महेश शर्मा-
हालांकि मैंने सहारा ग्रुप में कभी काम नहीं किया। पर एक पत्रकार के नाते जुड़ाव रहा। वहां के ज्यादातर पत्रकार मित्र हैं। आज भी हैं। शान-ए-सहारा से राष्ट्रीय सहारा तक : एक मीडिया साम्राज्य ऐतिहासिक यात्रा मेरी नजरों के सामने गुजरी है।
हिंदी और उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में ‘शान-ए-सहारा’ केवल एक साप्ताहिक पत्र नहीं था, बल्कि वह उस विचार की पहली अभिव्यक्ति था, जिसने आगे चलकर सहारा मीडिया समूह को जन्म दिया। इसमें तड़ित कुमार, विनय श्रीकर, कमलेश त्रिपाठी (गोरखपुर वाले), रामेश्वर पांडेय, विजय शंकर, पंकज आदि।
यह वह दौर था जब पत्रकारिता मिशन और व्यवसाय के बीच डगमगाती हुई खड़ी थी, और नए प्रयोगों के लिए जोखिम उठाने का साहस कम ही लोग कर पा रहे थे। यह साप्ताहिक अखबार जब मीडिया क्षेत्र में आया, तब उद्देश्य केवल प्रचार या मुनाफा नहीं था, बल्कि एक ऐसा मंच तैयार करना था जो आम आदमी की आवाज़ बन सके। ज्यादातर पत्रकार वाम विचारधारा वाले थे। इसी सोच के साथ शान-ए-सहारा की शुरुआत हुई। यह साप्ताहिक पत्रिका सामाजिक मुद्दों, राजनीति, साहित्य और सांस्कृतिक विमर्श को साथ लेकर चली।
उस समय हिंदी और उर्दू के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी थी। शान-ए-सहारा ने इस दीवार को तोड़ने की कोशिश की। इसकी भाषा में न तो अतिरिक्त भारीपन था, न ही सतहीपन, बल्कि एक आत्मीय संवाद था, जो पाठक को सीधे संबोधित करता था।
शान-ए-सहारा की लोकप्रियता ने यह संकेत दे दिया कि पाठक एक वैकल्पिक पत्रकारिता की तलाश में हैं। इसी आधार पर आगे चलकर राष्ट्रीय सहारा (हिंदी दैनिक) और रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा (उर्दू दैनिक) का प्रकाशन शुरू हुआ। यह केवल विस्तार नहीं था, बल्कि एक नए किस्म की मीडिया संस्कृति की स्थापना थी।
इन अखबारों ने सत्ता के गलियारों से लेकर कस्बों और गलियों तक की खबरों को स्थान दिया। शुरुआती वर्षों में सहारा की पहचान एक ऐसी मीडिया संस्था के रूप में बनी, जो न केवल समाचार देती थी, बल्कि बहस भी खड़ी करती थी। प्रिंट मीडिया में पहचान बनाने के बाद सहारा समूह ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कदम रखा। सहारा समय चैनलों की श्रृंखला शुरू हुई। क्षेत्रीय पत्रकारिता को राष्ट्रीय स्क्रीन पर लाने का यह प्रयोग अपने समय में महत्वपूर्ण था। कई छोटे शहरों के पत्रकारों को पहली बार टीवी के ज़रिये पहचान मिली।
पत्रकारिता और सत्ता के बीच एक जटिल रिश्ता की कहानी भी यह बयान करता है।
सहारा मीडिया का इतिहास केवल उपलब्धियों का इतिहास नहीं है। समय के साथ सत्ता, पूंजी और मीडिया के रिश्ते जटिल होते गए। जिस निर्भीकता और वैचारिक स्पष्टता के लिए सहारा जाना जाता था, वह धीरे-धीरे दबावों में घिरती चली गई। फिर भी यह सच है कि एक दौर तक सहारा मीडिया ने मुख्यधारा के विमर्श को चुनौती दी।
कानूनी, आर्थिक और प्रबंधकीय संकटों ने सहारा समूह की जड़ों को हिला दिया। मीडिया संस्थान भी इससे अछूते नहीं रहे। कई प्रकाशन बंद हुए, चैनल ठहर गए, और एक समय का विशाल मीडिया समूह इतिहास के पन्नों में सिमटता चला गया।
लेकिन ‘शान-ए-सहारा’ की ऐतिहासिक भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उसने यह साबित किया कि एक साप्ताहिक पत्र भी बड़े सपनों की नींव बन सकता है। सहारा मीडिया समूह की कहानी भारतीय पत्रकारिता में उस सपने की कहानी है, जो ऊँचाइयों तक पहुँचा और फिर अपने ही बोझ से टूट गया।


