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“सम्मान के नाम पर अपमान?” अमर उजाला के क्षेत्रीय सहयोगियों की पीड़ा

आदरणीय अमर उजाला प्रबंधन,

सविनय निवेदन है कि सबसे पहले इस बात पर स्पष्टता होनी चाहिए कि जो क्षेत्रीय सहयोगी अमर उजाला परिवार से जुड़े हैं, वे सम्मान के लिए जुड़े हैं या दिन भर मजदूरी करने के लिए। यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि जब भी मानदेय की बात होती है तो प्रबंधन यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि “आपका परिवार अमर उजाला से जुड़कर तो चल नहीं रहा है, आप लोग तो सिर्फ सम्मान के लिए जुड़े हैं।”

लेकिन दूसरी ओर संपादकीय विभाग की ओर से आदेश ऐसे दिए जाते हैं जैसे हम कोई वेतनभोगी कर्मचारी हों, जिनसे हर समय जवाबदेही ली जाती है। यदि किसी कारणवश कोई खबर छूट जाए तो क्षेत्रीय सहयोगियों को इस तरह लज्जित किया जाता है मानो बहुत बड़ा अपराध हो गया हो।

जब प्रबंधन खुद कहता है कि हमारा घर इससे नहीं चलता और हम केवल “सम्मान” के लिए जुड़े हैं, तो फिर छोटी-सी चूक पर अपमानित क्यों किया जाता है? सम्मान के नाम पर जुड़े लोगों को लगातार अपमानित करना न तो उचित है और न ही न्यायसंगत।

हम लोग अमर उजाला से सम्मान और पत्रकारिता के जुनून के कारण जुड़े हैं। लेकिन यह दुखद है कि जो लोग मोटी सैलरी लेकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं, वही लोग सम्मान की धज्जियां उड़ाने का काम कर रहे हैं।यहीं हाल मार्केटिंग विभाग का है जब इतनी बड़ी कर्मचारियों की फ़ौज खड़ी है तो उन लोगों से बाजार से व्यापार कराया जाए क्षेत्रीय लोगों का सहयोग लिया जाए न कि उन लोगों की जबाव देही तय की जाए। कमीशन के नाम पर हों रहे उत्पीड़न से मानसिक दबाव बन रहा है। क्या कंपनी में मौजूद मोटी सैलेरी वालें इस बात पर रखें जाते है कि क्षेत्रीय लोगों पर उत्पीड़न कर सके। बाजार में जब पैसा डूबता है तो एक आम सहयोगी उस भुगतान को कैसे चुकायागा। कंपनी में बैठे लोगों को तो ए लगता है कि जैसे हम लोग पत्रकरिता के नाम पर दलाली कर रहे हों या संस्थान के नाम पर ठेकेदारी कर रहे हों। सम्मान के लिए जुड़े लोगों पर इस तरह आपम्मानित करना बहुत ही शर्मनाक है। कृपया कर विचार करें।

अतः प्रबंधन से विनम्र निवेदन है कि इस विषय पर स्पष्ट नीति बनाई जाए—क्या क्षेत्रीय सहयोगी सम्मान के लिए जुड़े हैं या उनसे मजदूरों की तरह काम लिया जाएगा। सम्मान के नाम पर अपमान की यह स्थिति लोगों को झकझोर कर रख देती है।


आदरणीय अमर उजाला प्रबंधन

महोदय में कानपुर यूनिट का एक संवाद न्यूज एजेंसी का अपमानित मजदूर हूं। बहुत पीड़ा और मानसिक प्रताड़ना के साथ लिखना पड़ रहा है कि जिस अमर उजाला को कभी “परिवार” कहा जाता था, आज उसी परिवार के पुराने और समर्पित साथियों को आपके अधिकारी अपमानित कर परिवार को छोड़ने पर मजबूर कर रहे हैं। अपमान का स्तर इतना बढ़ गया है कि अखबार की दुनिया से जुड़े होने पर शर्मिंदगी सी लगने लगी है। सम्मान के नाम पर मिलने वाले मानदेय 300-2500 के सापेक्ष अब उत्पीड़न की इबारत बन गई है।

एक समय था जब अमर उजाला की पहचान केवल एक अखबार नहीं, बल्कि रिश्तों, विश्वास और सम्मान की संस्कृति से होती थी। स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी और राजू माहेश्वरी जैसे लोग अपने साथियों के सुख-दुख में खड़े रहते थे। जमीन पर काम करने वाले एजेंट, संवाददाता और सहयोगी खुद को इस परिवार का हिस्सा समझते थे ओर उनकी हर समस्याओं के समाधान के लिए खड़े रहते थे. अब समाधान नहीं अब एफआईआर दर्ज कराने की धमकी दी जाने लगी है।

आज संपादकीय स्तर पर अभद्र भाषा का प्रयोग करना आम हो गया है। इस तरह जलील किया जाता है जैसे कि हम सहयोगी नहीं उनके गुलाम हों। मार्केटिंग टीम द्वारा संवादताओ को लीगल नोटिस की धमकियां दी जा रही हैं। जिसने कंपनी के लिए व्यापार किया वह अब कानून की जद में आ रहा है। कंपनी के लाखों रुपए के व्यापार में चंद कमीशन की लालच में रिस्क उठा रहा संवाददाता संपादकिए व मार्केटिंग की टीम के लिए चोर है। प्रसार विभाग द्वारा वास्तविक मांग से अधिक सप्लाई भेजकर एजेंसियों पर कागजों में आउटस्टैंडिंग खड़ी कर दी और फिर उसी बकाये को लेकर मानसिक दबाव बनाया जा रहा है।

सबसे दुखद बात यह है कि वर्षों से कंपनी को खड़ा करने वाले लोगों को ही संदेह की नजर से देखा जा रहा है। जो लोग जमीन पर दिन-रात मेहनत करके अमर उजाला परिवार के लिए व्यापार व अखबार को पाठकों तक पहुंचाते हैं, अब उन्हें ही चोर साबित कर जलील किया जा रहा है। इस तरह आपम्मानित किया जा रहा है जैसे कि अमर उजाला के साथ जुड़कर बहुत बड़ी भूल कर दी हों। अभी तक किसी भी संस्थान में कोई घपले बाजी उजागर हुई है तो वों कंपनी में बैठे बड़े पदों के स्तर पर पकड़ी गई है, लेकिन अफ़सोस जों खुद कांच के मकान में बैठे है वों जमीनी स्तर से जुड़े आम सहयोगी को चोर साबित करने में लगें हुए है।

स्कीम के नाम पर रद्दी करवाकर लाखों रुपए का खेल हों गया लेकिन चोर एजेंट बन गया, कंपनी के लिए एक-एक रुपए का व्यापार करने वाले संवादाता का हज़ारों पैसा मारा गया है वों चोर बन गया, संपादकीय स्तर पर मंथली ढील कर हज़ारों रुपए का खेल करना लेकिन क्षेत्र में काम करने वाला संवाद सहयोगी चोर हों गया। जब हम सभी लोग चोर है तो सबको बाहर निकाल दीजिए क्यों रोज रोज आपम्मानित कर मानसिक उत्पीड़न कर रहे है।

क्या यही वह अमर उजाला है जिसकी नींव सम्मान और भरोसे पर रखी गई थी?

अगर जमीनी स्तर पर जुड़े लोगों की समस्याओं और सम्मान को इसी तरह नजरअंदाज किया जाता रहा, तो यह केवल कुछ लोगों की नाराजगी नहीं, बल्कि धीरे-धीरे पूरे नेटवर्क में असंतोष फैल रहा है। इसका असर कंपनी की साख और भविष्य दोनों पर पड़ रहा है। आज फर्क देखिये जों परिवार की नीव बनकर खड़े है उन्हीं को उसी परिवार में आए किरायेदार कमजोर कर रहे है।

अमर उजाला से जुड़े लोग आज भी सम्मान चाहते हैं, टकराव नहीं। उम्मीद है कि प्रबंधन इस आवाज को हमारी पीड़ा समझ कर कोई सम्मान जनक मार्गदर्शन करें। क्योंकि संस्थाएं इमारतों से नहीं, लोगों के सम्मान से खड़ी होती हैं, लेकिन अफ़सोस वो भी दरकने लगी है।

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