नितिन त्रिपाठी-
समय था जब ईरान मिडल ईस्ट का राजा होता था पर्सिया की सभ्यता वैश्विक सभ्यताओं में होती थी. बस एक दिन के हमले में सुप्रीम नेता खामेनेई का खात्मा हो गया. और इसी के साथ होपफुल्ली मज़हबी अंधता का अंत होगा. मिडल ईस्ट में वो देश जो सत्तर तक ग़रीब थे जैसे यूएई, कतर आदि आज ये सब वैश्विक संपन्न केटेगरी में आते हैं और ईरान का इतना बुरा हाल.
निःसंदेह अनर्गल घमंड का अंत नहीं होता तो हो सकता है अभी कुछ दिन तक ईरान में ये सब चलता रहे. पर निर्णय ईरान के निवासियों के हाथ में है. उन्हें पुनः उसी अंधकार में जा कर सीरिया बनना है या अन्य मिडल ईस्ट के देशों की तरह विकास का पढ़ चुनना है.
शेष रसिया हों या चाइना ये आज तक किसी देश की रक्षा न कर पाये पिछले सत्तर साल का इतिहास गवाह है. इनका काम ही है सामने वाले देश को आगे रख उसके रिसोर्सेस और ज़मीन का उपभोग करना फिर मुसीबत में उसे छोड़ भाग लेना. ख़ामेनेई के ख़ात्मे से वैश्विक राजनीति में चाइना ले सबसे मज़बूत सहयोगी का खात्मा हुआ. भारत के लिए भी यह उचित ही है.
जब दुनिया भर में इतनी समस्याएँ चल रही हों, तो सुबह की चाय पीते हुए ईश्वर, अपने देश और अपनी सरकार का धन्यवाद करिए। भारत में हम लोगों की ज़िंदगी आज भी काफी सुकून और स्थिरता के साथ चल रही है। आपरेशन सिंदूर केवल पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई नहीं था, बल्कि भारत के विरुद्ध चीन, तुर्की और अमेरिकी हथियारों की एक प्रकार से प्रयोगशाला भी था। हमारी पराक्रमी सेना ने इन सभी ड्रोन और आधुनिक हथियारों का मलवा तक हमारे ऊपर नहीं गिरने दिया; उन्हें सीमा से दूर ही नष्ट कर दिया। यह हमारे लिए गर्व और विश्वास का विषय है। किसे पता था कि भारतीयों के सपनों का प्रतीक माने जाने वाले दुबई के पाम जुमेराह जैसी आलीशान इमारतों के जलने के वीडियो भी देखने पड़ेंगे?
शिकायतें हम सबको बहुत हैं, और रहेंगी भी। आखिर मानव जीवन है, एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है, सुविधाओं और बेहतर जीवन की आकांक्षा स्वाभाविक है। लेकिन इस पूरे अस्थिर दक्षिण एशिया, मिडिल ईस्ट, यूरोप और रूस की परिस्थितियों के बीच, भारत इस समय दुनिया के सापेक्ष बेहतर स्थिति में खड़ा है। युद्ध किसी काम का नहीं होता। चार गुनहगारों के साथ अक्सर चार सौ निर्दोषों की बलि चढ़ती है। पीछे रह जाते हैं अनाथ बच्चे और उजड़े हुए परिवार। .. ईश्वर से प्रार्थना है कि हर जगह युद्ध रुके और विश्व में शांति की स्थापना हो।भारतीय होने पर गर्व था, गर्व है और गर्व रहेगा।जय हिंद, जय भारत -वैभव अग्रवाल
सुभाष सिंह सुमन-
अमेरिका-इजरायल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत हो चुकी है। साथ में उनकी बेटी, दामाद, नाती की भी मौत हुई है। ईरान की सेना इसके बाद भी लड़ने का दम दिखा रही है, लेकिन अब बहुत लड़ाई बची नहीं है। यह तय मानिये कि ईरान में सत्ता बदल रही है और अमेरिका-इजरायल के हितों का ध्यान रखने वाली नयी सरकार बनने जा रही है। जैसा सीरिया में हुआ, जैसा वेनेजुएला में हुआ, वैसा ही ईरान में होना तय है।
अमेरिका-इजरायल ने 24 घंटे भी नहीं लगने दिये और ईरान की सत्ता का शीर्ष समाप्त कर दिया। मतलब अमेरिका-इजरायल की तैयारी जबरदस्त थी। बहुत होमवर्क किया गया होगा और उसे अच्छे से जमीन पर उतारा गया होगा। लोग बता रहे हैं कि मोसाद ने ईरान में चलने वाले एक ऐप को हैक कर लिया, जिस ऐप पर लोग धार्मिक कार्यों के लिए निर्भर करते थे। उसे हैक कर लोगों को भ्रमित करने वाले नोटिफिकेशन भेजे गये।
इससे पहले एक रिपोर्ट आयी थी, उसमें बताया गया था कि ईरान ने अपनी सरकार-सेना में मोसाद की घुसपैठ पकड़ने के लिए एक एलीट यूनिट बनायी। बाद में मालूम हुआ कि उस एलीट यूनिट में भी 20 से ऊपर लोग मोसाद के लिए काम कर रहे थे। सोच सकते हैं मोसाद ने कहाँ तक घुसपैठ की होगी! ईरान की मौजूदा व्यवस्था में गहरी पैठ के बिना इतनी जल्दी खामेनेई का पतन संभव नहीं था। मोसाद ने दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों के लिए एक नया चैप्टर जोड़ दिया है। अब बैठकर सब पढ़ें इसे।
दुनिया में दो तरह के लीडर होते हैं। एक लीडर, जो अपने लोगों के बेहतर भविष्य के लिए समझौते करते हुए चलता है। संतुलन बनाते हुए अपने देश और अपने लोगों को मजबूत बनाता है। सबसे बढ़िया उदाहरण- देंग श्याओपिंग। इस भाई ने कन्फ्यूसियस के सिद्धांतों का पालन किया। चुप मारकर चीन को आर्थिक ताकत बनाया। बहुत समझौते किये इसके लिए। उसी का परिणाम है आज जिनपिंग को ट्रंप के सामने निहुरना नहीं पड़ता है।
दूसरा लीडर स्वाभिमान से संचालित होता है। वह मिट जायेगा, लेकिन स्वाभिमान नहीं बेचेगा। ऐसे लीडर्स का अंत सुखद नहीं होता, लेकिन अंत के बाद भी सम्मान मिलता है। खामेनेई इसके ताजा उदाहरण। खामेनेई की उम्र 86 साल थी। सोच सकते हैं 86 साल का एक बुजुर्ग, सामने तय मौत देखकर भी लड़ने के जज्बे के साथ खड़ा था। इसके लिए इतिहास इस बुजुर्ग को सदा सम्मान ही देगा।
एक और बड़ी सीख है कि कोई भी सत्ता हो, उसे इस हद तक निरंकुश नहीं होना चाहिए, कि अपने लोगों को ही बल से चलाना अपरिहार्य हो जाये। सत्ता के लिए शक्ति का उपयोग अनिवार्य है, लेकिन उसकी एक हद होनी चाहिए। वर्ना आप जिनके लिए लड़ने-मरने को तैयार होंगे, वही ऐन मौके पर दुश्मन से मिल जायेंगे।
इस घटनाक्रम ने दो स्पष्ट निष्कर्ष भी निकाले हैं। चीन की आर्थिक ताकत असंदिग्ध है, लेकिन उसके हथियारों की ताकत शुद्ध संदिग्ध है। पहले दुनिया ने ऑपरेशन सिंदूर में चीनी हथियारों का हश्र देखा। वेनेजुएला में अमेरिकी सेना आयी और राष्ट्रपति को उठाकर ले गयी। चीनी एयर डिफेंस धरा रह गया। और अब ईरान में। अमेरिका-इजरायल आया, सुप्रीम लीडर को सपरिवार साफ कर गया, और चीनी एयर डिफेंस देखता रह गया। जो देश चीनी हथियारों के दम पर शेर बन रहे हैं, अब सभी आराम से बैठकर सोच-विचार करेंगे। खुद चीन भी।
दूसरा निष्कर्ष है:- फिलहाल चचा की चौधर बरकरार है और रहने वाली है। पुतिन भी ढीले पढ़ रहे हैं। उधर से खबर आ रही है कि रूस अब अमेरिका की वह शर्त मानने को तैयार हो गया है, जिसमें यूक्रेन को सुरक्षा की गारंटी देने की बात है। मतलब जो शांति समझौता होगा, उसमें यूक्रेन को अमेरिका से सुरक्षा की गारंटी मिलेगी। रूस इस शर्त को सिरे से खारिज करते आया है, लेकिन अब स्वीकार करने के लिए तैयार हो रहा है।
भारत के लिए भी इसमें लेसन हैं। कल दुनिया ने कई अरब देशों में ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को गिरते देखा। बहुतों को हवा में ही मार गिराया गया, लेकिन कई सारे निशाने तक पहुँचे। जबकि उन सभी देशों के पास अमेरिकी एयर डिफेंस है। ऑपरेशन सिंदूर में भारत पर पाकिस्तान ने सैकड़ों ड्रोन-मिसाइल छोड़े। एक भी ड्रोन-मिसाइल निशाने पर नहीं लगा। यह हमारी सेना की तैयारी और उनके कौशल का प्रमाण है। हमारे पास कोई दैवीय तकनीक या हथियार नहीं है, लेकिन हमारे पास सेना बहुत अनुशासित और काबिल है।
भारत के लिए एक और लेसन यह है कि पुरानी पीढ़ी के शानदार योगदानों को याद करें, उनका धन्यवाद कहें। इंदिरा गाँधी से अटल बिहारी वाजपेयी तक और भाभा से कलाम तक, हमारे बुजुर्गों ने हमें परमाणु शक्ति संपन्न नहीं बनाया होता, तो हमारी स्थिति भी ईरान-वेनेजुएला जैसी ही होती।


