संजय कुमार सिंह
अरविन्द केजरीवाल, हेमंत सोरेन के बाद ममता बनर्जी और ईडी के साथ तमिलनाडु में जो हुआ तथा बंगाल में हो रहा है, सब दिलचस्प है। घटिया राजनीति का उदाहरण भी। सुप्रीम कोर्ट में ईडी की अपील डर के कारण हो या सोची समझी चाल का अगला चरण – सरकार कैसे काम कर रही है उसका उदाहरण तो है ही। दिलचस्प यह कि इसमें कुछ नया नहीं है। पुराना पैटर्न ही है।
आज सबसे पहले द टेलीग्राफ की लीड, जो बताती है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बाद अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ईडी के निशाने पर हैं। खबर के अनुसार, एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (प्रवर्तन निदशालय या ईडी) ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि वह सीबीआई को ममता बनर्जी, बंगाल के डीजीपी, कोलकाता पुलिस कमिश्नर और दूसरे अधिकारियों के खिलाफ “चोरी”, “डकैती”, “लूट”, “हत्या की कोशिश” और “घर में जबरन घुसने” जैसे आरोपों में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दे। कोशिश यह दिखती है कि ईडी की न चले तो मामला सीबीआई के हाथ में चला जाए। यह अलग बात है कि पिछले चुनाव से पहले संदेशखाली और सीबीआई खूब चर्चा में रहे। आरजी कार अस्पताल कांड के बाद जो सब हुआ उसमें राजनीति कम नहीं थी। अगर ईडी बंगाल सरकार पर आरोप लगा रही है तो तमिलनाडु सरकार ने उसके अफसरों को गिरफ्तार किया था। अब वह दूध की धुली एजेंसी तो नहीं ही कही जा सकती है। कार्यशैली जो है सो है ही। लाइव लॉ डॉट इन की 24 अक्तूबर 2024 की एक खबर के अनुसार, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की एक पीठ ने ईडी अधिकारी अंकित तिवारी को तमिलनाडु से बाहर जाने की अनुमति मांगने वाली याचिका पर अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए मध्य प्रदेश जाने की अनुमति दी थी। तमिलनाडु के अधिकारियों ने तिवारी को रिश्वत मामले में गिरफ्तार किया था, बाद में उन्हें अंतरिम जमानत भी मिल गई थी लेकिन तमिलनाडु से बाहर मध्य प्रदेश जाने का रास्ता अब बना। हालत यह हो गई है कि केरल के मुख्यमंत्री ने केंद्र की नीतियों के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की है और पक्षपात का आरोप लगाया है। आज द हिन्दू में पहले पन्ने पर सूचना है कि राज्यों की खबरों में एक खबर यह भी है। केरल में भी चुनाव होने हैं।
दि एशियन एज में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में छपी खबर के अनुसार, सीबीआई ने तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) के अध्यक्ष विजय से सात घंटे तक पूछताछ की, फिर बुलाया जाएगा। यह पूछताछ उनकी रैली में भगदड़ मचने से 41 से ज्यादा लोगों की मौत के सिलसिले में हुई है। विजय एक नए-उभरते नेता हैं, जिन्होंने अपने अभिनय करियर के बाद राजनीति में कदम रखा। भारतीय जनता पार्टी जब तमिलनाडु में चुनाव लड़ रही है तो टीवीके का भाजपा के साथ होना, समर्थन देना या सत्तारूढ़ दल तथा भाजपा, दोनों से अलग तीसरी ताकत के रूप में लड़ना – चुनावी नतीजों पर असर डालेगा और भाजपा के रणनीतिकार इसका उपयोग करना चाहेंगे ही। खासकर तब जब टीवीके 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को देखते हुए सक्रिय रूप से चुनावी रणनीति तैयार कर रही है। करूर हादसे के बाद दिल्ली के अखबारों में जिस ढंग से खबर छप रही थी उससे लगता है कि भाजपा की दिलचस्पी इसमें है और नहीं होने का कोई कारण तो नहीं ही है। 14 अक्तूबर 2025 को मैंने यहां लिखा था, “आज एक खबर यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के करुर में भगदड़ की जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया है। …. तमिलनाडु के करुर में भगदड़ की खबर के बारे में मैं शुरू से लिखता रहा हूं यह दिल्ली में ज्यादा छप रही है और इसका कारण यह लगता है कि इसका संबंध विधानसभा चुनाव से है और इसलिए सीबीआई जांच का आदेश और दूसरे मामलों में जांच की जरूरत नहीं समझने का मामला कानूनी नजरिए से जो हो, राजनीतिक दृष्टि से दिलचस्प है…।”
करुर मामले में अभिनेता विजय से पूछताछ की खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में भी है। खबर के अनुसार, विजय ने सीबीआई से कहा है, भगदड़ के लिए तमिलनाडु पुलिस को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। खबर से लगता है कि पूछताछ दिल्ली में हुई। अगर यह सही है तो इसके भी मायने हैं। खासकर तब जब भाजपा पर वोट चोरी या चुनाव चोरी के आरोप हैं। अभी तक इस मामले में जो हुआ है उससे आरोप मजबूत हुए हैं और जवाब नहीं के बराबर है। ऐसे में देशबन्धु की आज की लीड बताती है कि सुप्रीम कोर्ट कानून बनाकर चुनाव आयुक्तों को सुरक्षा देने के मामले की जांच करने को तैयार हो गया है और केंद्र सरकार के साथ-साथ चुनाव आयोग को भी नोटिस जारी करके जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट इस कानून की वैधता का परीक्षण करेगा। इस मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इसे एक महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है। उन्होंने कहा है कि वे इस मामले का परीक्षण करेंगे, देखेंगे कि इस प्रावधान से कोई नुकसान हो रहा है या नहीं और देखेंगे कि क्या संविधान की व्यवस्था के तहत ऐसी छूट दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि फिलहाल स्टे की जरूरत नहीं है …. याचिकाकर्ता संस्था लोक प्रहरी ने दलील दी है इतनी व्यापक छूट तो भारत के राष्ट्रपति को भी नहीं दी गई है।
आप जानते हैं कि इसरो और इसके बहाने राजनीतिक मिशन चला। सफलता का जो प्रचार हुआ उसे वैज्ञानिक उपलब्धि से ज़्यादा “भावनात्मक जीत” या “राजनीतिक उपलब्धि” की तरह पेश किया गया। आज इसरो के पीएसएलवी रॉकेट के रास्ते से भटकने की खबर के साथ यह भी पता चला कि गए साल भी इसरो के दो मिशन फेल हुए थे। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है कि नौ महीनों में दूसरी बार हुआ है और तीसरे चरण की गड़बड़ी में 16 उपग्रह खर्च हो गए। आज जब कई अखबारों में जर्मन चांसलर के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पतंग उड़ाने की खबर और फोटो है तो अमर उजाला के पहले पन्ने की खबर में इसका जिक्र भी नहीं मिला। जो फोटो छपी है उसका कैप्शन भी गौर तलब है, कार में सफर के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और जर्मन चांसलर मर्ज के बीच गर्मजोशी दिखी। दोनों नेता ठहाके लगाते भी दिखे। टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, द हिन्दू और हिन्दुस्तान टाइम्स के साथ नवोदय टाइम्स में भी पतंग उड़ाने की तस्वीर ठीक-ठाक साइज में छपी है।
नवोदय टाइम्स में आज एक और दिलचस्प खबर है, लाडकी बहिन की किस्त जारी करने पर (महाराष्ट्र) राज्य निर्वाचन आयोग की रोक। यह रोक नगर निकाय चुनावों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण लगी है। इससे पहले ऐसी शिकायतें आती रही हैं। पता नहीं अब यह फैसला पहले की शिकायतों के कारण है या इस बार इसकी जरूरत ही नहीं है। जो भी हो, भाजपा सरकार की योजना के पैसे न दिए जाने या रोक दिए जाने का कारण महत्वपूर्ण है। हिन्दुस्तान टाइम्स में आज तीन कॉलम की खबर है, महादेव ऐप्प के फरार संस्थापक रवि उप्पल ने इंटरपोल की रेड नोटिस को हटाने की मांग की। बाईलाइन वाली यह एक्सक्लूसिव खबर नीरज चौहान की है और इसमें कहा गया है, इस मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया। इसी में आगे लिखा है, प्रवर्तन निदेशालय ने पहले ही सीसीएफ (कमीशन फॉर कंट्रोल ऑफ इंटरपोल्स फाइल्स) को एक विस्तृत जवाब भेजा है और उप्पल के दावों का जोरदार जवाब दिया है। तथ्य यह है कि विजय माल्या से लेकर, नीरव मोदी और तमाम लोगों की खबर नहीं है। जब वे भगोड़े घोषित हुए थे तो यह प्रचार किया गया था कि उनकी संपत्ति जब्त हो गई और यह संदेश दे दिया गया कि भारत सरकार ने वसूली कर ली। लेकिन जब तब इन्हें वापस लाने की कोशिश का प्रचार होता है हालांकि अभी तक कामयाबी नहीं मिली है। मेहुल चोकसी को वापस लाने के लिए जेट भी भेज दिया गया था पर वह खाली हाथ लौट आया। इस तरह की खबर रिपोर्टर सूत्र बनाने के लिए भी देते हैं लेकिन अब तो वीबी जीरामजी के विज्ञापन और मनरेगा के नियमों में संशोधन और उसकी खबरों के जरिए पता नहीं किससे सेटिंग होती है।
इंडियन एक्सप्रेस में सरकार का प्रचार करने वाली दो खास खबरें है। पहली आठ कॉलम का बॉटम है। बिहार के डीजीपी ने 2001 से 2025 का डाटा साझा कर बताया कि राज्य में जंगल राज की छवि को बढ़ावा देने वाले परंपरागत अपराध कम हुए हैं। मुख्य शीर्षक है, हत्या से लेकर दंगा, गंभीर हिंसक अपराध दो दशक से ज्यादा समय में सबसे कम हो गए हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि ज्यादातर समय नीतिश कुमार मुख्य मंत्री रहे हैं और अपराध अगर कम हुए हैं तो श्रेय भाजपा को नहीं नीतिश को जाना चाहिए और नीतिश लालू मित्र रहे हैं। दुनिया जानती है कि नरेन्द्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तो नीतिश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने पलटी मारी और दोबारा भाजपा के मुख्यमंत्री हो गए। इसके बाद फिर लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव के साथ मिलकर भाजपा की सरकार बनाई और लालू यादव के रेल मंत्री रहने के दौरान जो भ्रष्टाचार हुआ था उसका मुद्दा आ गया। सरकार गिरी पर पल्टू राम मुख्यमंत्री बने रहे। उस मामले में अब चार्जशीट दायर हुई है लेकिन इस बार का चुनाव जंगल राज के नाम पर लड़ा गया है। यहां पल्टी मारने और प्रचार में छपने वाली खबरों तथा उससे जुड़े तथ्यों को रेखांकित कर रहा हूं। भारतीय जनता पार्टी के शासन का हाल समझने के लिए जानना जरूरी है और इंडियन एक्सप्रेस में ऐसी एक खबर सिंगल कॉलम में है। हरिकिशन शर्मा की बाईलाइन वाली खबर का शीर्षक है, जल जीवन योजना की राशि इस बार 60 प्रतिशत कम कर दी जाएगी।
खबर के अनुसार वित्त मंत्रालय ने जल शक्ति मंत्रालय को इस बारे में सूचना दी है। जल जीवन मिशन (जेजेएम) ग्रामीण पेय जल योजना है और 2025-2026 के बजट में इसके लिए 67,000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। इस योजना के लाभ का प्रचार तो हुआ है लेकिन इंदौर में दूषित पानी से लोगों की मौत के बाद कई शहरों में पीने के पानी के दूषित होने की खबर है और तथ्य यह है कि सरकार ग्रामीण भारत में पानी पिलाने का बंदोबस्त कर रही थी। यह सब इस सरकार की विशेषता है और संभव है पारदर्शिता न होने या मीडिया का दबाव न होने के कारण सरकार की प्राथमिकता जरूरत के अनुसार नहीं होकर प्रचार के लिए तय की जाती रही हो। मैं जमशेदपुर में पीने का साफ-सुरक्षित पानी पीकर बड़ा हुआ हूं और इंदौर जैसा हादसा हो सकता है इसकी कल्पना भी नहीं की थी। जमशेदपुर में पीने के पानी की इस व्यवस्था को कोई प्रचार कभी कहीं नहीं देखा या सुना लेकिन जल जीवन मिशन का प्रचार जरूर देखा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


