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आज के अखबार : ईयू के साथ ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के बाद मर्सिडीज, ऑडी और शराब सस्ती होगी !!

संजय कुमार सिंह

आज अखबारों के पहले पन्ने पर सरकार का प्रचार ही है। इसमें यूजीसी वाली खबर दब गई है। संसद का बजट सत्र शुरू हुआ। इसकी खबर को भी महत्व नहीं मिला। कुछ ही अखबारों में पहले पन्ने पर है। सोशल मीडिया पर, यूट्यूब वालों के लिए यूजीसी वाली खबर महत्वपूर्ण है लेकिन अखबारों में पहले पन्ने पर जगह नहीं मिली है। जो खबर छपी है वह भी दिलचस्प है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, “यूजीसी के नए नियमों पर विरोध के बाद सरकार : किसी के खिलाफ कोई भेदभाव नहीं”। देशबन्धु में शीर्षक है, “देशभर में यूजीसी के नए नियमों का हो रहा विरोध”। हिन्दुस्तान टाइम्स में शीर्षक है, “मंत्री ने यूजीसी नियमों के आलोचकों को शांत करने की कोशिश की; सुप्रीम कोर्ट में अपीलों की सुनवाई होगी”। टाइम्स ऑफ इंडिया में आज एक खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा क्या ब्राह्मण ‘राजनीतिक तौर पर पिछड़े’ हो सकते हैं? इसके साथ छपी खबर का शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट में अपील : यूजीसी (के) बराबरी नियमों को जाति न्यूट्रल बनाया जाए”। मुझे लगता है, यूजीसी के नियमों की जरूरत अभी नहीं थी और सरकार को इससे फायदा हो न हो, हेडलाइन मैनेजमेंट का काम हो रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अधपन्ने के पीछे छपी खबर में यूजीसी के नए नियमों को स्पष्ट किया है। इसपर एक खबर और है जिसका शीर्षक है – प्रधान ने डर कम करने की कोशिश की, कहा नियमों का दुरुपयोग नहीं होने देंगे। मुझे लगता है कि ऐसे नियमों की जरूरत दुरुपयोग करने के लिए ही होती है और यह सरकार अपने बनाए इस नए नियमों का दुरुपयोग न भी होने दे तो पहले के नियमों का दुरुपयोग कर ही रही है। इसकी जरूरत ही नहीं थी। पर अभी वह मुद्दा नहीं है। जहां तक इस सरकार के बनाए नियमों का सवाल है नोटबंदी के समय से दिख रहा है कि नियम रोज बदलने पड़ते हैं। एसआईआर में भी वही स्थिति है। 370 हटाने के लिए जो अध्यादेश पास हुआ था उसमें टाइपिंग और हिज्जे की गलतियां भी थीं। इस तरह सरकार की प्राथमिकता भी ठक करने की जरूरत है पर वह सब अलग मुद्दा है। आज खबर यह भी है कि ईयू से करार के बाद विदेशी कारें और शराब सस्ती हो जाएगी।    

यह खबर आम भारतीयों के लिए जीएसटी लागू किए जाने के बाद आई है। सरकारी अधिकारी सरकार को जब नमक की कीमत अदा कर रहे हैं, सरकार जब मुफ्त राशन के नमक की कीमत चाहती है तब गब्बर सिंह टैक्स कहे जाने वाले जीएसटी की दरों में छूट और बचत उत्सव के चुनावी नाटक तथा प्रचार के बाद अब ईयू के साथ मदर ऑफ ऑल डील्स की खबर लीड है। नतीजा मर्सिडीज, ऑडी जैसी कारें तथा शराब सस्ती होगी। आइए देखें आज अखबारों ने इसे कैसे रिपोर्ट किया है। हालांकि, इससे पहले यह याद दिलाना जरूरी है कि फ्रैंड ट्रम्प के अमेरिका ने टैरिफ लगाया, निर्यात मुश्किल हुआ देशी उद्योग संकट में आ गया तो हम स्वदेशी और आत्म निर्भरता की बात करने लगे। लाल आंख दिखाने की बजाय चीन की तरफ झुक गए और अब देशबन्धु के अनुसार, दो अरब लोगों की संयुक्त आबादी का सबसे बड़ा साझा मुक्त बाजार बनेगा। अखबार का मुख्य शीर्षक दूसरे अखबारों की तरह बहुत आम, भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते पर मुहर है। मेरे 10 अखबारों में आज यह खबर सबमें लीड है और सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया तथा द टेलीग्राफ में थोड़ा कटाक्ष है वरना प्रशंसा ही प्रशंसा है। सबसे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक देखते हैं, ईयू टर्न : लक्जरी कार्स, स्प्रिट्स (शराब) टू कॉस्ट लेस अंडर ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को यू टर्न के लिए जाना जाता है। सरकारी नीतियों के मामले में यह पलट जाना है और डॉलर के मुकाबले रुपये के गिरते मूल्य पर नरेन्द्र मोदी के भाषणों को याद करें तो अब जब डॉलर के मुकाबले रुपया 91-92 के बीच है तो उस पर चुप्पी मोदी का ऐसा यू टर्न है जो हर तरह के दिव्यांग को समझ में आना चाहिए। पर वह अलग मुद्दा है। ऐसे में टीओआई का यह ईयू टर्न बहुत मायने रखता है, सबसे महत्वपूर्ण यह कि ईयू यानी यूरोपीय यूनियन के लिए भारत ने जो रुख बदला।

दैनिक भास्कर में अर्थशास्त्री प्रो अरुण कुमार ने लिखा है, वर्ल्ड इकनोमी की टैरिफ को मनमानी से झकझोरने वाले डैडी ट्रम्प को इस मदर ऑफ ऑल डील्स से पहला करारा जवाब मिला है। दैनिक भास्कर ने वर्ल्ड मीडिया के हवाले से लिखा है, भारत-ईयू डील दुनिया के लिए विकल्प है। भारत के आठ क्षेत्रों को इससे फायदा होगा। हालांकि, यह डील अब ईयू संसद में जाएगी। इसे पास होने में छह महीने लग सकते हैं। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, भारत-ईयू में मदर ऑफ ऑल द डील्स। उपशीर्षक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बयान है, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में स्थिरता को मजबूत करेगी यह साझेदारी। अमर उजाला में हाईलाइट किए तथ्यों में यह नहीं है कि मर्सिडीज और ऑडी कारों की कीमत कम होगी। हालांकि, मुख्य खबरों के साथ की छोटी खबरों में एक शीर्षक है, भारत में घटेंगे यूरोप की महंगी शराब के दाम। मुझे लगता है कि हिन्दी पट्टी के राज्यों में एक, बिहार में शराब बंदी होने के कारण इसका लाभ बिहार वालों को शायद नहीं मिलेगा लेकिन इस बारे में भी कुछ हाइलाइट किया हुआ नहीं दिखा। अमर उजाला में एक और खबर है, भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुई अहम रक्षा साझेदारी। मुझे अभी तक की खबरों से यह नहीं समझ में आया कि अरविन्द केजरीवाल की सरकार ने दिल्ली की शराब नीति में ऐसा क्या किया था कि भ्रष्टाचार हो गया और भाजपा की दूसरी सरकारों ने ऐसा क्या किया कि कीमतें कम हो गईं, टैक्स भी कम हुआ, भ्रष्टाचार नहीं हुआ।

द टेलीग्राफ का मुख्य शीर्षक है ट्रेड लेटर डे। यह रेड लेटर डे से बनाया गया लगता है। इसका मतलब होता है, ऐसा दिन जो सुखद यादों वाला हो या जो अच्छी बातों के लिए याद रखने लायक हो। उपशीर्षक की तरह जो लिखा है उसका मतलब होगा, ट्रम्प टैरिफ के साए में भारत और यूरोपीय यूनियन ने मदर ऑफ ऑल डील्स किया जो 20 साल से तैयार हो रहा था। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है – “भारत, ईयू ने ‘ऐतिहासिक’ एफटीए करार किया; मोदी ने ‘नए युग की शुरुआत’ की प्रशंसा की”। सरकार के प्रचार वाले इस शीर्षक के फ्लैग शीर्षक में तीन बुलेट प्वाइंट हैं। तीसरा बुलेट प्वाइंट है – कारें, शराब सस्ती होगी। द हिन्दू का मुख्य शीर्षक है, ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’: भारत और ईयू ने एफटीए को अंतिम रूप दिया। सात कॉलम की इस खबर के तीन उपशीर्षक तीन हिस्सों में हैं। पहला है, यूरोप की शराब (वाइन) सस्ती होगी, लक्जरी कारें सस्ती होंगी क्योंकि 2007 में शुरू की गई चर्चा (मोल-भाव) संपन्न हुई। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह बैनर है। शीर्षक है, “ऐतिहासिक करार : भारत और ईयू ने अपने तुरुप के पत्ते चले”। इंडियन एक्सप्रेस में यह छह कॉलम की लीड है। शीर्षक है, भारत और ईयू ने करार पूरा किया। कहने की जरूरत नहीं है कि आज इस करार को बहुत अच्छा बताया गया है। कुछेक अखबारों ने लिखा है कि कई वर्ष बाद हुआ है। अगर यह इतना ही अच्छा था तो इतना समय क्यों लगा और यह सामान्य है तो करार कैसे खास है। अब की खबरें बहुत कुछ नहीं बताती हैं। यह सब भी इनमें एक है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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