संजय कुमार सिंह
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केरल और तमिलनाडु में चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है। आज दिल्ली के मेरे कई अखबारों में यह खबर लीड है। इनमें हिन्दुस्तान टाइम्स, दि एशियन एज और द हिन्दू शामिल हैं। अमर उजाला में यह पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है इसलिए तीसरा पन्ना भी पहले पन्ने जैसा है और इस दूसरे पहले पन्ने पर प्रधानमंत्री का प्रचार लीड है। शीर्षक है, कांग्रेस माओवादियों से भी खतरनाक मुस्लिम लीग से भी सांप्रदायिक। वैसे तो ऐसी बातें और शीर्षक हमेशा एतराज के काबिल होने चाहिए लेकिन नरेन्द्र मोदी की ऐसी बातों पर कोई एतराज नहीं करता और जिसे पढ़-सुन कर करना चाहिए वह भी नहीं करता है। ऐसे में मेरी चलती तो मैं ऐसी खबरों को कम महत्व देता। हालांकि, प्रधानमंत्री ने कहा है तो खबर है लेकिन इस खबर से विपक्ष को नुकसान पहुंचने की आशंका है इसलिए इसे ऐसे प्रकाशित किया जाना चाहिए जैसे कोई औपचारिक खबर होती है। लेकिन प्रधानमंत्री के कहे को प्राथमिकता मिलती है इसलिए वे कहते हैं और कहते हैं इसलिए छपता है। जहां तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बात है, वे झूठ, सफेद झूठ, आपत्तिजनक, गैर कानूनी सब कुछ बोल कर चुके हैं। कोई नहीं देख रहा है इसलिए मैं हमेशा कोशिश करूंगा कि उनका कहा खबर की ही तरह लगे, उनकी विशेष योग्यता या खुलासे अथवा दावे की तरह नहीं। जब तक नरेन्द्र मोदी की नीयत नहीं मालूम थी तब की बात अलग है लेकिन सच्चाई यह है कि कांग्रेस को भ्रष्ट बताने वाले नरेन्द्र मोदी किसी भी भ्रष्टाचारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पाए हैं। भ्रष्टाचार के जिन आरोपियों की मदद से सरकार चला रहे हैं वह अलग है।
मुझे लगता है कि नरेन्द्र मोदी जब भाजपा के प्रचारक की तरह काम करें तब उन्हें प्रधानमंत्री जैसा सम्मान या महत्व देने की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। पार्टी के लिए किए जाने वाले उनके सरकारी दौरों को निजी या पार्टी का बनाने का हमारे पास कोई तरीका नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसी खबरों के कारण दूसरी खबरें छूट जाती हैं। उदाहरण के लिए, टाइम्स ऑफ इंडिया ने यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उरसुला वॉन डर लेयेन से बातचीत की है और इसी खबर को लीड बनाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रधानमंत्री की राजनीति सिंगल कॉलम में है। अमर उजाला, देशबन्धु और नवोदय टाइम्स की आज की लीड मौसम की खबर है। आज सेंसक्स 770 अंक लुढ़कने की खबर भी है जो इन दो खबरों के कारण पहले पन्ने पर नहीं है। आर्थिक खबरों में डॉलर के 92 रुपए हो जाने की खबर भी गंभीर है। सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री का पुराना भाषण याद किया जा रहा था। वर्षों पहले नरेन्द्र मोदी ने जो कहा था उसमें शामिल है, 1) डॉलर के मुकाबले रुपये की वैल्यू गिरती है तो देश का मान-सम्मान गिरता है और 2) जब किसी देश का रुपया गिरता है तो समझ लेना चाहिए कि उस देश का प्रधानमंत्री गिरा हुआ है। 31 अगस्त 2018 डॉलर की तुलना में रुपया सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है था। 26 पैसे की गिरावट के साथ एक डॉलर की क़ीमत 71 रुपए हो गई थी। तब बीबीसी ने खबर दी थी और बताया था कि 2014 से पहले के एक वीडियो में मोदी ये कहते नजर आ रहे हैं, ”डॉलर मजबूत, रुपया कमज़ोर होता जा रहा है। विश्व व्यापार में भारत टिक नहीं पाएगा। दिल्ली की सरकार जवाब नहीं दे पा रही है। हमारे अड़ोस-पड़ोस के देशों में डॉलर के मजबूत होने से कोई दिक्कत नहीं हो रही है। प्रधानमंत्री जी, देश ये जानना चाहता है कि आज अकेला हिंदुस्तान का रुपया डॉलर के मुकाबले क्यों गिरता ही चला गया…गिरता ही चला गया।” स्पष्ट है, प्रधानमंत्री अपने चुनाव प्रचार से हेडलाइन मैनेजमेंट कर रहे हैं। बीबीसी को नियंत्रित करने की उनकी कोशिशें अलग हैं और उसकी कहानी अभी मुद्दा नहीं है।
नरेन्द्र मोदी जब तमिलनाडु में चुनावी भाषण दे रहे हैं, उसकी खबर दिल्ली में लीड बन रही है तब कलकत्ता के द टेलीग्राफ ने इसे सिंगल कॉलम में छापा है और बताया है कि तमिलनाडु सरकार ने नए मनरेगा, वीबी जी राम जी के खिलाफ प्रस्ताव पास किया है और यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तमिलनाडु दौरे के समय हुआ है। खबर तो यह भी है और ज्यादा पढ़ी जाने वाली है, नई है लेकिन ….। इसके साथ ही पश्चिम बंगाल भाजपा नेता की अपील है जो उन्होंने अनिवासी भारतीयों और विदेशी छात्रों से की है। उन्होंने कहा है कि बंगाल को बचाने के लिए वे वापस आएं और विधानसभा चुनाव में वोट डालें। आप जानते हैं कि अभी तक मतदाता सूची में उन्हीं लोगों का नाम होता था जो किसी खास चुनाव क्षेत्र में सामान्य तौर पर रहते हैं। अब मतदाता सूची में नाम होना नागरिकता जैसा बना दिया गया है और बिहार के बाहर रहने वालों के लिए हरियाणा से विशेष ट्रेन चलाई गई थी। बंगाल के बाहर विदेशों में रहने वालों के लिए आकर वोट डालने की अपील की जा रही है। जाहिर है, लोग नागरिकता बचाने के दबाव में आना भी चाहेंगे और इस तरह चुनाव महंगा होता चला जाएगा। यह पहले से स्थापित है कि भ्रष्टाचार का कारण चुनाव के खर्चे भी हैं। नरेन्द्र मोदी सरकार की कार्यशैली से लगता है कि वह इलेक्टोरल बांड या ऐसे ही किसी तरीके से चंदा और भ्रष्टाचार को व्यवस्थित रूप देकर ऐसी व्यवस्था बनाने में लगी है जिसमें चुनाव हो ही नहीं या हो तो भाजपा ही जीते। यह लोकतंत्र के खिलाफ है लेकिन इसका विरोध करने वालों को देश विरोधी करार देने की कोशिशें होती रही हैं। मीडिया ही नहीं अदालतें और जनता के पैसे से वेतन पाने वाले सरकारी वकील भी सरकार की भाषा बोलते देखे सुने गए हैं। अभी भी सब चंगा सी। कल रात डॉलर का मूल्य 92 रुपए के करीब था। नरेन्द्र मोदी ने सत्ता में आने से पहले स्वीकार किया था कि आर्थिक मामलों की उनकी जानकारी कम है और तब उन्होंने कहा था कि वे जानकारों और विशेषज्ञों की सेवा लेंगे। नोटबंदी के सलाहकार से लेकर उनके आर्थिक सलाहकार रहे लोगों की योग्यता और अनुभव के साथ मौजूदा स्थिति में उनके योगदान पर एक अच्छी रिपोर्ट बन सकती है लेकिन मीडिया अब ऐसे काम नहीं करता है। ‘सरकार’ के कहने पर ताली-थाली बजाने वालों के लिए पत्रकारिता भी अलग हो गई है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


