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आज के अख़बार: प्रचार की राजनीति में पहले पन्ने से लोकतंत्र बेदखल, सरकार गायब, सुप्रीम कोर्ट का राज?

संजय कुमार सिंह

आज मेरे नौ में से सात अखबारों में सैनिटेरी पैड और अजीत पवार की पत्नी को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की खबरें पहले पन्ने पर है। दि एशियन एज में सैनिटेरी पैड की खबर पहले पन्ने पर नहीं है।  द हिन्दू में अजीत पवार की पत्नी को उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है – खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन अंदर होने की सूचना है। सैनिटेरी पैड वाली खबर अमर उजाला में लीड है। शीर्षक है, मासिक धर्म स्वास्थ्य मौलिक अधिकार, स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त सैनिटेरी पैड देना अनिवार्य। यह सुप्रीम कोर्ट का आदेश है और हर स्कूल में छात्राओं के लिए अलग शौंचालय होने का निर्देश दिया गया है। यह भी कि निर्देशों का उल्लंघन होने पर मान्यता रद्द होगी। मुझे लगता है कि 10 साल से ज्यादा समय से देश में भ्रष्टाचार मुक्त विकास की गाड़ी दौड़ने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ रहा है कि (प्राइवेट) स्कूलों में छात्राओं को सैनिटेरी पैड दिए जाएं और छात्राओं के लिए अलग शौंचालय हो तो प्रधानमंत्री ने नरेन्द्र मोदी ने जो शौंचालय बनवाए वे कहां गए और अगर स्कूलों के शौंचालय उनमें नहीं थे तो प्रचार किस बात का था? कहने की जरूरत नहीं है कि घरों में शौंचालय नहीं होंगे तो कोई न कोई व्यवस्था होगी, पूरा परिवार एक साथ भुगतेगा। लेकिन स्कूलों में नहीं थे और अभी अभी तक नहीं हैं तो सरकार को पता क्यों नहीं था, उसने अभी तक कुछ किया क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट को दखल देने की जरूरत क्यों पड़ी? अमर उजाला में मुख्य खबर के साथ एक और खबर है, आदेश सिर्फ अदालतों और कानूनी किताबों तक सीमित न रहे। खबर के अनुसार, जस्टिस जेबी पारदीवाला ने आदेश में कहा है, यह निर्णय सिर्फ अदालतों या कानून की किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह कक्षाओं में उन बालिकाओं के लिए है, जो मदद मांगने से झिझकती हैं। उन शिक्षकों के लिए है, जो संसाधनों की कमी के कारण मदद नहीं कर पाते। उन अभिभावकों व समाज के लिए है, जो अक्सर चुप्पी के असर को नहीं समझते। किसी भी बालिका को उसके शरीर के कारण दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। समाज की प्रगति इससे आंकी जानी चाहिए कि वह अपने सबसे कमजोर वर्गों की रक्षा कैसे करता है। कहने की जरूरत नहीं है कि अदालत के आदेश ऐसे ही पूरे और स्पष्ट होने चाहिए। वरना मोदी सरकार ने जो शौंचालय बनवाए थे उनमें पानी न होने और ताला लगा होने जैसी शिकायतें आम थीं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है तो स्पष्ट औऱ पूरा – लेकिन यह पहले पन्ने की खबर है?

खासकर तब जब खबर यह भी है कि फॉर्म 7 वोटर निपटाने का नया हथियार है। इस खबर का उप शीर्षक है, असम में भ्रष्टाचार और खराब प्रदर्शन के आरोपों से जूझती भाजपा को जीत के लिए फर्जी मतदाता सूचियों का ही भरोसा रह गया लगता है। अगर आपको लगता है कि यह खबर पहले पन्ने लायक नहीं है तो तथ्य है कि इसी 13 जनवरी की एक खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा में खातरा सिनेमा मोड़ के पास रोकी गई एक संदिग्ध गाड़ी की तलाशी में मतदाता सूची से नाम हटाने वाले ‘फॉर्म-7’ की लगभग 4,000 प्रतियां बरामद हुई थीं। इस सिलसिले में हिरासत में लिए गए लोगों में तालडांगरा विधानसभा क्षेत्र की बीबरदा ग्राम पंचायत की पूर्व भाजपा मंडल अध्यक्ष झुमा घोष के पति प्रबीर घोष का नाम सामने आया था। आप समझ सकते हैं कि इस खबर या फॉलोअप को मुख्यधारा का मीडिया क्यों नहीं महत्व दे रहा है और क्यों सैनिटेरी पैड से संबंधित आदेश को इतना महत्व दिया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि दूसरी खबर नहीं है। उदाहरण के लिए द हिन्दू में पहले पन्ने पर छपी एक खबर का शीर्षक है, मुठभेड़ में आरोपियों को पैर में गोली मारने के लिए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को फटकार लगाई। यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में भी है। इसका शीर्षक है, पुलिस न्यायपालिका की भूमिका नहीं निभा सकती’: हाई कोर्ट ने मुठभेड़ों को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस की कड़ी आलोचना की। मुझे लगता है कि हाईकोर्ट का यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के सैनिटेरी पैड वाले आदेश से ज्यादा महत्वपूर्ण है और उत्तर प्रदेश की डबल इंजन वाली सरकार का सच बताती है। इसलिए अखबारों में इसे प्रमुखता नहीं दी गई है ताकि आने वाले चुनावों में डबल इंजन सरकार की यह बुराई लोगों में मुद्दा न रहे।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने के अधपन्ने पर सुनेत्र पवार को आज उप मुख्यमंत्री बनाए जाने की खबर को लीड बनाया है और पहले पन्ने की लीड का शीर्षक है, मासिक धर्म से संबंधित साफ-सफाई बुनियादी अधिकार है। टाइम्स ऑफ इंडिया में एक और खबर है जो भाजपा सरकार की घुसपैठिया समस्या से जुड़ी है। खबर के अनुसार, हाईकोर्ट ने बंगाल सरकार से कहा है, सीमा पर बाड़ लगाने के लिए 31 मार्च तक भूमि हस्तांतरित करे। यह आदेश सेना के एक पूर्व उपप्रमुख, लेफ्टिनेंट जनरल सुब्रत साहा की जनहित याचिका पर दिया गया है। आप समझ सकते हैं कि चुनावी भाषणों में घुसपैठिए की समस्या पर बोलने वाली सरकार के मुखिया इस मामले में क्या कर रहे थे या जो किया वह कैसे किया होगा। इंडियन एक्सप्रेस ने यह खबर तो दी है कि अजीत पवार की पत्नी का महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री होना तय है और यह खबर सेकेंड लीड है। इसमें कहा गया है, एनसीपी प्रतिनिधिमंडल के मुख्यमंत्री फडणविस से मिलने के बाद यह निर्णय आया। इसके साथ छपी खबर का शीर्षक है, ‘हम क्या कर सकते हैं?’ : एनसीपी के विलय की चर्चा के बीच इंडिया (समूह) ने सीमित विकल्प होने का संकेत दिया। इस खबर में कहा गया है, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के फिर से एक होने की कोशिशों और इस अटकल के बीच कि शरद पवार के नेतृत्व वाला एनसीपी (एसपी) गुट विलय के बाद “सरकार में शामिल हो सकता है”, विपक्ष के इंडिया ब्लॉक की दूसरी पार्टियों ने इंतज़ार करो और देखो का रुख अपनाया है। दिल्ली में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के एक सीनियर नेता ने पूछा, “हम क्या कर सकते हैं?” “दोनों गुटों और (पवार) परिवार को फैसला लेना है। परिवार के एक सीनियर सदस्य की मौत हो गई है और हम अभी दखल नहीं देना चाहते और कोई पहल नहीं करना चाहते। हम हालात पर नज़र रख रहे हैं और जैसे-जैसे हालात बदलेंगे, हम कुछ करेंगे।” हिन्दुस्तान टाइम्स में आधा पन्ना विज्ञापन है। आधे में तीन-तीन कॉलम की यही दो खबरें हैं और सिंगल कॉलम की कुछ खबरें जो कुछ खास नहीं है। द टेलीग्राफ में भी आधा पन्ना विज्ञापन है। तीन कॉलम की लीड के साथ सैनिटेरी नैपकिन वाली खबर सिंगल कॉलम की है। दि एशियन एज में महाराष्ट्र की खबर लीड है और बिना विज्ञापन वाले पन्ने में सैनिटेरी नैपकिन की खबर नहीं है। यहां बंगाल चुनाव में भाजपा के अभियान और अमित शाह की समीक्षा खबर है। साथ ही सिंगल कॉलम की खबर के जरिए बताया गया है कि भाजपा ने 30 से ज्यादा ‘बाहरी’ नेताओं को बंगाल में चुनाव प्रचार के काम पर भेजा।

हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स में दोनों खबरें पहले पन्ने पर हैं। एक अलग खबर का शीर्षक है, गाजियाबाद से लखनऊ तक चार लेन का होगा रेल ट्रैक। आपको ऐसा न लगे कि इतनी सारी खबरों में प्रधानमंत्री की कोई खबर नहीं है तो नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर छपी खबर के अनुसार, मादुरो के पकड़े जाने के बाद पहली बार प्रधानमंत्री ने वेनेजुएला के कार्यवाहक राष्ट्रपति से बात की। नवोदय टाइम्स में एक और खबर प्रमुखता से है, केंद्रीय गृहमंत्री, अमित शाह ने कहा, कांग्रेस शासन के दौरान जनसांख्यिकी में आया बदलाव। इस खबर के अनुसार, असम के सात जिलों में घुसपैठिए बहुसंख्यक हो गए हैं। शून्य से बढ़कर 64 लाख हो गए हैं। हम जानते हैं कि असम में घुसपैठ की समस्या पुरानी है और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के नेतृत्व में 1979-1985 तक लंबा आंदोलन चला था। इसका मुख्य मकसद अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों (विदेशी नागरिकों) की पहचान, उन्हें मताधिकार से वंचित करना और निर्वासित करना था। यह 6 वर्षीय आंदोलन 1985 के असम समझौते के साथ समाप्त हुआ, जिसमें अवैध प्रवासियों के मुद्दे को सुलझाने का प्रयास किया गया। राज्य में आसू की सरकार भी रही। अभी भाजपा की सरकार है। 2016 में सरबानंदा सोनोवाल के नेतृत्व में पहली बार असम में भाजपा की सरकार बनी थी और तब से यह असम में सत्तारूढ़ है। सरबानंदा सोनोवाल (2016 से 2021 तक) के बाद भाजपा ने हिमंता बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बनाया जो अभी भी पद पर हैं। इस तरह अगर यह मान भी लिया जाए कि जनसांख्यिकी में बदलाव  कांग्रेस शासन के दौरान आया तो उसके बाद से भाजपा की सरकार है और 10 साल से है। हां, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा जरूर कांग्रेस में रहे हैं। जमीअत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख अरशद मदनी ने दावा किया है कि जब सरमा कांग्रेस में थे तो उन्होंने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर कहा था कि सरमा को टिकट न दिया जाए क्योंकि वे “आरएसएस मानसिकता” वाले हैं।

हिमंत बिस्वा सरमा ने अपनी राजनीति की शुरुआत 1991 में कांग्रेस से की थी। वे पहली बार 2001 में जालुकबारी सीट से कांग्रेस टिकट पर विधायक बने। इसके बाद उन्होंने लगातार 2006 और 2011 में भी जीत दर्ज की। 2011 का चुनाव कांग्रेस से उनका आखिरी विधानसभा चुनाव था। उस वक्त वे तरुण गोगोई सरकार में स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त और कृषि जैसे अहम मंत्रालयों के प्रभारी थे और कांग्रेस के सबसे प्रभावी चेहरों में गिने जाते थे। साल 2011 के बाद कांग्रेस में उनके और तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बीच मतभेद गहराने लगे। सरमा का मानना था कि गोगोई की पकड़ कमजोर हो रही है और नई नेतृत्व पीढ़ी को आगे लाने में पार्टी हिचक रही है। लंबे समय तक चले खींचतान के बाद उन्होंने आखिरकार 2015 में कांग्रेस छोड़ दी। द वायर की जुलाई 2025 की एक खबर के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में, सरमा के परिवार से जुड़े भ्रष्टाचार और ज़मीन हड़पने के कई आरोप हैं। उनपर भाई-भतीजावाद के आरोप भी हैं। इनमें कुछ को पत्रकारों द्वारा सूचना के अधिकार आवेदनों के जवाब में राज्य सरकार के विभागों द्वारा दी गई जानकारी से समर्थन भी मिला है। हाल के दिनों में, भ्रष्टाचार के आरोप और भी मज़बूत हुए हैं। अब इनमें ऐसे मंत्री भी शामिल हैं जिनकी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में अहमियत सिर्फ़ सरमा के टॉप पोस्ट पर होने की वजह से है। हेडलाइन मैनेजमेंट करने वाली प्रचारकों की सरकार में असली खबर देशबन्धु में है। बांग्लादेश ने भारत से स्पेशल इकनोमिक जोन छीना। चीन को ड्रोन फैक्ट्री बनाने के लिए जमीन दी और बांग्लादेश को 20 चीनी फाइटर जेट मिलेंगे। भारत सरकार की राजनीति, रणनीति और विदेश नीति से संबंधित एक महत्वपूर्ण खबर है जो मेरे किसी और अखबार में इतनी प्रमुखता से पहले पन्ने पर नहीं है। आप समझ सकते हैं कि अखबारों के पहले पन्ने से सरकार गायब है और सुप्रीम कोर्ट छाया हुआ है। सवाल उठता है कि देश सरकार चला रही है या सुप्रीम कोर्ट?

फोटो मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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