संजय कुमार सिंह
सारी दुनिया जब युद्ध पर प्रधानमंत्री के कुछ बोलने का इंतजार कर रही है तो जो कहा है वह आज मेरे नौ अखबारों में सिर्फ अमर उजाला में पहले पन्ने पर है। खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है, संवाद-कूटनीति से हो विवादों का समाधान। खबर के अनुसार, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ हैदराबाद हाउस में साझा प्रेस कांफ्रेंस में पीएम मोदी ने कहा, दुनिया में चल रहे अनेक तनावों को लेकर भारत की सोच स्पष्ट रही है। बहुत सारे लोग इसी ‘स्पष्ट सोच’ की अभिव्यक्ति का इंतजार कर रहे थे। अगर यह अपेक्षा के अनुसार होता तो और भी अखबारों में इसी या ऐसे ही शीर्षक से छपता। ऐसा है नहीं। इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर एक जैसी पर इससे थोड़ी अलग है। प्रधानमंत्री ने खाड़ी (के देशों पर) हमले की निन्दा की, कहा भारतीयों की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। इस खबर के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात पर हुए हमलों की निंदा करने के बाद, प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार को सऊदी अरब और बहरीन के नेताओं से भी बात की। इन देशों पर ईरान द्वारा किए गए हमलों की भी निंदा की। उन्होंने खाड़ी देशों को निशाना बनाने के प्रति तेहरान की गहरी असहमति का संकेत दिया, हालांकि उन्होंने ईरान का नाम नहीं लिया। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री की चुप्पी के मायने हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे पहले पन्ने पर बताया है और यह भी कहा है कि प्रधानमंत्री बोल रहे हैं तो क्या, आलोचना कर रहे हैं तो किसकी। मुझे लगता है कि किसने किस पर हमला किया, कितने मरे, क्या ध्वस्त हुआ से जरूरी है कि हमारी सरकार इस बारे में क्या सोच या कर रही है और वहां फंसे लोगों की सुरक्षा के लिए सरकार की योजना क्या है। पर वह सब पहले पन्ने की खबर नहीं है। क्यों नहीं है इसे समझना मुश्किल नहीं है। मोटे तौर पर सिर्फ इसलिए कि अखबारों में सरकार की आलोचना करने वाली या सरकार को खराब रोशनी में दिखाने वाली सामग्री नहीं के बराबर छपती है।
युद्ध की खबरों के बीच आज हिन्दुस्तान टाइम्स में दो दिलचस्प खबरें एक साथ हैं। एक तो दिल्ली दंगे से जुड़े मामले में भाजपा नेता कपिल मिश्रा की भूमिका सीबीआई ने खारिज की। यह सिंगल कॉलम की खबर है। भाजपा नेता के खिलाफ मामला नहीं होने या चलने का उदाहरण। यह अलग बात है कि कपिल मिश्रा आम आदमी पार्टी से भाजपा में गए हैं। दूसरा मामला आम आदमी पार्टी के संस्थापक अरविन्द केजरीवाल का है। अदालत से मामला खारिज किए जाने के बाद सीबीआई ने हाईकोर्ट से कहा है कि निचली अदालत का आदेश अवैध है। इन दो खबरों से अंदाजा लगता है कि सीबीआई क्या है या क्या होना चाहती है। जो भी हो, आप जानते हैं कि निर्वाचित सरकार के अपने अधिकार और कर्तव्य हैं। एक सरकार ने नियम बनाया उससे किसी को फायदा होगा किसी को नुकसान। जिसे फायदा हो वह कमीशन दे ही सकता है, लिया जाता रहा है और नहीं तो भाजपा को चंदा क्यों मिल रहा है और जांच क्यों नहीं हो रही है और आम आदमी पार्टी के खिलाफ मामले की जांच हो गई, जेल या सजा भी हो ही गई है, चुनाव भी हार गए। फिर भी कोर्ट ने कहा कि मामले में दम नहीं है, फंसाने वाले के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए पर सीबीआई है जो कह रही है, मामला बनता है, फिर सुनो आदि आदि। सरकार सीबीआई के साथ है। दूसरी सरकार के साथ नहीं। पता नहीं, सीबीआई ऐसा अपने दम पर कर पा रही है या बता रही है कि उसकी सरकार ऐसा चाहती है। मामला व्यवस्था का है और उसपर खबर होती नहीं है। खबरें तो जो हैं सो हैं ही।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता और खबरों की निष्पक्षता के मामले में समस्या इतनी ही नहीं है। अमर उजाला में पहले पन्ने पर कनाडा के साथ आर्थिक साझेदारी की खबर भी है। दूसरे अखबारों में कनाडा के साथ व्यापार करार की खबर तो है लेकिन विवादों के लिए मोदी के समाधान की खबर किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं दिखी। देशबन्धु में, टॉप पर दो कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, कांग्रेस ने ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की हत्या की निन्दा की। मुझे लगता है कि सरकार और प्रधानमंत्री की ओर से कुछ नहीं है या वही है जो हमने देखा है तो अखबारों को चाहिए था कि कांग्रेस के बयान को ही महत्व देते। लेकिन इससे मिर्ची लगने की आशंका से इंतजार नहीं किया जा सकता है और संभव है इसलिए दूसरे अखबारों में प्रमुखता से न हो। आज मिर्ची लगने की एक और खबर है जिसे अखबारों ने महत्व नहीं दिया है। मिर्ची लगने की बात इसलिए कि आज सोनिया गांधी ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा है। इसका शीर्षक है, ईरान के नेता की हत्या पर सरकार की चुप्पी निष्पक्षता नहीं है, यह (सत्ता की जिम्मेदारी को) त्यागना (एबडिकेशन) है। राहुल गांधी ने इसके एक अंश को साझा करते हुए लिखा है, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने इस महत्वपूर्ण वैश्विक मोड़ पर लिखते हुए इस बात पर जोर दिया है कि भारत को संप्रभुता और शांति के लिए खड़ा होना चाहिए और अपनी नैतिक शक्ति को फिर से प्राप्त करना चाहिए। लेख में कहा गया है, “जब किसी विदेशी नेता की लक्षित हत्या पर हमारा देश संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून का कोई स्पष्ट बचाव नहीं करता और निष्पक्षता का त्याग कर देता है तो हमारी विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा होता है। ऐसे में चुप्पी साधना तटस्थता नहीं है।” आप इसे कांग्रेस की नीति या विचार कह सकते हैं पर मौजूदा स्थिति में यह सही है। और कंप्रोमाइज्ड कहे जा रहे पीएम ऐसा नहीं कर रहे हैं तो उसका मतलब है। और उसे समझने-समझाने की जरूरत है। आज के अखबारों में भले ऐसी खबरें हैं लेकिन सब मिलकर ऐसा करते नहीं लग रहे हैं।
आज पहले पन्ने की खबरों में एक यह भी हो सकती थी कि एआई समिट के दौरान प्रदर्शन करने वाले युवक कांग्रेस के सदस्यों को जमानत मिल गई और जेएनयू के गिरफ्तार छात्रों को जमानत मिलने के बाद भी रिहा नहीं किया गया तो अदालत ने जमानत की शर्त में राहत दी। यह खबर भी बहुत कम अखबारों में बहुत छोटी सी है। द हिन्दू में प्रदर्शन करने वाले युवक कांग्रेस के अध्यक्ष की जमानत पर स्टे खारिज किए जाने की खबर है तो दि एशियन एज ने युवक कांग्रेस के नौ लोगों को जमानत मिलने की खबर दी है। नवोदय टाइम्स में युद्ध के अलावा वनतारा स्थापना दिवस पर करीब आधे पन्ने की खबर है जो कई तस्वीरों के साथ है। द टेलीग्राफ ने पहले पन्ने की खबर से बताया है कि एक अकेली महिला ने 40 लोगों के नाम हटाने के आवेदन दिए थे इनमें से 39 मुसलमान हैं। 28 फरवरी को जो प्राथमिक अंतिम मतदाता सूची जारी हुई है उसमें ये सभी 40 लोग हैं। इनमें से कुछ ने थाने में शिकायत लिखाई है और पुलिस ने कहा है कि जांच चल रही है। शिकायत करने वाली महिला ने कहा है कि उसने ये शिकायत नहीं की है और उसे फंसाया गया है। जो भी हो, खबर तो महत्वपूर्ण है लेकिन इसकी चर्चा नहीं है और आज कलकत्ता को अखबार में तो पहले पन्ने पर है लेकिन एसआईआर से संबंधित पश्चिम बंगाल की खबर सिर्फ बंगाल के अखबार में पहले पन्ने पर है तो कोई खास बात नहीं है। देशबन्धु ने एसआईआर पर ममता बनर्जी के आरोपों को महत्व दिया है। उन्होंने कहा है और यही शीर्षक है, भाजपा की मदद के लिए मतदाताओं के नाम काटे गए। यही नहीं, मुख्य मंत्री ने बंगाल में इन दिनों चल रही भाजपा की परिवर्तन यात्रा पर भी हमला बोला है लेकिन यह सब दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। दूसरे अखबारों में गृहमंत्री का अलर्ट भी नहीं है जो राज्यों को भेजा गया है और देशबन्धु की खबर के अनुसार, ईरान पर हमले से भारत में हिंसा भड़कने का डर है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


