डॉ रवींद्र राणा-
मेरठ के पत्रकारों के चचा और नसीमुद्दीन सिद्दीकी…! नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने हाल ही में कांग्रेस का दामन छोड़ा। वह पहले बसपा में थे, उस समय सत्ता की मशीनरी उनके इर्द गिर्द घूमती थी। वे बहनजी के विश्वस्त सिपहसालारों में थे। सत्ता के इस घेरा में रहते हुए उनकी मौजूदगी हमेशा सुर्ख़ियों में रहती थी। लेकिन उनकी हालिया हलचलें मुझे मेरठ के सीनियर जर्नलिस्ट राजकुमार गर्ग की याद दिला गईं।
गर्ग साहब, जिन्हें सब ‘चचा’ कहते थे, अपने समय के मंझे हुए पत्रकार थे। उनके जमाने में नेता पत्रकार का इंतज़ार करता था, न कि पत्रकार नेता का। मुझे अब भी याद है, सर्किट हाउस में सिद्दीकी साहब की प्रेस कॉन्फ्रेंस होनी थी। सब पत्रकार जमा थे, पंद्रह बीस मिनट बीत जाने के बाद भी मंत्री नहीं आए। तब चचा ने सबको रडार पर लिया और कहा, “हमारे ज़माने में नेता पत्रकारों का इंतज़ार करता था।”
अब हालात बदल गए हैं। नए पत्रकार नेताओं का इंतज़ार करते हैं। चचा खड़े होकर बोले, “अब रुकेंगे नहीं। तभी नसीमुद्दीन आ गए। चाचा ने कहा मंत्री जी हम जा रहे हैं, आप लेट हो, हम नहीं।” तनातनी बढ़ी, ‘तू तू, मैं मैं’ होने लगी, लेकिन बसपा के कुछ स्थानीय नेताओं ने बीच बचाव किया और अंत में मंत्री जी ने सॉरी कहा। चचा माने।
राजकुमार गर्ग सिर्फ पत्रकार नहीं थे, बल्कि बड़े किसान भी थे। शर्ट पैंट से बाहर रखते थे, और खबर कभी कंप्यूटर से नहीं लिखते थे। प्रशासन और स्थानीय घटनाओं की गहरी समझ उनके काम का हिस्सा थी। मैं जब नौसिखिया था, गर्ग साहब मॉर्निंग मीटिंग के बाद विकास भवन की बीट देखने चले जाते, और वहां पहुँचते-पहुँचते पता चलता, “अभी चचा आए तो थे!”
गर्ग साहब मंझे हुए खिलाड़ी थे, पुराने संपादकों की कमजोरियों और उनके किस्सों से भली भांति वाकिफ़। उनके किस्से सुनाना, अनुभव साझा करना सबमें एक अलग अंदाज़ था। उनके जाने के बाद पत्रकारिता में जो खालीपन आया, उसका एहसास अब और गहरा है।
आज नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेता अगर बुलाएँ, शायद ही इतनी संख्या में पत्रकार पहुंचें। और पत्रकारिता का स्वाभिमान अब कहीं खो सा गया है।
गर्ग साहब की याद आज भी ये सिखाती है, सत्ता के सामने खड़े रहने का साहस, अनुभव की गहराई और पत्रकारिता की असली भावना कभी पुरानी नहीं होती।
पोस्ट पर आईं कुछ टिप्पणियां भी पढ़ें…
प्रवेश कुमारी-
खबरों की प्लानिंग पर चचा का डायलॉग होता था – जाएंगे तो लाएंगे।
सुनील सागर-
राजकुमार चाचा की डीएलए न्यूज़ पेपर में हमने बहुत खबरें टाइपिंग की है
दिनेश प्रकाश गुप्ता-
शानदार एवं महान पत्रकार श्री राजकुमार गर्ग जी को कोटिश नमन।
चंद्र शेखर-
उस दिन मैं भी वहीं सर्किट हाउस में था। अच्छी खासी लड़ाई हो गई थी। संभवत: तारिक भाई ने हस्तक्षेप किया फिर। चचा के कई और भी ऐसे मामले हैं जब उन्होंने बेबाकी से मुकाबला किया।
कमलेश अवस्थी-
मस्त मौला इंसान थे। पत्रकारिता उनके लिए सिर्फ आय का जरिया नहीं थी।
2014 में चचा राजकुमार गर्ग जी का निधन हो गया था, पढ़ें…
मेरठ के पत्रकार राजकुमार गर्ग का निधन


