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सियासत

दरक रहा मोदी का सवर्ण सपोर्ट बेस?

विश्व दीपक-

दरक रहा मोदी का सवर्ण सपोर्ट बेस? तीसरी दुनिया के चौथे दर्जे के देश भारत के सत्ताधारी दल का अंतर्कलह खुलकर सामने आ चुका है. चौक-चौराहे पर डिस्कस हो रहा. छर्रा-छर्रा बिखर चुका है.

संघ/बीजेपी के लोगों को भी उम्मीद नहीं थी कि ऐसी प्रतिक्रिया देखने को मिलेगी. इसकी वजह क्या है? मंडल-कमंडल पॉलटिक्स.

एक दौर था जब बीजेपी को ब्राह्मण-बनिया पार्टी माना जाता था. कहा जाता था कि अगर कमंडल पॉलिटिक्स यानि सांप्रदायिक राजनीति को हराना है तो मंडल पॉलिटिक्स को उभारिए यानि जाति की राजनीति को हवा दीजिए.

जहर ही जहर को काटता है – इसके पीछे यह सोच था. लेफ्ट और अंबेडरवादियों ने भी इस रणनीति का जमकर प्रचार किया. चुनावी रणनीति के तौर पर यूपी, बिहार में यह फॉर्मूला कामयाब भी रहा. लेकिन इसकी प्रतिक्रिया भी हुई.

यूपी, बिहार में यादवों से खार खाये जातीय समूह बीजेपी के छाते तले इकट्ठे होते गये और एक बड़ी ताकत बन गये. यही है मंडल-कमंडल का एकात्म.

अब चूंकि मंडल-कमंडल खुलकर खेल रहा है इसलिए बीजेपी-मोदी के प्रति शुरुआत से ही प्रतिबद्ध रहा सवर्ण तबका खुद को असुरक्षित महसूस करने लगा है. यह एकदम आधारहीन भी नहीं है.

जेएनयू, अशोका यूनिवर्सिटी में लिखे/लगे हिंसक नारे और हाल ही में कुछ अधिकारियों द्वारा दिये गये बयानों ने इस असुरक्षा की भावना को और भड़काया.

चूंकि राजनीतिक रूप सवर्ण तबका केन्द्र से लेकर राज्य तक हशिये पर जा चुका है इसलिये यूजीसी इक्विटी कानून का विरोध करके यह पुन: प्रासंगिक होने का प्रयास कर रहा है.

दूसरा कारण है रोहित वेमुला की आत्महत्या और उसके बाद की राजनीति. रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद बीजेपी का सबसे तगड़ा विरोध कहां हुआ? यूनिवर्सिटी में. चाहे जेएनयू हो, एचसीयू, जोधपुर हो या अन्य कैंपस.

बीजेपी को नौजवानों का तगड़ा गुस्सा झेलना पड़ा. बाद में कांग्रेस ने रोहित वेमुला ऐक्ट बनाकर और राहुल गांधी ने ओबीसी पॉलिटिक्स की बात करके बीजेपी की चिंता को और बढ़ा दिया.

2024 के चुनाव में यूपी में हार और राहुल गांधी के संविधान सम्मेलनों की वजह से बीजेपी अंदर से बेचैन थी. उसे यूजीसी इक्विटी कानून में इन सारी समस्याओं का एक साथ हल मिल गया.

बीजेपी ने उस असंतोष को जड़ से ही टैप करने की कोशिश की जिससे कांग्रेस को ताकत मिलती थी. इस खेल में एक तीर से तीन शिकार हो गये –

  • यूनिवर्सिटीज और अन्य दूसरे कैंपस में अपने लिये समर्थन के बीज बो दिए
  • ओबीसी कांग्रेस की तरफ न चला जाये यह सुनिश्चित करने की कोशिश की
  • जेन जी कहीं बेरोज़गारी, महंगाई या अन्य किसी मुद्दे पर एक साथ सड़क पर न उतर जाये इसलिये उसे जाति के खांचे में बांट दिया

अब सवाल आता है कि बीजेपी क्या सचमुच जातिगत भेदभाव या असमानता को दूर करने के लिये चिंतित है?

मैं मानता हूं कि ऐसा बिल्कुल नहीं होने वाला है. बीजेपी या मोदी जी का इरादा जातिगत भेदभाव या असमानता को दूर करने में कम सत्ता को पकड़कर रखने में ज्यादा है.

ओबीसी तबके का इगो मसाज करने के लिये उसे यूजीसी इक्विटी कानून में डाला गया है. वर्ना सभी जानते हैं कि ओबीसी और एससी-एसटी एक नहीं बल्कि अलग-अलग हैं. जातीय पदानुक्रम [caste hierarchy] और सामाजिक अनुभव दोनों लिहाज से भी ये एक श्रेणी में नहीं आते.

लेकिन मोदी जी/बीजेपी यही चाह रहे हैं कि आप इन सभी तबकों को एक श्रेणी मान लें. इसलिए मुझे यूजीसी इक्विटी कानून बीजेपी द्वारा बिछाया गया एक ट्रैप भी लगता है.

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