अवधेश अकोडिया-
टीवी की ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ वाले शोर-शराबे से बहुत पहले, जब ख़बरें इत्मीनान से ‘सुनी’ जाती थीं। तब शाम ढलते ही गांव-ढाणी से लेकर शहरों तक रेडियो ऑन होने पर बस उसी एक आवाज़ का इंतज़ार रहता था, जिसका समापन ‘नारायण बारेठ, बीबीसी, जय-पूर!’ से होता था। ख़बरों की यह भरोसेमंद आवाज़ अब हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई है।
उन्हें सियासत और समाज की महीन समझ थी। हिंदी के साथ-साथ उर्दू और अंग्रेज़ी पर भी उनकी ग़ज़ब की पकड़ थी। जब भी कोई उनके इस मुकम्मल इल्म की तारीफ़ करता, तो वे अपनी उसी जानी-पहचानी सादगी से मुस्कुराकर कहते— ‘मैं पढ़ाई में कभी मेधावी छात्र नहीं रहा, बस उन लोगों से पढ़ता-सुनता हूं जो अपने-अपने क्षेत्र में सिद्ध हैं।’ उनका ‘डार्क ह्यूमर’ ज़बरदस्त था। किसी बेहद गंभीर और तनावपूर्ण बहस के बीच भी वे अपने मारक ‘वन-लाइनर्स’ से ऐसा सटीक व्यंग्य कसते कि सुनने वाला बस अवाक रह जाता।
वैचारिक तौर पर उनकी लाइन जग-ज़ाहिर थी, लेकिन उनकी ख़बरों या विश्लेषण में इसका पूर्वाग्रह कभी नहीं दिखा। सामान्य बातचीत में भी दूसरों के विचारों और असहमति का सम्मान करने का सलीका उन्हें बख़ूबी आता था। यही वजह थी कि हर विचारधारा और दल के नेता उनके मुरीद थे। वे जहां-जहां रहे, वहां दोस्तों की टोली उनसे जुड़ती चली गई। इन सबसे उनका जुड़ाव आख़िरी सांस तक रहा।
वे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर भी रहे, लेकिन युवा पत्रकारों के लिए उनकी असली ‘पाठशाला’ तो कई साल पहले ही शुरू हो गई थी, जो उनके बीमार होने से पहले तक अनवरत चलती रही। जेकेके के कॉफ़ी हाउस में वे अक्सर पत्रकारिता की इसी नई पौध से घिरे रहते। अपनी क़िस्सागोई के बीच, न जाने कितनों को उन्होंने ख़बरों के कितने ही गुर सिखा दिए। और यह सब किसी गुरु-शिष्य या वरिष्ठ-कनिष्ठ के दायरों में नहीं, बल्कि एक बेहद अज़ीज़ दोस्त की तरह होता था। अपनी उम्र से आधे युवा पत्रकारों से मिलते ही उनका पहला आत्मीय संबोधन होता था— ‘क्या हाल है साब!’
अलविदा सर…
भारत सरन-
एक आवाज हमेशा हमेशा के लिए…. खामोश हो गयी.. “मैं नारायण बारेठ BBC हिन्दी, जयपुर ” … अब यादों में हमेशा जिंदा रहेगी…
सुबह-सुबह मीडिया जगत के हमारे बड़े भाई आदरणीय श्री बाबु लाल जी धायल जी की पोस्ट को … देखा.. एक बार के लिए तो यकीन ही नहीं हुआ…. जब भी जयपुर जाना होता है तो नारायण सर से आशीर्वाद हमेशा मिलता रहा …. एक मधुर आवाज.. . हिन्दी उर्दू के शब्दों का जादुई अंदाज़ में धारा प्रवाह….
1994 से जब से BBC को पिताजी के मार्गदर्शन में सुनना शुरू किया था तब से पत्र व्यवहार से संपर्क में आए BBC के संवाददाताओं में नारायण सर का विशेष मार्गदर्शन और आशीर्वाद लगातर बना रहा….


Fifty Villagers के लिए आपका बहुमूल्य योगदान रहा… कई बार जयपुर से चल कर बाड़मेर आना हुआ… सबसे ज्यादा सुकून मिलता जब आपने 21 मार्च 2018 को Fifty Villagers के कार्यक्रम की खिंची हुई तस्वीर को अपने WhatsApp की DP बनाई और वो आज भी उनके no..+91 78528 84856… पर दिख रही है… मगर वो आवाज नहीं सुनने को मिलेगी…” देखो डॉ सहाब.. मेरा जितना तजुर्बा है…….आदि-आदि….” घंटों बातें होती… देश और दुनिया की.. शिक्षा और किताबों की…. युवाओं और रोजगार की…
Fifty Villagers की पहली शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री की स्क्रिप्ट नारायण सर के द्वारा लिखी गयी थी…. उसको आवाज देने के लिए जब आदरणीय किशोर जाखङ को बताया कि ये आदरणीय नारायण सर ने लिखा है.. और आप अपने हिसाब से परिवर्तन कर सकते हैं… किशोर जी ने जवाब दिया….” फिर तो बिना कोई परिवर्तन के ही रिकार्ड किया जाएगा… उनके लिखने के बाद उनको शब्दों में रिकार्ड करना हमारा सौभाग्य है….” ये उनके प्रति सम्मान का भाव था… वो इसके लाख-लाख बार हकदार हैं…
मूल्यों की पत्रकारिता को करने वाले सरल ह्रदय, कर्तव्यनिष्ठ, मानवीय मूल्यों को समर्पित महान आत्मा को मालिक अपने दिल में जगह दे… हम उनके बताए मूल्यों को जीवन में सदैव पालन करेंगे… यही उनको सही मायने में श्रद्धांजलि होगी….
नारायण जी ने बीबीसी (BBC) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता कर अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई। एक कुशल प्रशासक के रूप में सूचना आयुक्त के पद पर रहते हुए भी उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी।
नारायण सर न केवल एक समर्पित पत्रकार थे, बल्कि एक अत्यंत सरल और नेक दिल इंसान भी थे। उनका ऐसे असमय जाना पत्रकारिता जगत के लिए एक बड़ी क्षति है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि शोकाकुल परिजनों को यह आघात सहने की शक्ति प्रदान करें एवं दिवंगत आत्मा को शांति दें। ॐ शांति!
मूल खबर…


