
अर्शाना आनंद-
ये तस्वीर हिंदुस्तान टाइम्स यानी हमारे दफ्तर के ठीक सामने की है। 25 जनवरी की रात तकरीबन दो या ढाई बजे। मेरी दोस्त और कलीग Vyoma Srivastava अपनी ड्यूटी खत्म करके अपने पति जो खुद भी पत्रकार के साथ हैं के साथ घर जा रही थी। साथ में दोनों का पांच साल का बेटा था। सड़क पे खड़ी गाड़ी को पीछे से किसी ने तेज टक्कर मारी। इतनी तेज कि गाड़ी की हालत आपको दिख ही रही है। व्योमा और उसके बेटे की हालत भी सामने ही है।
पिछले कुछ दिनों में ये तीसरी घटना है जब ऐसा हुआ। इससे पहले एचटी की ही Padmini Singh और टाइम्स से Arshi Rafique के साथ ऐसा ही हादसा हुआ था।
ये तस्वीर उन सभी दावों का आईना है जो कहते हैं कि शहर में यातायात व्यवस्था बढ़िया है। आधी रात को प्राइम इलाके में लोग ड्रंक ड्राइव कर रहे हैं। ओवरस्पीड कर रहे हैं। इंडिकेटर और हॉर्न की परवाह किए बगैर खड़ी गाड़ी से टकराए जा रहे हैं … और आप कह रहे हैं ऑल इस वेल।
नथिंग इस वेल। ऐसे लोगों का लाइसेंस कैंसल कीजिए जो इतनी गैर जिम्मेदार ड्राइविंग करते हैं।
हम लोग जर्नलिस्ट हैं। लेट नाइट तक काम करते हैं। दो या तीन बजे रात तक। अक्सर सुबह 10 से रात 3 तक यही हमारा रूटीन होता है। हमको इस पर गर्व भी है क्योंकि ये रूटीन हमने खुद चुना है। एंजाइटी, नींद न आना, बीपी, फिटनेस ये सब हमारी जिंदगी का हिस्सा है। इसलिए जब काम खत्म करके निकलें तो सुरक्षित घर पहुंचे इतना अधिकार तो होना ही चाहिए। हमारे साथ सबको होना चाहिए।
आरजे कादिर सिद्दीकी-
सौभाग्य से मैंने व्योमा मैम और अमित सर दोनों लोगो के साथ काम किया है और 6 साल इस तरह की ड्यूटी की है। नये साल के दौरान या फिर ऐसे त्योहारों पर जब लड़के रात को सड़कों पर पीकर हुदंग करने निकलते है तो एक डर हमेशा ही लगा रहता था। जब मैंने कार चलाना शुरू की थी तो अमित सर हमेशा कार को ठीक से आराम से चलाने की सलाह देते थे। वो कोई नये ड्राइवर नहीं है और इस घटना ने मेरे जैसे नये ड्राइवर के दिल में और डर पैदा कर दिया है और ऑफिस से घर जाते वक्त बहुत आराम से गाड़ी चलाती हुई जाती हूँ फिर भी दूसरों की गलती पर आप कुछ नहीं कर सकते। इसलिए आप तब तक सुरक्षित है जब तक इंसान अपनी जिम्मेदारी निभा कर और अपनी और दूसरों की जान की परवाह करते हुए गाड़ी ड्राइव कर रहा है।
रोजाना इस तरह की खबरों से हम दो चार होते रहते है लेकिन मामला जब करीब का होता है तो अहसास होता है इसलिए शराब पीजिए भरपूर पीजिए अपने गुर्दे फेफड़े सब गला दीजिए। सारा पैसा इलाज में लगा दीजिए घर को अपने बार बना दीजिए हमे कोई फर्क नहीं पड़ता बस सड़को पर मत निकले जिससे इस तरह के हादसे हो और आपकी गलती का खामियाज़ा किसी और को भुगतना पड़े। अल्लाह तौफीक दे ऐसे लोगों को और Vyoma Srivastava मैम और पालु को जल्द से जल्द सेहतमंद करे।
सुनो शुक्लाइन (एफबी पेज)-
ये वह दर्दनाक और खौफनाक मंजर है, जिसका मैं प्रत्यक्षदर्शी हूं और आए दिन लोहिया पथ पर ऐसी घटनाओं से दो चार होता रहता हूं। रात दो से तीन बजे के बीच दफ्तर से निकलने के बाद सांस अटकी रहती है कि बस किसी तरह से सुरक्षित घर पहुंच जाएं। आखिर क्यों कुछ लोग सड़क को अपनी बपौती समझते हैं। क्यों भूल जाते हैं कि सड़क पर अकेले वही नहीं चल रहे। वैसे दोष किस किस को दीजिए, जब पूरे कुएं में भांग पड़ी है।
सुबह बच्चों को स्कूल छोड़ने जाइए तो बड़ी संख्या में माता-पिता कार, बाइक और स्कूटी से उल्टी दिशा में बच्चों को लेकर दौड़ते दिख जाते हैं। अब ऐसे बच्चे भला क्या सीखेंगे? क्या लगता है सड़क सुरक्षा सिर्फ किसी एक व्यक्ति का काम है? सिविक सेंस नाम की भी कोई चीज होती है। हम क्यों भूल जाते हैं कि हमारी आजादी वहीं तक सीमित है, जहां से दूसरे की शुरू होती है।
Vyoma Srivastava ji Amit K. Jaiswal ji बेहद बहादुर बच्चा व्योमित जल्द से स्वस्थ हों


