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सुख-दुख

विशेष असाइनमेंट मिलने पर गोपेश पाण्डेय मेरी कॉपी पास किया करते थे- शशि शेखर

शशि शेखर-

कल यानी रविवार 11 जनवरी की सुबह साथी रजनीश त्रिपाठी का संदेश मिला-गोपेश पांडेय जी का आज सुबह वाराणसी में निधन हो गया। इतवार की सुबह भला इतनी मनहूस कैसे हो सकती है! तब से अब तक अपने साथ उनकी फोटो तलाश रहा हूँ। करूँ क्या? मेरी तबियत ही ऐसी लापरवाह है कि मैंने अपने पुराने लेख और फोटो सिलसिलेवार तरीके से नहीं सँजोये। फोटो न मिलनी थी न ही मिली।

गोपेश पांडेय ‘आज’ में मेरे सीनियर थे। मैं कब मिला था उनसे पहली बार? वह 1980 के सितंबर महीने का आखिरी हफ्ता था। मैं अपने समूचे करियर के अकेले प्रोफेशनल बॉस राममोहन पाठक जी के पास बैठा था। दरवाजे की ओर मेरी पीठ थी। अचानक पाठक जी के चेहरे पर मुस्कान तैरी और उन्होंने किसी शख्स के नमस्कार का जवाब दिया। पल-दो पल में एक लम्बा सा नौजवान सामने था। हल्का सा श्याम वर्ण, सूती हुई काया, ऊपर की ओर ऐंठी मूंछे और नुकीली आंखो से छनकर बाहर आती गहराई। आँखें हैं या एक्स रे मशीन, दिमाग में उभरा था।

पाठक जी ने परिचय कराया-ये गोपेश पांडेय हैं हमारे चीफ रिपोर्टर।

मैं गोपेश जी की सीधी मातहती में कभी नहीं रहा लेकिन विशेष असाइनमेंट मिलने पर वे मेरी कॉपी पास किया करते थे। एक बार उन्होंने कहा था कि यदि आपको अच्छी हिंदी सीखनी है तो मेरी रिपोर्ट और भास्कर का कॉलम पढ़ा करें। विद्या भास्कर जी अवकाश प्राप्ति से पूर्व ‘आज’ के संपादक हुआ करते थे और उनकी भाषा का नुकीलापन लोगों के रोंगटे खड़े कर देता था। खुद-ब-खुद भास्कर जी से अपनी तुलना मुझे अजीब लगी थी लेकिन यह सच है कि वे कॉपी जांचते समय बेहद सतर्क और सचेष्ट रहा करते थे।

उस दिन कहाँ मालूम था कि अगले 20 वर्ष अब हम इसी संस्थान में साथ काम करेंगे और अक्सर मिलना हुआ करेगा।

वाराणसी में मैं बहुत दिन नहीं रहा। पाठक जी ने मेरा तबादला कुछ दिनों के लिए इलाहाबाद किया और फिर अगले छह साल वहीं रहना हुआ। इलाहाबाद में ही भैया यानी शार्दूल विक्रम गुप्त जी ने मुझे जीवन का पहला संस्करण निकालने का काम सौंपा। गोपेश जी आने वाले कई वर्ष काशी में चीफ रिपोर्टर बने रहे और बाद में वे लखनऊ के राजनीतिक ब्यूरो स्थानांतरित कर दिए गए। कभी मुलाकात होती तो वे पहले जैसी सहजता से मिलते। ‘मूड’ में होने पर मैंने उसने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों, राजनीतिज्ञों, साहित्यकारों और नामचीन हस्तियों की अन्तरंग जिंदगियों के तमाम किस्से सुने।

मैं जानता था, मैं मानता हूँ कि उन्होंने जो कुछ भी बोला सोच- समझकर बोला और सही ही बोला होगा। अपनी बात पूरी ताकत से कहना और लिखना गोपेश जी की शख्सियत में शुमार था।

वे उन दिनों चीफ रिपोर्टर बने थे, जब ‘आज’ पीढ़ीगत परिवर्तन से गुजर रहा था। भैया ने कुछ दिन पहले विरासत सम्हाली थी। उनके दिमाग में इंडियन एक्सप्रेस की तरह हिंदी का सबसे बड़ा और बहु संस्करणीय अखबार निकालने की योजना पक रही थी। हम जैसे तमाम नौजवान इसी मकसद से बीएचयू से सीधे भर्ती किए गए थे लेकिन यह कहानी फिर कभी। गोपेश जी पर लौटते हैं।

उन दिनों ‘आज’ में एक बड़ी लॉबी मानती थी कि राममोहन पाठक जी ने अखबार का सत्यानाश कर दिया है और गोपेश जी उनके प्रमुखतम सहयोगी है। इसके उलट पाठक जी ने ‘धर्मयुग’ की नौकरी छोड़कर ‘आज’ में इस जज्बे के साथ काम शुरू किया था कि वे बदलते वक़्त के लिए मौजूं अखबार बनाएंगे। उनके नेतृत्व में ही ‘अवकाश’ पत्रिका शुरू हुई थी। साधनहीनता के बावजूद इसके तमाम अंक ‘रविवार’ से टक्कर लेते। पाठक जी भैया के सेनापति थे और इस नाते उन्हें दोस्तों के शहर में दुश्मनों के तीर खाकर भी चुप रहना पड़ता था। दुश्मन भी ऐसे जो उनके साथ काम करते थे।

गोपेश जी सब जानते थे। उन्हें मालूम था कि मिठास पगी दुआ-सलाम करने वाले कौन लोग उनके निंदक हैं लेकिन उन्होंने कभी मुचेटा नहीं लिया। उन दिनों हमारे एक अति वरिष्ठ सहयोगी हुआ करते थे। उनके पुत्र भी आज मैं काम करने लगे थे। उन्हें रह-रहकर संदेह हो उठता कि अखबार में कोई गलती छप रही है।

इसके लिए वह कभी-कभी आधी रात घर के रास्ते से लौट आते। काम के दौरान भी वे अतिरिक्त सतर्कता बरतते। इसे सद्गुण माना जाना चाहिए था लेकिन कुछ लोग उनका मजाक उड़ाते। मजाक उड़ाने वाले भी हम लोगों से काफी सीनियर थे। एक दिन गोपेश जी के सामने किसी ने कुछ ऐसा कहा जो हमारे उन बुजुर्गवार के लिए अनुचित था। गोपेश जी ने आवाज़ थोड़ी ऊंची जरूर की लेकिन अंदाज उत्तेजना रहित रहा। वे बोले कि आगे से आप ऐसा न करें। इस पर दूसरे वरीष्ठ सहयोगी ने कहा कि आपके मातहत काम करने वाले एक साहब रोज़ ऐसा करते हैं और मैं उन्हें बहुत मारूंगा। गलत बात गोपेश जी को कहाँ बर्दाश्त होती!

उन्होंने सख्त अंदाज में कहा कि आप इन्हें मारेंगे और हम लोग देखते रहेंगे? सामने वाला सहम गया था। चाहूं तो ऐसे तमाम उदाहरण दे सकता हूँ लेकिन जैसे चावल का एक दाना परख के लिए पर्याप्त होता है, यह उदाहरण गोपेश जी की पूरी शख्सियत बयां करने के लिए पर्याप्त है।

लखनऊ में उनका भयंकर एक्सीडेंट हुआ था। सिर में गंभीर चोट के बावजूद वे बच गए थे लेकिन उनके व्यवहार में पहले जैसी बात नहीं रह गई थी। पहले मितभाषी हुआ करते थे लेकिन अब बोलते तो बोलते चले जाते। पत्नी के असामयिक निधन के बाद उनकी लौ ईश्वर से लग गई थी। उनके बाबा मशहूर ज्योतिषी थे और अक्सर उनके हवाले से कहते कि जो लिखा है, वही होगा।

कुछ महीने पहले उनका फ़ोन आया था। अपने भाई से संबंधित कोई काम वे मुझे बता रहे थे। उसी दौरान उन्होंने कहा था, शेखर जी, आपकी भाभी के जाने के बाद यही लोग मेरा ख्याल रखते है। अनुज वधु बहुत अच्छी है, ख्याल रखियेगा। मैंने विनम्रता से जवाब दिया था गोपेश जी आपने कह दिया मेरे लिए यही बहुत है।

उनका काम पूरा होते ही उन्हें सूचित भी कर दिया था और उन्होंने भी भरे गले से मुझे धन्यवाद दिया था। जानता नहीं था गोपेश जी, यह आपसे आखिरी बातचीत है। अब आपसे सिर्फ अतीत के गलियारों में मुलाक़ात होगी। हम अक्सर जीवन को बहुत बड़ा मान लेते हैं पर वह उतना बड़ा भी नहीं होता, जैसा हम मान बैठते हैं।

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