
संजय कुमार सिंह
आज दिल्ली की प्रदूषित हवा की शिकायत इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी से किए जाने की खबर है। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे खेल के क्षेत्र में खतरे की घंटी कहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, बांग्लादेश ने कहा है कि वह भारत में नहीं खेलेगा और इस कारण वह विश्व कप क्रिकेट से लगभग बाहर हो चुका है। यानी बांग्लादेश विश्व कप क्रिकेट से बाहर होने की कीमत पर भी भारत में खेलने को तैयार नहीं हैं। उसकी पूर्व प्रधानमंत्री, शेख हसीना भारत में ही रह रही हैं तब भी। बांग्लादेश का कारण भले प्रदूषण नहीं है लेकिन निशाने पर भारत है। बांग्लादेश ने आईसीसी से मांग की है कि विश्व कप से संबंधित उसके वाले मैच को श्रीलंका स्थानांतरित कर दिया जाए। यही नहीं, हार्वर्ड प्रोफेसर गीता गोपीनाथ ने कहा है कि वैश्विक व्यापार टैरिफ की तुलना में प्रदूषण भारत के आर्थिक विकास के लिए एक अधिक महत्वपूर्ण खतरा प्रस्तुत करता है। उन्होंने मानव जीवन और वित्तीय दोनों रूपों में भारी लागतों पर प्रकाश डाला, और पर्यावरण क्षरण और उत्पादकता, स्वास्थ्य सेवा और निवेशक विश्वास पर इसके प्रभाव को दूर करने के लिए तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता पर जोर दिया। लेकिन यह खबर नहीं है और है भी तो पहले पन्ने पर नहीं है। दूसरी ओर, अमर उजाला ने सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के तर्क को पहले पन्ने पर चार कॉलम का बॉटम बनाया है जिसका शीर्षक है, अमेरिका की तुलना भारत से न की जाए। उपशीर्षक है, ट्रम्प ने मादुरो को उठाया, अब ग्रीन लैंड कब्जाना चाहते हैं, भारत में यह प्रणाली कैसे संभव है।
मुझे लगता है कि ट्रम्प और मोदी में बहुत सारी समानताएं हैं। फ्रैंड तो वे हैं ही और अगर ट्रम्प ने मोदी से मित्रता के मामले में रंग बदला है तो मोदी ने कम नहीं बदले हैं। अभी उसकी चर्चा की जरूरत नहीं है। लेकिन अमेरिका या ट्रम्प जो कर रहे हैं या चुनाव आयोग ने जो उदाहरण दिया है वह भारतीय संदर्भ में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला है और अमेरिका अगर अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में ऐसा कर रहा है तो भारत (या प्रधानमंत्री) मोदी राष्ट्रीय संदर्भ में ऐसा करते रहे हैं, लगातार कर रहे हैं। यह इस तथ्य से बिल्कुल अलग है कि चुनाव आयोग जो कर रहा है या एसआईआर से जो हो रहा है वह मोदी का समर्थन ही दिखाई दे रहा है। यह तर्क या दलील भी इनमें से एक है। भारत में जिसकी लाठी उसकी भैंस का एक उदाहरण आज भी है। हालांकि वह भी अखबारों में प्रमुखता से नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर दो कॉलम में टॉप पर छपी खबर के अनुसार, दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को समन के मामले में ईडी के दो मामलों में बरी कर दिया। दुनिया जानती है कि मोदी सरकार भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय का उपयोग अपने हित साधने के लिए अपनी शाखा की तरह कर रही है और पीएमएलए मामले में जमानत के नियम इसीलिए सख्त बनाए गए हैं। उनकी एक से ज्यादा किस्म की व्याख्या है। समान न्याय नहीं हो रहा है, न्याय होता हुआ भी नहीं दिख रहा है और जजों के तबादले भी हो रहे हैं। पहले जजों को ईनाम ही मिलते थे अब फैसले के बाद तबादला भी हो रहा है, वैसे ही जैसे सरकारी अफसरों के होते रहे हैं।
मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ लोक सेवक के आदेश का पालन नहीं करने का मामला बनाया गया था जो एक मुख्यमंत्री और निर्वाचित प्रतिनिधि के खिलाफ था। जाहिर है ईडी के अधिकारियों के पास लोक सेवकों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करने के अधिकार नहीं होने चाहिए और होंगे तो ईडी को इसके लिए किसी की अनुमति लेनी होगी। यह सरकार की शाखा को तो हो सकता है पार्टी की शाखा को नहीं होना चाहिए और उपयोग भी ऐसे नहीं किया जाना चाहिए। सरकारी संसाधन का उपयोग चुनाव के लिए करने पर इंदिरा गांधी की के चुनाव को अदालत ने खारिज कर दिया था अब अदालतों में जो हो रहा है वह सर्वविदित है। मैं नहीं जानता नियम-कानून की स्थिति क्या है लेकिन यह चौंकाने वाली बात है कि एक मुख्यमंत्री को एक लोक सेवक आदेश करे और (सरकारी काम करने के लिए) आदेश नहीं मानने पर एक लोक सेवक दूसरे लोक सेवक के खिलाफ मुकदमा कर दे। ऐसा होने लगे तो अदालतों में तारीख पर तारीख ही होगा। इसके बावजूद अगर अदालत ने केजरीवाल को बरी कर दिया है तो इसीलिए कि जज भी तबादले से नहीं डरते हैं। जो भी हो, आज की इस खबर से ही साबित होता है कि मोदी सरकार विपक्षी मुख्यमंत्री तक के खिलाफ अधिकारों का दुरुपयोग करते या करवाते दिख रही है। लोक सेवक तक की व्याख्या या परिभाषा अलग (शायद नई) हो गई है या एक नहीं है। इसका फायदा उठाते हुए बलात्कार के आरोपी भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर को लाभ मिल गया (बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोका) और मुख्यमंत्री को परेशान किया गया। इसी लिए कलकत्ता के आईपैक मामले में केंद्र सरकार या ईडी की ओर से अदालत में ईडी के पावर बताए जा रहे थे। अदालतों के समय और जनता के धन की जो बर्बादी हो रही है सो अलग।
इस व्यवस्था में मीडिया ने मनरेगा की बहाली के लिए या वैसे भी जो काम हो रहे हैं उसे महत्व नहीं दिया है। आज देशबन्धु की लीड राहुल गांधी की अपील है, मनरेगा की बहाली के लिए सब एकजुट हों। इस खबर का उपशीर्षक है, कांग्रेस नेता ने मनरेगा बचाओ मोर्चा के कार्यकर्ताओं से संवाद किया। दूसरे अखबारों की लीड सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश है कि मध्य प्रदेश के धार जिले में भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद स्थल पर बसंत पंचमी के दिन पूजा और नमाज दोनों होगी। आज अमर उजाला, नवोदय टाइम्स के साथ हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड बांग्लादेश की क्रिकेट टीम पर है और इसकी चर्चा पहले कर चुका हूं। इंडियन एक्सप्रेस ने लीड से बताया है कि ट्रम्प ने जब अपने बोर्ड ऑफ पीस का खुलासा किया तो भारत इंतजार कर रहा है, देख रहा है। द टेलीग्राफ की लीड इसी खबर पर है जो बताती है कि ट्रम्प के इस प्रयास में ऐरे गैरे शामिल हैं और कौन से देश शामिल नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिखी गई इस खबर में भारत का भी नाम है जो ट्रम्प के साथ नहीं है। नरेन्द्र मोदी की सरकार अगर ट्रम्प के मामले में कुछ नहीं कर पा रही है तो मणिपुर का मामला आप जानते हैं। आज खबर यह है कि मणिपुर के चूड़ांचादपुर में कुकी महिला से विवाहित मैते समाज के एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह खबर मेरे नौ अखबारों में अकेले द हिन्दू की है और इस मामले से निपटने में केंद्र की मोदी सरकार की अक्षमता का उदाहरण भी है।
दि एशियन एज की लीड मेरे बाकी सभी अखबारों से अलग है और आज की लीड तो इसे भाजपा का ‘सामना’ बना दे रही है। लीड का शीर्षक है, भाजपा के नए प्रमुख नितिन नबीन अगले हफ्ते पश्चिम बंगाल का दौरा करेंगे। चुनावी रणनीति तय करने के लिए उन्होंने राज्य के नेताओं से मुलाकात की। इस खबर के नीचे लगभग इतनी ही बड़ी खबर है जो बताती है कि प्रधानमंत्री मोदी आज चुनाव वाले राज्य केरल और तमिलनाडु का दौरा करेंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव आयोग के अनुसार अगर अमेरिका की तुलना भारत से नहीं भी की जानी है तो दूसरे उदाहरण हैं। इनमें एक यह भी है कि नरेन्द्र मोदी चुनाव जीतने के लिए भाजपा के प्रचारक बन गए हैं, चुनाव से पहले नकद बांट चुके हैं और चुनाव आयोग ने रोकने की कोशिश नहीं की। यही नहीं, विपक्ष के नेता के सार्वजनिक आरोपों का जवाब नहीं है और मतदाता सूची से नाम हटाने की शिकायत की जांच कर रही कर्नाटक की एसआईटी को चुनाव आयोग ने अभी तक जानकारी नहीं दी है। ऐसे में भारत और अमेरिका की तुलना नहीं की जा सकती है लेकिन जो उदाहरण चुनाव आयोग ने दिया है वह अमेरिका अगर राष्ट्रीय स्तर पर कर रहा है भारत में आंतरिक तौर पर हो ही रहा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



Basant
January 24, 2026 at 11:40 am
पत्रकारों के मजीठिया आयोग को लेकर कभी कोई खबर नहीं चलाते हो ना ही कोई बात करते हो क्या यही पत्रकारिता है जो पत्रकारों के हक के लिए कोई बात ना दिखता हो और ना कहता हूं क्या वह व्हाट्सएप में पत्रकार है संपादक है या लेखक है