महाराष्ट्र में भाजपा को सरकार होने का लाभ फिर मिला। इसलिए याद करना जरूरी है कि महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनी कैसे थी। लेकिन अखबारों ने दूसरे गुण गिनाए हैं। सच यह है कि महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनवाने में दलबदल कानून, सुप्रीम कोर्ट और विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका, राज्यपाल का इस्तीफा सबको याद करना बनता है। लेकिन अखबारों ने बताया है, हिन्दुत्व में भरोसा, विकास का एजेंडा लेकर आगे बढ़ेंगे (अमर उजाला), 1996 से चल रहा ठाकरे राज खत्म हुआ (देशबन्धु) और जो पहले नहीं हुआ वो इस बार हो गया (नवोदय टाइम्स)। अंग्रेजी अखबारों में पवार और ठाकरे परिवार का गठजोड़ चुनाव में नाकाम रहा (द टेलीग्राफ), ठाकरे भाइयों पर विजय (इंडियन एक्सप्रेस), परिवारों का साथ आना नाकाम रहा (हिन्दुस्तान टाइम्स), ट्रिपल इंजन सरकार मुमकिन है (टाइम्स ऑफ इंडिया) और अंत में प्रधानमंत्री ने कहा है, जनहित वाले हमारे शासन ने मतदाताओं से तालमेल बिठाया था (दि एशियन एज)
संजय कुमार सिंह
भारतीय जनता पार्टी की सरकार एक-एक कर तमाम किले फतह करती जा रही है। आज मेरे नौ में से आठ अखबारों की लीड बीएमसी चुनाव में भाजपा की जीत की खबर है। द हिन्दू अपवाद है। यहां यह दावा लीड है कि पिछले एक साल में सबसे ज्यादा स्टार्टअप पंजीकृत हुए हैं। यह प्रधानमंत्री का दावा और उसका प्रचार है। खबर में यह नहीं बताया गया है कि यह वृद्धि पिछले ही साल क्यों हुई। मैंने कल यहां बताया था कि स्टार्ट अप इंडिया के 10 साल होने पर कल कार्यक्रम था। आज यह खबर उसी आयोजन की है। इस तरह, चुनाव चोरी, वोट चोरी के आरोपों के बावजूद मुंबई नगर निकाय चुनाव के नतीजे आज दिल्ली ही नहीं कोलकाता के टेलीग्राफ में भी लीड है। चुनाव आयोग की चुप्पी और एसआईआर के तहत जो हो रहा है उससे संबंधित खबरें बताती हैं कि सब सामान्य नहीं है और नियमानुसार तो नहीं ही है। एक जज के खिलाफ कार्रवाई की जल्दबाजी, दूसरे के खिलाफ सन्नाटा भी व्यवस्था के पक्षपात की शंका पैदा करता है। लेकिन अखबारों की खबरों से ऐसा आम पाठक को नहीं लगेगा। एसआईआर से संबंधित तमाम गड़बड़ियों की खबरों के बीच कल सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल था। इसमें जयपुर के हवामहल विधानसभा क्षेत्र में एक बीएलओ आत्महत्या की धमकी दे रहा था। आज यह खबर मुझे अखबारों में नहीं दिखी। पहले पन्ने पर तो नहीं ही है। गूगल करने पर यूट्यूब के लिंक तो मिले पर सरकारी विज्ञापन पाने और प्रचार करने वालों की खबर नहीं है।
एबीपी न्यूज की 15 जनवरी की खबर है, ‘पूरी बस्ती को ही हटा दूं क्या’, जयपुर में बीएलओ के फोन कॉल का वीडियो वायरल, मचा हंगामा। इससे लगता है कि मामला एक दिन पुराना है और खबर कल तो नहीं ही थी आज भी नहीं है। नवभारत लाइव की खबर इस प्रकार है, जयपुर में मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया बड़े विवाद में तब्दील हो गई है। जयपुर के हवा महल विधानसभा क्षेत्र से एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वायरल वीडियो में एक बीएलओ (बीएलओ) और एक अन्य व्यक्ति के बीच फोन पर तीखी बहस हो रही है। इस वीडियो ने मतदाता सूची में नाम जुड़वाने और कटवाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। गूगल करने पर सोशल मीडिया की जो खबरें पहले पन्ने मिलीं पर उनमें एक आजतक की भी है। इसका शीर्षक है, आत्महत्या की धमकी देने वाले बीएलओ कांग्रेसी है, बीजेपी विधायक के दावे से ट्विस्ट। मेरे ख्याल से मामला खबर को ट्विस्ट देने भर का नहीं है और इतना ही हो तो भी क्या खबर कवर करने लायक नहीं है। खासकर तब जब एसआईआर के चक्कर में कई बीएलओ आत्महत्या कर चुके हैं, इस्तीफा दे चुके हैं और अभी हाल में बंगाल से समूहिक इस्तीफे की भी खबर थी। तब यह खबर खासतौर से महत्वपूर्ण हो जाती है। आत्महत्या की धमकी भर की खबर हो या कांग्रेसी होने के कारण हो तो भी। लेकिन इस खबर का नहीं होना साबित करता है कि यह सब सरकार या सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के हित में है। ऐसी शिकायतें आती रही हैं। इस वीडियो से साफ हो रहा है कि एसआईआर के तहत नाम हटाने के लिए दबाव है। नाम पहले भी हटाए जाते रहे हैं।
एसआईआर का मकसद मतदाता सूची का सघन पुनरीक्षण और उसे शुद्ध करना तथा घुसपैठियों या खास समूह के लोगों को बाहर करना भी हो तो जो भारत के नागरिक नहीं हैं या जिनकी नागरिकता संदिग्ध है उनमें अमर्त्य सेन का मामला नहीं आता। आज द टेलीग्राफ में इससे संबंधित खबर का शीर्षक है, (चुनाव आयोग) सर, क्या भारत रत्न होना भारतीय होने का सबूत नहीं है। इसका जवाब यह हो सकता है कि भारतीय होने का है, लेकिन वोटर होने या भारत का निवासी होने का नहीं है। लेकिन सवाल मौजूं है क्योंकि इस मामले में मुद्दा जन्म तिथि (वर्ष) है वह भी अमर्त्य सेन की मां का। भले यह चुनाव आयोग की गलती के कारण हो पर सच्चाई यही है कि आम तौर पर मतदाता वही हो सकता है जो किसी खास चुनाव क्षेत्र में सामान्य तौर पर रहता है। मतदाता सूची को शुद्ध करने का मतलब उसे अद्यतन करना भी होगा और पुराने नियमों से जो अपने सामान्य पते पर नहीं रह रहा है उसका नाम वोटर लिस्ट में नहीं रहेगा। इसे नागरिकता और एनआरसी और 2003 की स्थिति से जोड़कर लोगों को बुरी तरह डरा दिया गया है। नतीजतन शहरों में रहने वाले लोग भी स्थायी पते पर या गांव में मतदाता पंजीकरण करा रहे हैं। दूसरी ओर, हरियाणा में रहने वाले बिहार के मतदाताओं के लिए बिहार चुनाव के समय (फ्री) ट्रेन चलाई गई। इससे भी लोग गांव में मतदाता रहने के लिए प्रेरित हुए और मतदाताओं के लिए एसआईआर का मकसद बदल गया है। दूसरी ओर, जो हो रहा है उसका सिर-पैर नहीं है। उदाहरण के लिए अमर्त्य सेन अगर पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन स्थित अपने पुश्तैनी घर में सामान्य तौर पर नहीं रहते हैं तो उन्हें वहां से वोटर नहीं होना चाहिए। उनका नाम सामान्य तौर पर हटाया जा सकता है। अभी तक का विवाद मुफ्त का है और दूसरी जगह लोगों पर नाम हटाने का दबाव है। सब गड़बड़ है, लेकिन चल रहा है। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है।
दूसरी ओर, टाइम्स ऑफ इंडिया में आज छपी खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, कानून का इस्तेमाल संसद की प्रक्रिया को रोकने के लिए नहीं किया जा सकता है। सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की याचिका खारिज करते हुए यह बात कही है। यह मानते हुए कि जज (जांच) अधिनियम की व्याख्या इस तरह से नहीं की जा सकती कि यह अपने उद्देश्य को ही खत्म कर दे। ऐसा जजों के लिए संवैधानिक सुरक्षा खुद हटाने की प्रक्रिया को पंगु बनाने की कीमत पर नहीं हो सकता है। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने अपनी याचिका के जरिए उन्हें हटाने के प्रस्ताव पर एक समिति नियुक्त करने के लोकसभा स्पीकर के फैसले को चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा कि स्पीकर ने कोई गैरकानूनी काम नहीं किया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि राज्यसभा के उपसभापति प्रस्ताव नोटिस को स्वीकार करने से इनकार करने के लिए सक्षम थे, लेकिन उसने कहा कि सचिवालय स्तर पर जिस तरह से प्रस्ताव नोटिस पर कार्रवाई की गई, वह कानून के तहत सोची गई भूमिका से पूरी तरह मेल नहीं खाता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि, यह तुरंत स्पष्ट नहीं है कि राज्यसभा महासचिव ने किस आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि प्रस्ताव नोटिस ‘सही क्रम में’ नहीं था… महासचिव की भूमिका नोटिस को सक्षम प्राधिकारी, यानी अध्यक्ष के कार्यालय के सामने रखने तक सीमित थी, बिना इसकी स्वीकार्यता के बारे में कोई निष्कर्ष व्यक्त किए।
कहने की जरूरत नहीं है कि मामला जज का है, फैसला जज का है उसमें किसी बाहरी को कुछ कहने की जरूरत नहीं है। उसमें भी मैं कानूनी मामले नहीं जानता लेकिन जज की सुरक्षा और संवैधानिक प्रक्रिया का मामला है और खबरों से लग रहा है कि जज पर जो आरोप हैं वो फंसाने के लिए लगाए गए हो सकते हैं। इसमें जज की सुरक्षा कौन करेगा, संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या से ही यह संभव है। और जैसा कहा जाता है, दोषी बच जाए पर निर्दोष को सजा नहीं हो। टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की इस खबर को पढ़कर मुझे लगता है कि प्रक्रिया गलत थी। अपराध साबित नहीं हुआ है तो जज को हटाने की जल्दबाजी क्यों होनी चाहिए। अगर लोकसभा और बहुमत से फैसले का मामला है तो हम जानते हैं। आम स्थितियों में बहुमत ही माना जाए पर जज के मामले में मुद्दा यह है कि जज को सजा देने के मामले में क्या उन्हें अपेक्षित विशेष सुरक्षा मिल रही है। खबरों से लगता है कि जो पैसे जले या जलते देखे गए वो कितने थे, किसके थे पता नहीं है। न्यायमूर्ति वर्मा ने अपना होने से मना किया है और उनकी बात नहीं मानने का कारण स्पष्ट नहीं है। दूसरी ओर ऐसे सबूत (कम से कम खबर में) नहीं हैं जिससे यकीन हो कि पैसे उन्हीं के थे। पर जल गए तो जब्त हो गए और हमारे यहां नियम तो टैक्स- जुर्माना देकर भी कुछ पैसे बच जाने का है। यहां शिकायत नहीं है, सबूत नहीं है, 100 प्रतिशत धन नष्ट हो चुका है तो सजा जरूरी है? मैं नहीं जानता पर मुझे लग रहा है कि जज को सुरक्षा नहीं मिल रही है कम से कम वैसी तो नहीं जैसी जज लोया की संदिग्ध मौत के मामले में साथी जजों को मिली थी। दोनों मामले सुप्रीम कोर्ट के ही हैं।
एक तरफ तो भाजपा चुनाव दर चुनाव जीतती जा रही है। दूसरी ओर, उसके काम लोकप्रियता पाने वाले नहीं हैं, बिहार चुनाव में उसे न सिर्फ एसआईआर का लाभ मिलता नजर आ रहा है बल्कि ऐन चुनाव से पहले और उस दौरान भी मतदाताओं को लुभाने के लिए सीधे धन देने का उदाहरण है। इस पर कार्रवाई तो छोड़िए, रोका भी नहीं गया। आज दि एशियन एज में चार कॉलम की खबर है, प्रधानमंत्री दो दिन के बंगाल दौरे पर बढ़ रहे हैं तो दीदी ने कहा कि भाजपा दंगा कराने की कोशिश में है। चुनाव की घोषणा से पहले वंदे भारत ट्रेन चलाने की घोषणा और प्रधानमंत्री द्वारा उसका उद्घाटन तकनीकी तौर पर भले गलत न हो पर है तो चुनाव प्रचार ही। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री 3250 करोड़ रुपए से ज्यादा की भिन्न रेल और सड़क परियोजनाओं की बुनियाद भी रखेंगे। भाजपा की इस कार्यशैली और चुनाव जीतने की प्रक्रिया के साथ आज एक और दिलचस्प खबर है। हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम की खबर बताती है कि भारतीय जनता पार्टी से तृणमूल कांग्रेस में दल बदल करने के लिए पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य ठहराने वाले कलकत्ता हाईकोर्ट के ऑर्डर को सुप्रीम कोर्ट ने स्टे कर दिया है। भाजपा सरकार में दल बदल कानून का खास मतलब है क्योंकि यहां दल बदल से सरकारें गिराई जाती रही हैं। यहां महाराष्ट्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला उल्लखनीय है। उससे पहले, मुकल राय के मामले में हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का यह अंश महत्वपूर्ण है – ने कहा कि उनकी सदस्यता रद्द करने से मेडिकल बिल भरने में बहुत मुश्किल हो सकती है। स्टे ऑर्डर असल में बहुत मामूली प्रभाव होगा या दीर्घकालिक प्रभाव नहीं रहेगा क्योंकि उनकी सदस्यता कुछ महीनों में अपने आप खत्म हो जाएगी।” इसकी तुलना राहुल गांधी की सदस्यता खत्म खत्म करने और बंगला खाली कराने में की गई जल्दबाजी से की जा सकती है। इससे सुप्रीम कोर्ट के आदेश और उसके समय का मतलब समझ में आता है। संभव है यह व्यक्ति विशेष की किस्मत का मामला हो लेकिन तथ्य है।
दलबदल, विधानसभा अध्यक्ष की कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बीच महाराष्ट्र में राज्यपाल का इस्तीफा भी हुआ था। आइए, इस मामले को संक्षेप में याद कर लें। 2019 विधानसभा चुनाव के बाद उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने और महाविकास आघाडी सरकार में शिवसेना, कांग्रेस, एनसीपी शामिल थीं। 21 जून 2022 को शिवसेना के कोई 40 विधायकों में से एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में करीब 16 विधायक बागी हो गए। उन्होंने भाजपा के सहयोग से सरकार बदलने की कोशिश की। राज्यपाल ने उद्धव ठाकरे को फ्लोर टेस्ट (विश्वास मत) का सामना करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट पर रोक लगाने से इनकार किया। इसके बाद उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट के बगैर इस्तीफा दे दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अगर उद्धव ठाकरे इस्तीफा नहीं देते और फ्लोर टेस्ट का सामना करते, तो कोर्ट उनकी सरकार को बहाल कर सकता था। हुआ यह कि राज्यपाल का फ्लोर टेस्ट का आदेश कानून के अनुसार नहीं था, सुप्रीम कोर्ट ने स्टे करने से मना कर दिया। उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट में हार का सामना करने की बजाय इस्तीफा दिया बाद में जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया तो राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने इस्तीफा दे दिया। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट ने शिंदे गुट के बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की याचिका दी थी। स्पीकर राहुल नार्वेकर ने बागी विधायकों को अयोग्य नहीं ठहराया और शिंदे गुट को पक्ष में रखा। इसके खिलाफ उद्धव गुट सुप्रीम कोर्ट भी ले गया, लेकिन अध्यक्ष ने फैसला लेने में देरी/सख्ती नहीं दिखाई — जिससे मामला लंबित भी रहा।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


