अरुण श्रीवास्तव-
अब कौन लड़े राष्ट्रीय सहारा कर्मचारियों की लड़ाई?
और यह भी कि क्यों लड़ें। तथाकथित ख़बर नबीसों ने आज़ तक किसी और की लड़ाई लड़ी है। दूसरों की जाने दीजिए अपनी ही बिरादरी वालों की लड़ाई नहीं लड़ी। एकजुटता दिखाने के लिए ही सही क्या किसी की लड़ाई में शामिल हुए? शायद नहीं। हां, उनके कार्यक्रमों की खबरें फोटो सहित छाप दी है लेकिन यह उनकी लड़ाई में शामिल होना नहीं माना जाएगा। यह समाचार है और समाचार के रूप में ही प्रस्तुत किया करते रहे हैं हम। इसे लड़ाई में शामिल होना नहीं कहा जाएगा।
“जाके पांव न फटी बेवाई उ का जानै पीर पराई”: गुसाईं तुलसीदास की चौपाई का यह अंश कुछ दिनों पहले राष्ट्रीय सहारा के सभी संस्करणों के बंद होने के बाद साफ़-साफ़ दिखाई दी। 2015 में लंबे समय से वेतन न मिलने और अन्य समस्याओं को लेकर राष्ट्रीय सहारा के कई यूनिटों का प्रकाशन ठप हुआ। इसमें देहरादून के लोग भी शामिल थे अखबार को छापने नहीं दिया गया। उस समय की हड़ताल में डेस्क पर कार्यरत कर्मचारी ने कार्य बहिष्कार किंतु रिपोर्टिंग का पूरा का पूरा स्टाफ प्रबंधन के चरणों में ‘दंडवत’ होकर खुद को हड़ताल से बाहर कर लिया।
प्रकाशन शुरू होने के बाद कई कर्मचारियों जो कि 20-20, 25-25 साल से अपनी सेवाएं दे रहे थे एक झटके में बाहर कर दिये गए। 29 जनवरी 16 को मैं खुद इस अवैधानिक छंटनी का शिकार हुआ। बीमारी के बाद भी घर पर बर्खास्तगी का नोटिस थमाया गया।
मैं अकेला नहीं था, मेरे साथ चार नियमित कर्मचारी और थे। हम सबका गुनाह ये था कि हड़ताल को लोकतांत्रिक अधिकार मानते हुए अन्य के साथ इसमें शामिल हुए। इस दौरान भड़ास में मेरे नाम से एक स्टोरी आई जिसमें लिखा था कि ‘कर्मचारियों की एकता ने सुब्रत राय की “हेकड़ी” निकाल कर रख दी। सनद रहे कि आज तक किसी ने भी उनके लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया था। बाद में सर्कुलेशन मैनेजर के कमरे में तत्कालीन समूह संपादक रणविजय सिंह का पत्र आया। मेरे सामने पढ़ा गया।
इस दौरान उस समय के स्थानीय संपादक दिलीप चौबे, विज्ञापन मैनेजर डीडी शर्मा और एचआर हेड अखिल कीर्ति जो अब इस दुनिया में नहीं हैं.. मौजूद थे। मुझे स्पष्टीकरण मांगा गया तब मैंने साफ-साफ कहा कि मुझसे लिखित सवाल किया जाए तो मैं लिखित जवाब दूंगा। चूंकि लिखित सवाल कर इस तरह से निकाला नहीं जा सकता था इसलिए अपने द्वारा निर्मित धारा-48 जो कि श्रम विभाग से एप्रूव्ड भी नहीं है की आड़ में मुझे भी बाहर कर दिया गया। इसी दिन सर्वश्री अनिल वर्मा, जय सिंह रावत, और पूर्णानंद जो कि नियमित थे निकाला गया। प्रसंगवश हर जिले से एक नहीं कई अखबार छपते हैं पर किसी ने भी राष्ट्रीय सहारा में हड़ताल होने या राष्ट्रीय सहारा का प्रकाशन ठप होने की खबर नहीं छापी।
एकमात्र भड़ास मीडिया ही रहा जिसने उस दौर में छोटी से लेकर बड़ी तक हर खबर को अपने पोर्टल में स्थान दिया। हो सकता है यह अतिशयोक्ति हो पर भड़ास के तहखाने से इस बात की पुष्टि की जा सकती है। भड़ास पर कर्मचारियों की एकता और पत्रकारों के लिए सबसे ज्यादा खबर मैंने लिखी है और ये भी एक कारण रहा मेरे निकाले जाने का। नौकरी के दौरान ही दिल्ली से आई टीम जिसमें सर्वश्री जैदी, राजीव सक्सेना सहित कई अन्य शामिल थे। उस टीम ने मुझसे सीधे-सीधे सवाल किया कि आप भड़ास में खबर लिखते हैं? बताइए किस तरह से खबर छपती है? अब इसे संयोग कहे या कुछ और जिस दिन टीम आई उसी दिन उसके आने की खबर भी भड़ास ने छापी थी। और ये भी कि, भड़ास ने अपने सालाना कार्यक्रम में दो बार मुझे सम्मानित करने की घोषणा की, एक बार मैं गया और मुझे पुरस्कृत भी किया गया था।
बहरहाल, श्रम विभाग से लेबर कोर्ट तक अपनी लड़ाई लड़ी। पदनाम गड़बड़ होने के कारण मैं इस मामले को लंबी सुनवाई के बाद वापस लिया और पुनः नए सिरे से लेबर कोर्ट तक पहुंचा। अभी यह मामला (06/ 2021) के रूप में अंतिम दौर तक पहुंचे चुका है जो कि मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित है। नौकरी से निकले जाने पर मैं सीधे कोर्ट गया, नैनीताल हाई कोर्ट में मामला 480/ 2016 के रूप में दर्ज किया गया था और 5 साल बाद ये कहते हुए वापस कर दिया गया कि “प्रॉपर चैनल” आइए। इसके बाद प्रॉपर चैनल लेबर कोर्ट पहुंचा। ये वादा (11/2022) भी अंतिम दौर में है। संभवत दोनों मामले मार्च-अप्रैल तक निर्णीत हो जाएं।
याद रहे कि साथ में काम कर रहे किसी भी कर्मचारी ने सहानुभूति पूर्वक घर आकर मिलने की बात जाने दीजिए फोन पर भी अफसोस प्रकट नहीं किया। अपवाद स्वरूप एक दो को छोड़कर।
“लगेगी आग तो कई घर आएंगे जद में, यहां पे सिर्फ़ मेरा मकान थोड़ी है”: इस शेर की उक्त पंक्ति न किसी एक कर्मचारी के लिए है, और न किसी को चिढ़ाने के लिए। मैं आज़ भी सभी के साथ हूं। जनवरी 2026 को सुनवाई की पहली तारीख पर श्रम विभाग में था आगे भी रहूंगा। जिसे मेरी फाइल से कोई कागज चाहिए फोटोकॉपी करा कर लें जाए। मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियां, सुप्रीम कोर्ट के पारित समय-समय पर पारित आदेश व कहां किससे कौन से काग़ज़ तैयार करवाना है इसकी जानकारी भी।
याद करिए 15 अगस्त 2015 का दिन राष्ट्रीय सहारा में काम करने वाले कर्मचारी झंडारोहण के बाद बड़ी संख्या में सहारनपुर रोड स्थित एक वैवाहिक स्थल पर एकत्र हुए और यूनियन के गठन के प्रारूप पर चर्चा की। इसके लिए गाइड लाइन व पदाधिकारी के लिए नाम सुझाए गए। अभी इस विस्तार से चर्चा नहीं। एक कर्मचारी ने नोएडा स्थित एक अन्य कर्मचारियों को इन सारी चीजों की जानकारी दे दी और सहारा कर्मचारियों की यूनियन नहीं बन पाई। नोएडा में भी यही हुआ मुंबई वालों ने धोखा दिया। अगर आज यूनियन अस्तित्व में होती और किसी केंद्रीय मजदूर संगठन (सीटू, एटक या इंटक) से सम्बद्ध होती तो कर्मचारियों लड़ाई श्रम विभाग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक वह यूनियन लड़ रही होती वो भी कम खर्चे में, न कि एक-एक कर्मचारी को लड़नी पड़ती।
कोई बचा ही नहीं :अंत मार्टिन नीमोलर की इस कविता से…
“पहले वो कम्युनिस्टों के लिए आए, मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था। बाद में वो ट्रेड यूनियन के लिए आए तब भी मैं कुछ नहीं बोला, क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन वाला नहीं था। फिर वो यहूदियों के लिए आए मैं तब भी नहीं बोला क्योंकि मैं यहूदी नहीं था। और अंत में वह मेरे लिए आए तब मेरे लिए बोलने वाला कोई बचा ही नहीं था”। बस अपनी एकता-एकजुटता बनाए व बचाए रखिए।


