजनीतिकों के खिलाफ आरोप साबित नहीं हुए लेकिन मीडिया ट्रायल तो 2जी और कोयला घोटाले में भी हुआ था। यही नहीं, जज बृजगोपाल हरकिशन लोया की संदिग्ध मौत की जांच की जरूरत नहीं है, कहने के लिए यह दलील भी दी गई थी कि अंतिम समय में वे साथी जजों के साथ थे और उन्हें शंका नहीं है तो जांच की जरूरत नहीं है। लेकिन न्यायमूर्ति वर्मा के मामले में उन्हीं का कहा नहीं माना जा रहा है। जो भी हो, अदालतों के फैसले, जजों के तबादले और उनके खिलाफ कार्रवाई के साथ कॉलेजिम सिस्टम पर हमले आदि के साथ मुख्य न्यायाधीश के शपथग्रहण से पहले 272 विशिष्ट नागरिकों में से एक (और पहले नंबर वाले) का खुलासा भी बताता है कि अदालतों में सब ठीक नहीं है। जहां तक सरकार के काम का सवाल है, इंदौर में क्या हुआ कैसे हुआ ठीक से नहीं बताया गया। कितने मरे यह भी छिपाया गया और आज टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है कि ग्रेटर नोएडा के पीने के पानी में सीवेज होने से कई बीमार हैं। भोपाल के तीन क्षेत्रों में भी पीने के पानी के बैक्टीरिया होने की खबर है। सरकार की तमाम बड़ी-बड़ी बातों के बीच तथ्य यही है कि नागरिकों को पीने का साफ पानी भी उपलब्ध नहीं है। 

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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