देश के प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक अमर उजाला के प्रबंधन का यह कर्मचारी विरोधी पहलू बेहद अफसोसजनक है। इसी के चलते अमर उजाला में पूरी जिंदगी लगाने वाले सैकड़ों पत्रकार और कर्मचारी ईपीएफओ यानि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की उच्च पेंशन के फायदे से वंचित हो गए हैं। अत्यल्प वेतन के सहारे जीवन भर गुजर बसर करने के बाद अब अमर उजाला की ऐसी नीति के चलते बड़ी संख्या में पत्रकार और कर्मचारियों को वृद्धावस्था के लिए मिलने वाली यह आस भी टूट गई है।
सुप्रीम कोर्ट से फैसले के बाद ईपीएफओ ने सितंबर 2014 के बाद रिटायर होने वाले कर्मचारियों को उच्च पेंशन के लिए विकल्प आवेदन करने का आखिरी अवसर दिया था। इसमें लाखों कर्मचारियों ने उच्च पेंशन के लिए ईपीएफओ के पोर्टल पर आवेदन किया। इन कर्मचारियों में मुझ जैसे पत्रकार और समाचार पत्र कर्मचारी भी शामिल थे। पोर्टल पर सेवायोजकों को कर्मचारी के सेवाकाल की पुष्टि करते हुए मजूंरी देनी थी। लेकिन अमर उजाला ने अपने पूर्व और कार्यरत कर्मचारियों के सभी आवेदन को खारिज कर दिया। उसके प्रबंधन ने खारिज करने के पीछे तर्क दिया कि उनके पास 20-30 साल पुराना रिकॉर्ड नहीं है। इस बारे में अमर उजाला के एचआर से पता चला कि प्रबंधन ने किसी के भी उच्च पेंशन विकल्प आवेदन को मंजूरी न देने का फैसला किया है।
अमर उजाला के कर्मचारियों के आवेदन को ईपीएफओ ने पहली नजर में ही खारिज कर दिया क्योंकि कंपनी ने मंजूरी देने से इंकार कर दिया। इस 1995 के बाद ज्वाइन करने वाले और 2014 के बाद भी कार्यरत कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट के दखल के बावजूद इस लाभ से वंचित रह गए।
अमर उजाला का सिर्फ यही पत्रकार और कर्मचारी विरोधी निर्णय नहीं रहा। दरअसल वह शुरू से ही नियमों का उल्लंघन करके पत्रकारों को नुकसान पहुंचाता रहा। वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1955 के तहत न्यूजपेपर और मैगजीन प्रकाशक कंपनी को ईपीएफ में वेजेज सीलिंग लिमिट पर योगदान जमा करने की रियायत नहीं है।
दूसरे शब्दों में कहें तो दूसरी कंपनियों को वेजेज सीलिंग लिमिट जो पहले 5000 और 6500 रुपये और वर्तमान में 15000 रुपये प्रति माह है, पर ही पीएफ काटने और जमा करने की अनुमति है, भले ही वास्तविक वेतन ज्यादा हो। लेकिन न्यूजपेपर मैगजीन कंपनी को इसकी छूट नहीं है, बल्कि पूरे वेतन पर पीएफ काटने और उतना ही योगदान मिलाकर जमा करना होता है। उच्च पेंशन के लिए यह प्रमुख शर्त है कि कर्मचारी का पीएफ पूरे वेतन पर जमा होना चाहिए। वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के तहत अमर उजाला को पूरे वेतन पर पीएफ काटना और जमा करना अनिवार्य था। लेकिन उसने वेज सीलिंग लिमिट पर पीएफ काटा और जमा किया।
बाकी समाचार पत्र और पत्रिकाओं ने नियम के मुताबिक पूरे वेतन पर पीएफ काटा और उन्होंने 20-30 साल पुराने वेतन का रिकॉर्ड देखकर के पत्रकारों और कर्मचारियों के उच्च पेंशन आवेदन को मंजूर किया। इससे उन्हें इसका लाभ मिलेगा। उच्च पेंशन पर सुप्रीम कोर्ट की राहत का फायदा न्यूजपेपर, मैगजीन के पत्रकारों और कर्मचारियों को मिलने की संभावना ज्यादा हुई क्योंकि एक्ट के तहत उनके पूरे वेतन पर पीएफ कटने का नियम है। बाकी मीडिया संस्थानों के पत्रकारों और कर्मचारियों को इसका लाभ मिल रहा है। लेकिन दुर्भाग्य है अमर उजाला के लोग इस फायदे से वंचित रह गए।
1995 में ईपीएस यानि कर्मचारी पेंशन स्कीम लागू होने के बाद उच्च पेंशन के लिए अमर उजाला के कर्मचारी उसी तरह विकल्प देकर पेंशन में उच्च योगदान शुरू कर सकते थे। लेकिन अखबार प्रबंधन ने कभी कर्मचारियों को इसकी जानकारी ही नहीं दी। यही नहीं, उसने कर्मचारियों से पेंशन के नाम पर अलग से वेतन काटना भी शुरू कर दिया जो 1990 से 2000 के बाद भी पेंशन के नाम पर वेतन कटने की मुझे पक्की जानकारी और सबूत है। इसके बाद क्या हुआ, इसकी मुझे जानकारी नहीं हैं। सवाल है अमर उजाला ने पेंशन के नाम पर काटी राशि ईपीएफओ को जमा क्यों नहीं कराई। उसके उच्च पेंशन के विकल्प आवेदन को मंजूरी क्यों नहीं दी। क्या, इस गड़बड़ झाले के डर से अमर उजाला का पत्रकार और कर्मचारी विरोधी चेहरा सामने आया।
हद तो यह कि अमर उजाला के पत्रकारों और कर्मचारियों यह विश्वास दिलाया गया कि उच्च वेतन विकल्प चुनने में कोई फायदा नहीं है। ईपीएफओ इसके लिए बड़ी राशि की मांग करेगा। वास्तविकता यह है कि ईपीएफओ की पेंशन मार्केट की पेंशन स्कीमों के मुकाबले अत्यंत आकर्षक है।
क्या कोई उम्मीद की जा सकती है कि अमर उजाला में इस तरह की अनियमितताओं की कोई जांच करेगा और पत्रकार व कर्मचारियों को राहत दिलाने के लिए कदम उठाएगा।
भड़ास को एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजी गई सूचना पर आधारित


