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आज के अखबार : बंगाल भिड़ंत में ED के खिलाफ कार्रवाई पर ‘रोक’ सबसे बड़ी या दूसरी बड़ी खबर

इस तरह ईडी के छापे से हेडलाइन मैनेजमेंट तो हुआ ही। गोदी वालों ने बताया कि भाजपा सबसे मजबूत और समय पर ‘अच्छे’ काम करने वाली पार्टी है। ईडी पर सवाल न पहले थे ना अब हैं।

संजय कुमार सिंह

जब सरकार कोई काम ही नहीं कर रही हो तो खबर क्या होगी और जो खबर होगी वही सरकार का काम होगा। आज मेरे सभी अखबारों में लीड या सेकेंड लीड ईडी के खिलाफ पश्चिम बंगाल में कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की रोक की खबर लीड या सेकेंड लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में छोटी सी लेकिन पहले कॉलम की पहली खबर है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक कार्यक्रम में भाग लेंगे जो स्टार्ट अप इंडिया पहल के एक दशक पूरे होने के मौके पर हो रहा है। इसके मुकाबले ईडी के खिलाफ कार्रवाई पर रोक पूरी या स्थायी नहीं है, असल में बंगाल सरकार से जवाब मांगा है और जवाब देने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। एसआईआर पर लगातार कई महीने सुनवाई के बाद भी जब मामला नहीं निपटा है तो ईडी का मामला निपट जाएगा, इसकी उम्मीद मुझे तो नहीं है और मेरा मानना है कि खबर तब होगी जब मामला निपट जाएगा। अभी तो मामला टल भर गया है। इस लिहाज से स्टार्ट अप इंडिया पहल के एक दशक हो गए – बड़ी खबर है और आज इस कार्यक्रम की सूचना बड़ी खबर हो सकती थी। नहीं है तो सिर्फ इसलिए कि इसमें कुछ हुआ नहीं है या बताने लायक नहीं है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से संबंधित सीएजी की रिपोर्ट से पता चलता है कि योजनाएं कैसे चल रही हैं लेकिन सिर्फ प्रचार करना हो तो खबरें ढूंढ़नी पड़ेंगी और हो तो मिले। यही हाल आज अखबारों का है। सरकार जो करती है वह सिर्फ प्रचार होता है। इस लिहाज से सरकार (या प्रचारकों) के लिए यह बताना जरूरी था कि ईडी का छापा सही था। ममता बनर्जी की कार्रवाई गलत थी और सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, जो टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक भी है – ममता से भिड़ंत पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हस्तक्षेप का ईडी का आरोप गंभीर। इस तरह यह संदेश गया कि सरकार (या ईडी) का काम ठीक है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है। वास्तविकता यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने जवाब मांगा है, फैसला होना है। अभी यह टल भर गया है और ईडी जो मांग कर रही थी, वह भी पूरी नहीं हुई है। लेकिन वह खबर नहीं है जबकि वह सामान्य बात नहीं है।   

इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर दो कॉलम में है। शीर्षक है, ईडी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा : ‘गंभीर मुद्दा’, ममता, अधिकारियों को नोटिस। उपशीर्षक है, बंगाल (सरकार) की एफआईआर को स्टे कर दिया, कहा कि आईपैक के सह-संस्थापक के घर पर तलाशी का सीसीटीवी फुटेज रखा जाए। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह तीन कॉलम की खबर है। इसका शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कानून का पालन नहीं होने को रेखांकित किया, पश्चिम बंगाल में छापों पर ईडी की अपील पर सुनवाई की। कोलकाता के द टेलीग्राफ में यह लीड है। शीर्षक है – मुख्य मंत्री, पुलिस प्रमुखों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस। आईपैक मामले पर नजरिया : अगर हम दखल न दें तो कानून व्यवस्था की समस्या होगी। देशबन्धु में यह खबर छह कॉलम की लीड है। शीर्षक है, आईपैक रेड मामले में ममता सरकार को नोटिस। उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर भी रोक लगाई। नवोदय टाइम्स में यह तीन कॉलम की लीड है। शीर्षक है, “ईडी की जांच में बाधा उत्पन्न करना ‘गंभीर’ : सुप्रीम कोर्ट”। अमर उजाला में यह पांच कॉलम की लीड है। शीर्षक है, आई-पैक पर छापा : ईडी अफसरों के खिलाफ पुलिस की एफआईआर पर सुप्रीम रोक। इस तरह, जाहिर है कि छापे की कार्रवाई सरकार के हित में हो या नहीं, जो कुछ हुआ उससे भाजपा को प्रचार मिला, तृणमूल या ममता को बदनाम करने का मौका मिला और उसका लाभ उठाया गया। कोशिश तो हुई ही। इस चक्कर में सरकार का काम मुद्दा ही नहीं बना। यह भाजपा की विशेष राजनीति है जो चल और दिख रही है।

मुझे लगता है कि चुनाव के समय (हालांकि घोषणा नहीं हुई है तो कहा जा सकता है कि चुनाव नहीं है?) एक सरकारी एजेंसी पर भ्रष्टाचार या मनी लांड्रिंग जैसे मामले में छापे जैसी कार्रवाई से बदनामी तो होती ही है और ईडी या सत्तारूढ़ दल की साख ऐसी नहीं है कि वह विपक्षियों या विरोधियों को बदनाम करे। वैसे भी लेवल प्लेइंग फील्ड के लिहाज से सरकार या सरकारी एजेंसियों को अपने इस अधिकार का संयमित उपयोग करना चाहिए। यह अलग बात है कि ईडी की कार्रवाई का पिछला रिकार्ड उसके बारे में कोई अच्छी राय नहीं छोड़ता है लेकिन वह सब सुप्रीम कोर्ट का मामला है। मैं सिर्फ खबरों की बात कर रहा हूं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का इंट्रो है, सुप्रीम कोर्ट ने ईडी के खिलाफ बंगाल पुलिस की एफआईआर को रोक दिया। ठीक है कि इसपर फैसला होना है लेकिन ईडी का आरोप बंगाल के पुलिस अधिकारियों पर भी है जबकि केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई राज्य पुलिस को भरोसे में लेकर की जानी चाहिए थी और संभव है राज्य पुलिस को भरोसे में लिया गया होता तो स्थिति कुछ और होती। कम से कम भ्रम तो नहीं फैलता कि ईडी के लोग राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल पार्टी की चुनावी रणनीति पर कब्जा करने आए थे। वैसे भी ममता बनर्जी छापा शुरू होने के कई घंटे बाद पहुंची और कोई 15 मिनट बाद वहां से निकल गईं। इसलिए आरोप लगाना अलग है पर छापे में उन्होंने बाधा नहीं डाला वे अपनी फाइल लेकर आई हैं। इसके लिए उन्होंने जबरदस्ती की या उन्हें रोका गया – यह सब अदालत को देखना है। खबरों में जो विवरण है उससे बनी राय का कोई खास मतलब नहीं होगा। 

ईडी असल में सरकार की इस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट का नजरिया कानून के आधार पर होगा लेकिन हम तो जानते हैं कि जहां कहीं चुनाव होता है वहां ईडी के लोग पहुंच जाते हैं। विपक्षी नेताओं के ठिकानों पर ही छापा मारते हैं। देश में पहली बार ईडी ने मुख्यमंत्री को गिरफ्तार किया। एक मुख्य मंत्री ने गिरफ्तारी से पहले इस्तीफा दे दिया, लेकिन जांच में मिला क्या? दूसरे कौन से मामले सिद्ध हुए, क्यों नहीं हुए और जो रोक दिए गए उनमें इलेक्टोरल बांड (भाजपा को चंदे) की भूमिका है या नहीं –  इसकी भी जांच होनी चाहिए। इस तरह के मुद्दे उठाना अखबारों का काम है लेकिन दिख रहा है कि अखबार सब जानते हुए भी मन की बात ही करते हैं। सवाल नहीं पूछते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर और हाईलाइट किए हुए अंश के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दूसरे राज्यों में भी अराजकता की संभावना है। यहां मुद्दा यह है कि केंद्रीय एजेंसी का छापा स्थानीय पुलिस के सहयोग से होना चाहिए। अगर केंद्रीय एजेंसी स्थानीय पुलिस को वहां की सरकार का मानती है तो केंद्रीय एजेंसी को भी अपने बारे में सोचना होगा। मुझे नहीं पता कि दूसरा राज्य कौन सा होगा लेकिन वहां भाजपा की सरकार होगी तो छापा पड़ने की संभावना ही नहीं है और नहीं होगी तो स्थानीय पुलिस का सहयोग लेना, सूचना देना – सुप्रीम कोर्ट में मुद्दा है कि नहीं, खबर से नहीं पता चलता है।

खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, इसमें बड़े सवाल शामिल हैं … स्थिति को और खराब करेंगे तथा एक या दूसरे राज्य में अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी, यह देखते हुए कि अलग-अलग राजनीतिक दल अलग-अलग जगहों पर शासन कर रहे हैं… यह सच है कि किसी भी केंद्रीय एजेंसी के पास किसी भी पार्टी के चुनाव काम में दखल देने की कोई शक्ति नहीं है। लेकिन अगर केंद्रीय एजेंसी किसी गंभीर अपराध की ईमानदारी से जांच कर रही है, तो सवाल यह उठता है कि क्या पार्टी की गतिविधियों की आड़ लेकर एजेंसियों को अपना काम करने से रोका जा सकता है? यहां सवाल यही है कि ईमानदारी कैसे तय हो और उसके पिछले काम से किया जाना चाहिए या नहीं। यह सब अदालत में उठेगा और नहीं उठे तो अखबारों में उठना चाहिए। पर मुझे नहीं लगता है कि ईडी का दुरुपयोग अभी मुद्दा बना है। ममता बनर्जी की ओर से पेश होते हुए कपिल सिब्बल ने कहा भी है, अगर आपको (ईडी को) जानकारी मिल जाती है, तो हम चुनाव कैसे लड़ेंगे? इसीलिए पार्टी चेयरपर्सन (ममता) को वहां जाने का अधिकार है। वैसे भी वे वहां छापा शुरू होने के कई घंटे बाद गईं और कुछ मिनट ही रहीं। और यह उनका अपना काम या अधिकार हो सकता है। पार्टी हित में जरूरी तो था ही। अदालत में इसपर चर्चा होगी लेकिन खबरों से नैरेटिव सही बनना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि खबर को निष्पक्ष होकर लिखा जाए। पूरे मामले में सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता की मांग महत्वपूर्ण है, अगर कोई कार्रवाई नहीं की गई तो केंद्रीय बल का मनोबल गिर जाएगा… गलती करने वाले अधिकारियों को सस्पेंड किया जाए ताकि एक मिसाल कायम हो सके… वे धरना नहीं दे सकते और जांच को रोक नहीं सकते। मुझे लगता है कि गलती ईडी अधिकारियों की भी है कि उन्होंने स्थानीय पुलिस को छापे की सूचना नहीं दी। अगर शासन प्रशासन दो हिस्सों में बंटकर काम करेगा तो स्थानीय पुलिस की मजबूरी होगी कि वह स्थानीय आकाओं के लिए काम करे। देश की संघीय व्यवस्था ऐसी नहीं है और जाहिर है यह सब सुप्रीम कोर्ट में देखा जाएगा लेकिन खबरों से लग रहा है कि दोनों को दो अलग टीम मान लिया गया है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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