सुप्रीम कोर्ट ने कहा – नए नियम समाज को बांटने वाले। क्या अब भी किसी को इस सरकार के काम और रवैये पर संदेह रहना चाहिए? लेकिन अनिल मसीहों के खिलाफ कार्रवाई कब हुई है?
संजय कुमार सिंह
आज मेरे 10 में से सात अखबारों की लीड यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक है। बाकी तीन में एक नवोदय टाइम्स है। इसकी लीड का शीर्षक है, पंजाब केसरी को सुप्रीम कोर्ट से राहत। कहा, अखबार का प्रकाशन बिना रुके जारी रहेगा है। यह पंजाब केसरी समूह का अखबार है। दूसरा इंडियन एक्सप्रेस और तीसरा द हिन्दू है। दोनों बोफर्स घोटाले की खबरें छापने में आगे रहते थे। आज इन दोनों अखबारों ने यह बताने का मौका खो दिया कि लोकप्रिय (या वोट/चुनाव चोर) सरकार ने कैसे नियम बनाए हैं। अमर उजाला ने आज इसे सबसे विस्तार से बताया है जबकि इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू ने आर्थिक सर्वेक्षण की खबर को लीड बनाया है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, (आर्थिक) सर्वेक्षण) से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश/विदेशी निवेश प्रवाह में कमी और अस्थिरता के संकेत मिले। द हिन्दू का शीर्षक है, आर्थिक सर्वेक्षण में उज्ज्वल भारत और तेजी से अंधकारमय होती दुनिया की भविष्यवाणी की गई है। दूसरी ओर, बाकी के अखबारों ने बताया है कि (हिन्दू हित के लिए चुनी गई सरकार ने शंकराचार्य के साथ जो किया उससे अलग) आम नागरिकों के लिए क्या कर रही है या कैसा कानून बनाया था। यह वह कानून है जो सुप्रीम कोर्ट पर भारी दबाव की खबरों और उदाहरणों के बावजूद रोक दिया गया है। एसआईआर जैसा काम चल रहे हैं सो अलग।
आइए, पहले देख लें कि इस सरकार के सबसे ताजे और नए हेडलाइन मैनेजमेंट के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है। पहले की तरह सरकार समर्थक इसका भी प्रचार और बचाव कर ही रहे थे। खास बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने ही कहा है, “2026 के नियमों के व्यापक परिणाम होंगे जो समाज को विभाजित कर देंगे… क्या हम अब एक प्रतिगामी नीति की ओर बढ़ रहे हैं?” द हिन्दू ने इसे हाईलाइट किया है और मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की तस्वीर के साथ छापा है। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, “(सुप्रीम कोर्ट ने) प्रमुख सवालों का जवाब नहीं दिए जाने पर व्यापक नुकसान की चेतावनी दी”। अखबार ने सुप्रीम कोर्ट के सवाल भी बिन्दुवार छापे हैं जो इस प्रकार हैं, 1) जाति से संबंधित रैगिंग में नए नियम कैसे काम आएंगे? 2) अगर किसी गरीब अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्र को उसी जाति के किसी संपन्न छात्र द्वारा परेशान किया जाए तो क्या होगा? 3) जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए अलग छात्रावास क्यों? 4) जब भेदभाव को पहले से ही एक उपधारा में परिभाषित किया गया है, तो अलग परिभाषा की क्या आवश्यकता है? 5) अस्पष्ट भाषा के कारण, क्या प्रावधानों का दुरुपयोग नहीं होगा? इसके साथ अखबार ने यह भी बताया है कि 2012 और 2026 के नियम कैसे अलग हैं। हालांकि, अभी वह मुद्दा नहीं है। आज की खबरों से लग रहा है कि ये नए नियम देश समाज के लिए बेहद घातक हैं और एक ऐसी सरकार के शासन में बनाए गए हैं जो लगातार मनमानी करके भी चुनाव जीतती जा रही है और वोट चोरी के आरोपों को समाज का एक वर्ग अगंभीर मानता है। सरकार तो जो कर सकती है, सब कर ही रही है।
यह अलग बात है कि अखबारों में उसे रिपोर्ट नहीं किया जाता है। अमर उजाला ने आज इस खबर को पूरी जगह दी है और चूंकि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां ही सरकार के खिलाफ हैं। इसलिए उन्हें भी प्रमुखता से जगह मिली है। लीड का शीर्षक है, यूजीसी के नए नियम विभाजनकारी, अस्पष्ट दुरुपयोग की भी आशंका…. सुप्रीम कोर्ट की रोक। अखबार ने शीर्षक के ऊपर सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी को जगह दी है जो इस प्रकार है, यह बेहद गंभीर मामला है। अगर हम दखल नहीं देंगे, तो समाज के लिए विभाजनकारी हो सकता है और इसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। क्या हम जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने के बजाय पीछे जा रहे हैं?… नियमों की भाषा प्रथमदृष्ट्या अस्पष्ट है। इसे स्पष्ट और संतुलित बनाने के लिए विशेषज्ञों को विचार करना चाहिए, ताकि इनका दुरुपयोग न हो सके। कहने की जरूरत नहीं है कि मामला गंभीर है और सरकार का किया-धरा है या जिसका भी किया है उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए कि नहीं और अगर यह पहली दफा नहीं है तो क्यों नहीं होनी चाहिए। मुझे लगता है कि सरकार के कार्यों, नियमों और कानूनों से उसकी नीयत का पता चलता रहा है। उसकी प्राथमिकताएं भी उसके नीयत की चुगली करती रही हैं फिर भी सरकार चुनाव जीत जाती है तो यह अलग चिन्ता का विषय होना चाहिए लेकिन नहीं है और दिलचस्प यह कि राहुल गांधी या विपक्ष के बताने, ध्यान खींचने और आरोपों के बावजूद नहीं है। खबर के अनुसार, शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस भी दिया है। कहा है, सुनवाई पूरी होने तक 2012 की पुरानी नियमावली ही प्रभावी रहेगी। इसके अलवा अखबार ने मुख्य खबर के साथ जो छोटी-छोटी खबरें छापी हैं उनमें एक का शीर्षक है, छात्रावास के नाम पर बंटवारे को लेकर नाराजगी, कहा-भगवान के लिए ऐसा न करें। इसमें कहा गया है, पीठ ने नए नियमों के उन प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई, जो कैंपस के भीतर जातिगत आधार पर विभाजन का संकेत देते हैं। अलग-अलग जातियों के लिए अलग हॉस्टल के विचार पर सीजेआई सूर्यकांत ने सख्त लहजे में कहा, भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए। हम सब सदियों से साथ रहते आए हैं, हमारे समाज में अंतरजातीय विवाह तक होते हैं। क्या हम एक जाति विहीन समाज की ओर बढ़ने के बजाय पीछे जा रहे हैं?
इस लिहाज से सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है, पुनर्समीक्षा जरूरी, केंद्र विधि विशेषज्ञों की समिति बनाए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को पीठ ने सुझाव दिया कि नियमों की पुनर्समीक्षा के लिए प्रख्यात विधिवेत्ताओं की एक उच्चस्तरीय समिति बनानी चाहिए। समिति समाज की वास्तविकताओं और सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए नियमों पर पुनर्विचार करे। पीठ ने कहा, हमें यह भी देखना होगा कि कैंपस के भीतर लिए गए फैसलों का कैंपस के बाहर समाज पर क्या असर पड़ेगा। समाज का समग्र विकास तभी होगा, जब नियम समावेशी होंगे। जाहिर है, नए नियमों में इन बातों का ख्याल नहीं रखा गया है। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ऐसा मामला आया है तो उसे इसका कारण भी समझना चाहिए और ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे सरकार इस तरह की मनमानी नहीं कर पाए। उदाहरण के लिए पीठ ने पूछा है, सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को रैगिंग से बचाने के लिए कोई प्रभावी तंत्र क्यों नहीं। संभव है सरकार को लगता हो कि इसकी जरूरत ही नहीं है और सुप्रीम कोर्ट को यह जरूरी लगता है, तभी यह सवाल है। जब अखबार अपेक्षाकृत स्वतंत्र और समाज के लिए काम करते थे तब की बात अलग थी। अब अगर सरकार ऐसे नियम बना रही है जो सुप्रीम कोर्ट की राय में विभाजनकारी है तो यह देखा जाना चाहिए कि हर बार चुनाव जीतने वाली सरकार तीसरी बार चुनाव जीतकर ऐसे नियम बना रही है और इससे पहले नोटबंदी तथा कृषि कानून जैसी कार्रवाई कर चुकी है। इससे देश को कोई लाभ नहीं हुआ और सरकार ने सीख भी नहीं ली है।
दैनिक भास्कर ने लिखा है, भेदभाव रोकने से जुड़े यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे। मुख्य शीर्षक है, जाति का नया जंजाल रोका। अखबार ने सुप्रीम कोर्ट लाइव के तहत सवाल-जवाब प्रकाशित किया है। एक उदाहरण देखिए, याचिकाकर्ताः सामान्य वर्ग के फ्रेशर की रैगिंग कोई एससी वर्ग का सीनियर करे तो उसके पास कोई उपाय नहीं है। उल्टे पीड़ित पर ही केस संभव है। सीजेआईः क्या रैगिंग यूजीसी नियमों के तहत है? याचिकाकर्ताः नहीं। ये कैसे माना गया कि भेदभाव सिर्फ जाति आधारित है? अधिकतर उत्पीड़न जूनियर-सीनियर के आधार पर होता है। नए सत्र में रैगिंग भी होगी और क्रॉस-शिकायतें भी। सीजेआईः जाति रहित समाज की दिशा में हमने जो प्रगति की है, क्या अब उससे पीछे जा रहे हैं? देशबन्धु ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगी शीर्षक से छपी खबर के साथ पहले पन्ने पर बताया है, एसआईआर से जुड़ी याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित। खबरों के अनुसार एसआईआर में डेढ़ करोड़ नाम तार्किक विसंगति वाले थे। इनसे स्पष्टीकरण मांगा गया है और 90 लाख लोग सुनवाई में शामिल हो चुके हैं। बाकी के लिए सुनवाई जल्दी और तेजी से करनी है ताकि सबको तय समय में सुना जा सके। जाहिर है जो रह जाएंगे वे मतदाता नहीं बनेंगे, यह भी तय नहीं होगा कि वे घुसपैठिया हैं या नहीं। इसमें और चाहे जो हो, कोई मतदाता छूटे ना – के घोषित उद्देश्य का क्या होगा और अगर जो शामिल किए गए हैं वे नागरिक ही हैं, यह सुनिश्चित भी हो गया तो लाभ क्या हुआ जब उन्हें देश निकाला नहीं दिया गया। जाहिर है, एसआईआर से वही हो रहा है जो सरकार चाहती है या प्रधानमंत्री चाहते रहे हैं। इसके बावजूद एसआईआर रोका नहीं गया है और फैसले का इंतजार रहेगा।
हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक नए नियमों को सीधे समाज को बांटने वाला कहते हैं। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर लीड नहीं है लेकिन लीड के बराबर में पर्याप्त महत्व के साथ है। हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है लेकिन शीर्षक में कहा गया है, सामाजिक विभाजन को रेखांकित किया गया। द हिन्दू ने शीर्षक में नए नियमों को ‘व्यापक प्रभाववाला’ कहा है। दि एशियन एज ने बताया है कि इसका दुरुपयोग हो सकता है जबकि द टेलीग्राफ ने कहा है, सुप्रीम कोर्ट ने जातीय पूर्वग्रह वाले नियमों को स्टे कर दिया। नवोदय टाइम्स ने इसकी तीन खामियों से तीन लाइन का शीर्षक बनाया है। कुल मिलाकर, अखबारों में पहली बार इस सरकार की ऐसी आलोचना हुई है। हालांकि, इलेक्टोरल बांड का मामला ऐसा ही था और तब भी सरकार की आलोचना हुई थी और तब चूंकि सरकार अपेक्षाकृत नई थी और तब उसे चुनावी चंदे को अधिकृत रूप देने की कोशिश के रूप में पेश किया गया था। यही नहीं, वह योजना सरकार के पूर्वघोषित कामों में भी थी। सुप्रीम कोर्ट ने उसकी ऐसी आलोचना भी नहीं की थी। लेकिन इस बार जो हुआ वह निश्चित रूप से खास है और सरकार के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि इन नए नियमों से सरकार ने अपने खास समर्थकों को भी नाराज कर लिया था और बहुत सारे लोग खुलकर सरकार के सामने आ गए थे। सरकार के लिए यह सांप-छुछुंदर की स्थिति हो सकती थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के स्टे से सरकार का काम आसान ही हुआ है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


