नोएडा। देश के प्रतिष्ठित हिंदी अखबार अमर उजाला में इन दिनों अंदरखाने गंभीर असंतोष की स्थिति बनती जा रही है। वजह है—वेतन में भारी असमानता और कार्यभार का असंतुलन, जिसके चलते संस्थान से पुराने और अनुभवी पत्रकार तेजी से नौकरी छोड़ रहे हैं।
पिछले एक महीने के भीतर ही नोएडा यूनिट से तीन अहम चेहरे संस्थान को अलविदा कह चुके हैं। नोएडा सिटी इंचार्ज सुशील पांडेय, दिल्ली डेस्क इंचार्ज हितेंद्र कुमार और दिल्ली-एनसीआर डेस्क पर वरिष्ठ उप संपादक कुलविंदर सिंह के इस्तीफों ने newsroom में हलचल मचा दी है। ये तीनों लंबे समय से संस्थान से जुड़े रहे और खबरों की रीढ़ माने जाते थे।
बताया जा रहा है कि इस असंतोष की जड़ में मौजूदा हायरिंग पॉलिसी है। सूत्रों के अनुसार, अमर उजाला प्रबंधन इस समय नवभारत टाइम्स (NBT) से पत्रकारों को बड़े पैमाने पर हायर कर रहा है। इन नए कर्मचारियों को 70 से 80 हजार रुपये मासिक वेतन पर लाया जा रहा है, जबकि वहीं दूसरी ओर 15–20 साल से काम कर रहे पुराने कर्मचारियों को केवल 35 से 40 हजार रुपये वेतन मिल रहा है।
हालात यह हैं कि सबसे ज्यादा काम, सबसे ज्यादा जिम्मेदारी और कई-कई कंपनियों का डिजिटल व प्रिंट लोड पुराने कर्मचारियों के कंधों पर है, लेकिन वेतन आधे से भी कम। कर्मचारियों का कहना है कि उनसे दुगुना-तिगुना काम लिया जा रहा है, जबकि सम्मान और पारिश्रमिक दोनों में कटौती हो रही है। यह स्थिति न केवल मनोबल तोड़ने वाली है, बल्कि घोर नाइंसाफी भी मानी जा रही है।
न्यूज़रूम में चर्चा है कि इसी वेतन ढांचे में अमर उजाला समूह की कई सहायक कंपनियों का काम भी पुराने कर्मचारियों से कराया जा रहा है, जिससे आक्रोश और गहराता जा रहा है। अंदरखाने यह भी माना जा रहा है कि यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा और आने वाले दिनों में “अन्य विकेट गिरने” की पूरी संभावना है।
लंबे समय तक संस्थान को खड़ा करने वाले पत्रकार आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि जिन लोगों ने अमर उजाला को जमीन से उठाकर पहचान दिलाई, वही आज सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं। ऐसे अनुभवी साथियों के जाने से अखबार की संस्थागत स्मृति, कंटेंट क्वालिटी और ग्राउंड पकड़ को निश्चित रूप से नुकसान पहुंचेगा।
सवाल यह है कि क्या प्रबंधन इस बढ़ते असंतोष को समय रहते समझेगा, या फिर अमर उजाला से अनुभव और भरोसे का यह पलायन यूं ही जारी रहेगा।
भड़ास को भेजे गए मेल पर आधारित



अनामी शरण बबल
January 20, 2026 at 12:15 am
वाहियात अखबार है जहां पर मालिकों द्वारा संपादकों को तानाशाह बनाकर रिपोर्टर उपसंपादक आदि को जबरन तंग करने का आदेश या खुली छूट दी जाती है। सारे संपादक बेहूदा अंदाज में पत्रकारों से पेश आएंगे। बड़ा या बेहतर अखबार बनने की ललक में अमर उजाला up के jagran से काफी पीछे रह गया। मालिकों को लगता है कि nbt या जनसत्तौ हिंदुस्तान से रिपोर्टर लाकर अखबार टॉप पर ले जाएंगे मगर भूल जाते हैं कि एनबीटी के रिपोर्टर तो खुद छोटी खबर लिखने के चक्कर में न्यूज कहां लिख पाते हैं। अखबार को सुधारने के लिए माहौल सुधारना पड़ता है।नगर जो संस्थान स्टाफ के वेतन से ही pf के संस्थान अंश खुद देने की बजाय कर्मचारी के वेतन से दोनों अंश देते हैं। अपने बाप के नाम पर सांध्य पेपर DLA निकलने वाले अग्रवाल भाइयों में एक भी इतने मक्खीचूस है कि स्टाफ के हक मारने में सारे अग्रवाल माहेश्वरी परिवार एक समान है।