संजय कुमार सिंह
अमर उजाला की आज की लीड का शीर्षक है, अब छह करोड़ लखपति दीदी बनेंगी, घायलों को मिलेगा 1.5 लाख का कैशलेस इलाज। यहां आयुष्मान योजना की चर्चा जरूरी है और यह शिकायत अक्सर सुनने में आती है कि भुगतान न मिलने के कारण अस्पताल ने इलाज से इनकार किया। जो व्यवस्था है उसमें आम लोगों को खुद कराए बीमा का मेडीक्लेम मिलने में मुश्किल आती है तो सरकारी योजना से पैसे मिलने में दिक्कत आएगी ही। उसे ठीक करने की बजाय सरकार अस्पतालों को योजना से अलग करने की कार्रवाई करती है जो योजना के लाभार्थी के लिए मुश्किल होगा और बीमा करने वाली कंपनी के लिए फायदेमंद। अखबारों में जनता की शिकायत कम छपती है योजनाओं का प्रचार ज्यादा होता है। होना उल्टा चाहिए। सरकार के प्रचार वाली इन खबरों के साथ आज एक खबर सेवा तीर्थ के उद्घाटन की भी है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे सेकेंड लीड बनाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की सेंकेड लीड अमेरिकी अदालत में निखिल गुप्ता की यह स्वीकारोक्ति है कि वे खालिस्तान समर्थक अमेरिकी नागरिक गुरपतवंत पन्नू की हत्या की साजिश के दोषी हैं। इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर विज्ञापन है और तीन ही खबरें हैं। पहली बांग्लादेश चुनाव, दूसरी नए प्रधानमंत्री कार्यालय सेवातीर्थ के उद्घाटन की और तीसरी निखिल गुप्ता का अमेरिका अदालत में अपराध स्वीकार करना। द हिन्दू की सेकेंड लीड मणिपुर हिंसा के मामलों में सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट पर है। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इस संबंध में रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा है। मणिपुर हिंसा के बारे में आप जानते हैं, हाल में नई सरकार ने शपथ लिया और एक मुख्यमंत्री ने दिल्ली से ही शपथ लिया जैसी सूचनाओं के बाद अब यह खबर है कि सुप्रीम कोर्ट सीबीआई से स्टेटस रिपोर्ट मांग रही है। इन खबरों से मुझे लगता है कि मामला राज्य और केंद्र सरकार की हाथ से निकल गया है पर खबर देने या उसे सार्वजनिक करने से बचा जा रहा है और यह वैसे ही है जनरल एमएम नरवणे की किताब के अंश की चर्चा कारवां में छपने के बाद भी अखबारों ने नहीं दी और सरकार पूर्व सेना प्रमुख की आत्मकथा के इस हिस्से के सार्वजनिक होने से इतना परेशान और नाराज है कि पहले किताब का प्रकाशन नहीं होने दिया और अब यह नियम बनाने पर विचार कर रही है कि किताबें 20 साल बाद ही लिखी जा सकेंगी। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, मंत्रिमंडल की बैठक में इसके अलावा यह भी विचार हुआ कि एपस्टीन मामले में सरकार को लगातार लग रहे आरोपों का जवाब देने से बचना चाहिए या जवाब देने की जरूरत नहीं है।
आप जानते हैं कि भारत के दो लोगों के नाम एपस्टीन की फाइल में दर्ज होने के राजनीतिक मायने लगाए जा रहे हैं। एक तो अनिल अंबानी और दूसरे केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी। राफेल सौदे के बाद अनिल अंबानी भले प्रधानमंत्री के करीबी दिखे हों, उन्हें सरकारी लाभ अपेक्षाकृत कम मिला है और वे सरकारी पद पर तो नहीं ही हैं। दूसरी ओर, हरदीप सिंह पुरी विदेश सेवा से रिटायर होने के बाद भाजपा के सदस्य बने और एपस्टीन फाइल में नाम आने के बाद कहा है कि आठ साल न्यूयॉर्क में रहते हुए भी एपस्टीन से तीन-चार बार ही मिलने के सबूत हैं। इसे गलती नहीं माना जाना चाहिए और वे एक आम नागरिक की हैसियत से मिलने गए थे। पर मुद्दा यह है कि वे भाजपा के सदस्य थे और जनप्रतिनिधि नहीं होने के बावजूद मंत्री थे। चुनाव हारने के बाद भी मंत्री रहे और राज्य सभा के सदस्य बनाए गए। क्या इसका संबंध एप्सटीन से मिलने में हो सकता है और नहीं है तो निजी तौर पर एप्सटीन एक यौन अपराधी से क्यों मिलने गए जब उनका उद्देश्य ऐसा नहीं था और अब यह प्रचारित किया जा रहा है कि एप्सटीन दलाल भी था और दलाल से मिलने में क्या बुराई है। यहां भी मुद्दा यह है कि भारत का कोई आम नागरिक एप्सटीन से उसकी दलाली के लिए भी मिलेगा तो कोई काम होगा और वह काम पुरी साब के पास क्या था। अनिल अंबानी का तो समझ में आ रहा है। अखबार इसपर खबर नहीं देंगे, सरकार आरोपों या सवालों के जवाब नहीं देगी अखबारों में सरकार का प्रचार ही खबर होगा। विज्ञापन में योजनाओं का 70 प्रतिशत तक फूंक देने का उदाहरण है। फिर भी निशिकांत दुबे जैसों की पार्टी चाहती है कि राहुल गांधी की सदस्यता खत्म हो, उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया जाए।

साफ है कि सरकार किसी तरह का विरोध नहीं चाहती है। मीडिया से लेकर अदालतों तक पर पकड़ होने और उसे जरूरत से ज्यादा मजबूत करने के बाद अब वह पुस्तक लेखन पर भी नियंत्रण के उपाय कर रही है। इसके बावजूद अभी की चिन्ता यह है कि जो खबरें हैं वो पहले पन्ने पर होती ही नहीं हैं। मुझे याद है, बचपन में अखबारों के पहले पन्ने पर विज्ञापन नहीं होता था। एक तो तब विज्ञापन होते नहीं थे फिर सबके बूते का नहीं होता था पहले पन्ने पर छपना। और अगर कभी कई विज्ञापन हो भी जाएं तो अखबारों का अपना नियम था कि वे पहले पन्ने पर एक ही विज्ञापन छापते थे और वह चौथाई पन्ने से भी छोटा होता था। अब पूरे पन्ने का विज्ञापन उतना नुकसानदेह नहीं है जितना खाली बची जगह जहां जिसे उस खबर से भर दिया जाता है जो वहां फिट होती है या ज्यादा हो तो बेरहमी से काटी जा सकती है या कट ही रही है। आज के अखबारों की खास बात यह है कि सरकार के खिलाफ खबरें पहले पन्ने पर होती ही नहीं हैं। दूसरी ओर, देशबन्धु में ऐसी कई खबरें हैं। सबसे पहले तो लीड, हरदीप पुरी के खिलाफ विपक्ष का हल्लाबोल। विपक्षी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे की मांग की। इसके समर्थ में वे एक बैनर भी लिए हुए थे जो लोकसभा में मार्शल आर्ट के उनके भाषण के संबंधित अंश को समझा रहा है। मुझे लगता है कि सरकार के खिलाफ यह फोटो अपने आप में बड़ी खबर है और खबर छापने पर खबर लिए जाने का डर नहीं होता तो यह खबर खूब छपती। अखबार की सेकेंड लीड का शीर्षक है, भाषण के हिस्से को हटाने पर भड़के खरगे, यह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ है। इसके साथ एक और खबर है, किसान संगठनों के नेताओं से मिले राहुल गांधी। अखबार में पहले पन्ने पर सेवा तीर्थ के उद्घाटन और बांग्लादेश के चुनाव की भी खबर है। डील को लेकर सरकार का नहीं तो ट्रम्प का पक्ष है और यह भी कि केंद्र सरकार ने लद्दाख को राज्य का दर्जा देने से इनकार कर दिया। तर्क यह दिया गया है कि लद्दाख के पास वित्तीय संसाधन नहीं है। उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद 70 और साथ जुड़े प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के साथ ही जम्मू कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया था। लद्धाख में लोगों का कहना है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी और संवैधानिक सुरक्षा न होने से क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति कमजोर होती है। जनरल नरवणे की किताब का उदाहरण ताजा है। पर सरकार जो कर रही है और क्या चाहती है उसे अखबार ठीक से बताते नहीं लगते हैं। दूसरी ओर, तथ्य है कि लद्दाखभारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगा संवेदनशील इलाका है। 2020 में गलवान घाटी में भारत-चीन झड़प के बाद सीमा सुरक्षा और स्थानीय भागीदारी का सवाल और प्रमुख हो गया। सोनम वांगचुक जेल में हैं। जमानत ही नहीं हो रही है। (समाप्त)
इससे पहले की किस्त पढ़िए : आज के अखबार : बांग्लादेश चुनाव की खबर को महत्व मिला है, प्रधानमंत्री के संदेश और फोन कॉल को नहीं।
लिंक : https://www.bhadas4media.com/bangla-desh-chunav-ko-pramukhta/

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


