यशवंत सिंह-
अब से सोलह साल पहले बुलंद एलीवेट्स में अपना घर बुक कराने वाले आज भी नहीं जानते कि यह खुशकिस्मती आखिर कब उनके हिस्से आएगी। नोएडा एक्सटेंशन में गौड़ सिटी-2 इलाके का कुल आठ सौ फ्लैट्स और कुछ कमर्शियल प्रॉपर्टी वाला यह प्रॉजेक्ट अपने बिल्डर के घपलों के चलते लगभग डिलिवरी स्टेज में आकर फंस गया और तब से अब तक दलदल से निकलने का नाम ही नहीं ले रहा है। ‘भड़ास’ से इसका भावनात्मक संबंध यह है कि कुछ वरिष्ठ पत्रकार भी सन 2010 से ही यहां घर खरीद कर फंसे हुए हैं, उनकी भी सुनने वाला कोई नहीं है।
पहली बार यह प्रॉजेक्ट जमीन अधिग्रहण को लेकर किसानों की ओर से दायर मुकदमे के चलते फंसा और फ्लैट बुक कराने वालों से बढ़ा हुआ मुआवजा वसूलकर फिर से चालू हुई। फिर यह नोटबंदी के चलते फंसा। अंत में कोरोना के दौरान पार्टनर्स के आपसी झगड़े में इसका बिल्डर जेल गया। जिन बैंकों से उसने लोन ले रखा था उनकी पहल पर बुलंद एलीवेट्स का केस एनसीएलटी में गया। वहां दो साल की सुनवाई के बाद ट्राइब्यूनल अदालत ने इस बिल्डर को प्रॉजेक्ट से बाहर किया और एक अन्य कॉन्स्ट्रक्शन कंपनी एसआरए का रिजॉल्यूशन प्लान मंजूर किया।
कायदे से इसके बाद प्रॉजेक्ट को पूरा करने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए थी, लेकिन फिर ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी आड़े आ गई और किसी न किसी बहाने से काम को हरी झंडी देने के मसले पर कन्नी काटने लगी। काफी बाद में, एनसीएलटी के फैसले के लगभग साल भर बाद पता चला कि अथॉरिटी ने रिजॉल्यूशन प्लान के तहत खुद को मिलने वाली रकम को नाकाफी बताते हुए इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का फैसला किया है।
बुलंद एलीवेट्स में घर बुक कराने वाले अब एसआरए के ग्राहक बन चुके थे। रिजॉल्यूशन प्लान पर अमल न होने के मुद्दे पर दो बार उन्होंने नए बिल्डर और अथॉरिटी, दोनों के खिलाफ दो प्रदर्शन किए, लेकिन मामला एक सूत भी आगे नहीं बढ़ा। अथॉरिटी के सुप्रीम कोर्ट जाने पर उन्होंने बिल्डर को साथ लेकर अधिकारियों से मुलाकात की और निवेदन किया कि जितनी रकम एनसीएलटी से मंजूर हुई है, उतनी लेकर वे काम शुरू हो जाने दें, फिर सुप्रीम कोर्ट अगर इसे बढ़ाने का फैसला करता है तो जितनी भी रकम बढ़ेगी, उतनी बाद में अथॉरिटी में जमा कर दी जाएगी।
इसपर अधिकारियों का रुख नरम था और उन्होंने कहा कि ठीक है, प्रॉजेक्ट पर तैयारी वाले कुछ काम आप शुरू कर सकते हैं, फिर जल्द ही कुछ फॉर्मलिटीज पूरी हो जाने पर इसे विधिवत आगे बढ़ाएं। इस बातचीत को भी छह महीने पूरे होने जा रहे हैं और प्रॉजेक्ट जहां था, वहीं पड़ा हुआ है। बिल्डर का कहना है कि अथॉरिटी जबतक उसे अपना डिमांड लेटर नहीं भेजती, तब तक अपनी पूंजी वह इस प्रॉजेक्ट में कैसे फंसा सकता है। उससे जुड़े कुछ अन्य लोग इतने तक ही सीमित नहीं हैं। वे सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाने के बाद ही आगे बढ़ने को कह रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील के भी कुछ अलग पेच हैं। पता चल रहा है, ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी की पिटीशन में किसी तकनीकी गलती की वजह से केस रजिस्टर ही नहीं हो पा रहा है। यानी सोलह साल से चल रहे इस अधूरे प्रॉजेक्ट पर काम स्थगित है, जिसे व्यवहारतः स्टे ऑर्डर जैसा ही माना जा सकता है, लेकिन इसकी जवाबदेही किसी पर नहीं है।
इस बीच सन 2010 से 2026 के बीच एक पूरी पीढ़ी बच्चे से जवान हो चुकी है। लोगों की किस्मतें बदल देने के वायदों के साथ छोटे-बड़े न जाने कितने चुनाव लड़े जा चुके हैं। केंद्र और राज्य में तीन-तीन सरकारें बदल चुकी हैं। लेकिन जीवन भर की कमाई लगाकर फंसे लोग (अगर जीवित हुए तो) जहां पहले फंसे थे, वहीं आज भी फंसे हैं।


