
जब महाभियोग के साये में चुनाव चल रहे हैं तो क्लर्क की गलती में फंसा हुआ है चुनाव आयोग, पुलिस और सुप्रीम कोर्ट का बचाव साफ है लेकिन खबरें इतनी उलझी हुई नहीं हैं। 2019 के बंगाल चुनाव में सरकार ने जिस आईपीएस को कोलकाता का पुलिस कमिश्नर बनाया था वे टाइम्स ऑफ इंडिया में 20 मार्च को प्रकाशित खबर के अनुसार भाजपा के उम्मीदवार हैं।
संजय कुमार सिंह
इधर कुछ समय से युद्ध की खबरों के जरिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि बनाने का काम चल रहा था और इसी से सरकार की कूटनीति का भी प्रचार हो रहा था। नरेन्द्र मोदी ईरान की तरफ बढ़ते और होर्मुज स्ट्रेट खुलवाने के महान कार्य में सक्रियता से लगे बताए जा रहे थे और यह प्रचार किया जा रहा था कि यह सब वही कर सकते हैं। इस दशा में कल मैंने लिखा था, मोदी पहली बार बोले लेकिन सुर-ताल समझ नहीं आया। आज अन्य अखबारों के साथ टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, “ट्रम्प ने ‘लूप में रखे जाने के लिए‘ प्रधानमंत्री को फोन किया, मोदी ने (होर्मुज) स्ट्रेट (पर) बात की”। अखबार ने लिखा है कि युद्ध शुरू होने के बाद से यह दोनों के बीच पहली वार्ता है। इस कॉल की खबर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने दी। इन्होंने एक समाचार चैनल को यह भी बताया कि ट्रंप प्रधानमंत्री मोदी को लूप में रखना चाहते हैं। मोटे तौर पर इसका मतलब है, जानकारी देते रहना चाहते हैं। जो स्थितियां हैं उसमें प्रधानमंत्री पर आरोप लग रहे हैं कि वे स्वतंत्र फैसले नहीं ले सकते हैं और अखबारों ने दिखाने की कोशिश की कि वे देश हित में परिश्रम कर रहे हैं तो ट्रम्प ने फोन करके और उसे सार्वजनिक करके क्या किया इसे भी समझना होगा। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, ट्रम्प ने कहा कि होर्मुज को खुला रखना महत्वपूर्ण है। मुझे लगता है कि यह तो सबको पता है और सबकी जरूरत भी। इसके लिए मोदी के बाद ट्रम्प का अपनी तरह से सक्रिय होना, पहले की घोषणाएं और फोन कर लूप में रहना या रखना – सामान्य व्यवहार नहीं है। ट्रम्प की राजनीति हो या रणनीति – इसपर अखबारों में विचार नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने ट्रम्प के फोन कॉल से अलग, युद्ध जारी रहने और संबंधित वार्ता को लेकर अनिश्चितता की स्थिति को लीड बनाया है। सेकेंड लीड आरक्षण वाली खबर है।
आप जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में चुनाव की घोषणा हो चुकी है और एसआईआर से संबंधित शिकायतों का निपटारा नहीं हुआ है। जो हुआ है वह संतोषजनक नहीं है और मुख्य चुनाव आयुक्त महाभियोग के साये में हैं फिर भी चुनाव करवा रहे हैं और क्लर्क की गलती से चुनाव आयोग की भाजपा से मिलीभगत की पोल खुल चुकी है। इसके बावजूद सीजेआई ने मंगलवार को कहा, पश्चिम बंगाल को छोड़कर जिन भी राज्यों में एसआईआर किया गया, हर जगह यह प्रक्रिया सुचारू (बिना बाधा के) रूप से चली। अन्य राज्यों में राज्यों में भी जटिलताएं हैं, लेकिन समान रूप से नहीं। लेकिन जटिलताएं तो हैं। कुल मिलाकर अन्य राज्यों से शायद ही कोई मुकदमा आया। आज अखबारों में यह खबर तो है लेकिन अखबारों ने यह बताने की जरूरत नहीं समझी है कि बंगाल का मामला क्यों अलग है। या दूसरे राज्यों से शिकायत नहीं आने का मतलब यह नहीं है कि वहां शिकायत नहीं है या बंगाल की शिकायत बेमतलब है। उदाहरण के लिए बिहार में एसआईआर के समय कई शिकायतें रहीं। उनका जवाब आज तक नहीं है। चुनाव हो गए, केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को फायदा हुआ और यह प्रचारित किया गया कि बिहार चुनाव खत्म होने के बाद 45 दिनों तक कोई शिकायत नहीं आई। बाद में जब जनसुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में बिहार विधानसभा चुनाव रद्द करने की मांग की तो याचिका खारिज कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने जनसुराज पार्टी को पहले हाईकोर्ट जाने को कहा। इसके बाद जन सुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली। अब मामला हाईकोर्ट में है। आप जानते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बिहार सरकार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना को मंजूरी दी थी। इसके तहत चुनाव के दौरान महिलाओं को दस हजार रुपए का लाभ दिया गया जो आचार संहिता का उल्लंघन है। यह एक मजबूत कानूनी मामला है। इसी आधार पर जन सुराज ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।
आपको याद दिला दूं कि तमिलनाडु में लोगों को मुफ्त बिजली देने की राज्य सरकार की योजना पर सख्त रवैया अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु समेत सभी राज्यों को कड़ी फटकार लगाई थी। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा है कि ज्यादातर राज्य राजस्व घाटे में हैं, लेकिन विकास की बजाय मुफ्तखोरी में पैसे लगा रहे हैं। तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन ने केंद्र सरकार के एक नियम को चुनौती दी थी। कॉर्पोरेशन ने इसे राज्य के कामकाज में दखल और लोगों के कल्याण के लिए शुरू की गई योजना के विरुद्ध बताया था। कॉर्पोरेशन की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रह्मण्यम की दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया। लेकिन तमिलनाडु में बड़ी संख्या में लोगों को मुफ्त बिजली देने पर नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा, ‘देश में हम कैसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं? जो लोग बिजली का बिल चुकाने में असमर्थ हैं, उनके लिए कल्याणकारी योजना होनी चाहिए। सबको मुफ्त सुविधा क्यों दी जाए? समस्या यह है कि अब हर राज्य में ऐसी प्रवृत्ति बढ़ रही है। हम इस पर चिंतित हैं।’ चीफ जस्टिस ने कहा, ‘राज्य का कर्तव्य रोजगार के अवसर पैदा करना है। आप सुबह से लेकर दिन भर मुफ्त भोजन देने, मुफ्त साइकिल, मुफ्त बिजली और अब सीधे लोगों के खातों में नकद ट्रांसफर करने में लगे हैं। ऐसे में विकास के लिए धन कहां बचेगा?” (19 फरवरी 2026 की खबर)
आज इस खबर की चर्चा का कारण यह है कि दिल्ली की भाजपा सरकार ने बजट पेश किया है और अमर उजाला तथा नवोदय टाइम्स का पहला पन्ना विज्ञापन जैसा लग रहा है। दोनों में दो पहले पन्ने हैं दिल्ली की कई खबरें हैं। इन खबरों में एक खबर (नवोदय टाइम्स) है, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने बजट पेश करते हुए कहा किया कि उनकी सरकार आगामी वित्त वर्ष में भी मुफ्त बिजली की स्कीम को जारी रखेगी। नई व पुरानी योजनाओं के लिए दिल्ली सरकार ने इस बजट में बिजली विभाग के लिए 3942 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। इसमें बिजली सब्सिडी के लिए 3500 करोड़ रुपए और हवा में झूलती बिजली की तारों को अंडरग्राउंड (भूमिगत) करने के लिए 200 करोड़ रुपए का प्रावधान शामिल है। इन खबरों से लगता है कि देश में भाजपा सरकार के लिए अलग नियम हैं, दूसरे दलों की सरकारों के लिए अलग। जो भी हो, तथ्य यह भी है कि नरेन्द्र मोदी एक देश एक कानून की बात करते रहे हैं लेकिन वह भी सिर्फ भाजपा के लिए है। दुर्भाग्य यह है कि इसे देखा-दिखाया नहीं जा रहा है। बिहार में चुनाव हो चुका है और तमिलनाडु में चुनाव होने हैं। बंगाल में चुनाव का मामला कई कारणों से खास है और सुप्रीम कोर्ट की कल की टिप्पणी आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर और द टेलीग्राफ में है।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के अधिवक्ता कपिल सिबल से पूछे गए सुप्रीम कोर्ट के एक और सवाल तथा इस पर उनके जवाब को भी खबर के साथ हाईलाइट किया है। आप जानते हैं कि जनवरी में ईडी ने पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक के ठिकानों पर छापेमारी की थी। इनमें कोलकाता का उसका दफ्तर भी था। आरोप है कि उस दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मौके पर पहुंच कर कुछ दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण (फोन, लैपटॉप, आईपैड आदि) वहां से उठा लिए थे। आज छपी खबरों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि क्या किसी सरकारी अधिकारी के मौलिक अधिकार नहीं होते हैं या केवल अधिकारी होने के कारण वे अपने मौलिक अधिकार खो देते हैं? जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि ईडी के कुछ अधिकारियों ने इस मामले में व्यक्तिगत रूप से भी याचिका दायर की है। कोर्ट ने साफ कहा, “क्या ईडी के अधिकारी अधिकारी हो जाने की वजह से इस देश के नागरिक नहीं रह जाते? उनके मौलिक अधिकारों का क्या?” पीठ ने कहा कि ईडी के कुछ अधिकारियों ने अपनी व्यक्तिगत क्षमता में अदालत में याचिका दायर की है।
मुझे लगता है कि ईडी के राजनीतिक उपयोग के कारण केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे ईडी की रक्षा करें लेकिन यह स्थिति क्यों आई वह भी एक मुद्दा है। ऐसा ही अरविन्द केजरीवाल मामले में सीबीआई के साथ हुआ है। अदालत ने सीबीआई अधिकारी के के खिलाफ भी आदेश दिए हैं और चूंकि सीबीआई अधिकारी ने केंद्र सरकार के कहने पर काम किया है इसलिए उसे सीबीआई अधिकारी की रक्षा करनी ही होगी। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट अलग नहीं हो सकता है। इस तरह राज्य की सरकार, मुख्यमंत्री या सत्तारूढ पार्टी के खिलाफ केंद्र सरकार, उसकी एजेंसियां तो हो ही गईं इनके अधिकारियों की व्यक्तिगत याचिकाओं का ख्याल रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट को भी केंद्र सरकार के साथ या राज्य सरकार के खिलाफ होना होगा। इसलिए बुनियादी मुद्दा राज्य सरकार के खिलाफ जांच का है और फैसला इसपर होना चाहिए कि उसकी जरूरत है या नहीं और है तो क्यों? अगर है तो केंद्र सरकार के खिलाफ वैसे ही मामलों की जांच कौन कराएगा और नहीं कराएगा तो क्या केंद्र सरकार को वह सब बड़े पैमाने पर कर दिया जाएगा जो केंद्र सरकार राज्य सरकार को नहीं करने दे रही है।
द टेलीग्राफ के शीर्षक, दीदी को सुप्रीम कोर्ट के दोहरे झटके – को इसी आलोक में देखा जाना चाहिए। स्थिति यह है कि केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस से चुनाव लड़ रही है। उसके मातहत ईडी का छापा इसी संदर्भ में था (और नहीं भी हो तो आरोप यही है) ऐसे में ममता बनर्जी की कार्रवाई ईडी या ईडी के अधिकारियों के खिलाफ हो भी तो अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ भी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट उसे सरकार और उसके मातहत अधिकारी को स्वतंत्र निष्पक्ष नागरिक के रूप में देखता लग रहा है। जो भी हो, मामला जितना गंभीर है उतनी गंभीरता से आज अखबारों में नहीं छपा है। सोशल मीडिया में बताया गया है कि बंगाल का मामला क्यों अलग है और यह भी कि भारतीय जनता पार्टी चुनाव जीतने के लिए राज्य में सरकारी अधिकारियों (और जजों का भी) लाभ के लिए उपयोग करती रही है। उदाहरण के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जज अभिजीत गंगोपाध्याय मार्च 2024 में अपने पद से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए थे। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर पश्चिम बंगाल की तामलुक सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल कर सांसद बने। इसी तरह, 2019 में चुनाव के समय सरकार ने जिस अफसर को कोलकाता का पुलिस कमिश्नर बनाया था। टाइम्स ऑफ इंडिया में 20 मार्च को प्रकाशित खबर के अनुसार वे अब भाजपा के उम्मीदवार हैं। 1990 बैच के आईपीएस डॉ. राजेश कुमार जगतदल से 2026 में भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। खबर उनका चुनाव लड़ना नहीं है। 2019 में उन्हें चुनाव के समय पुलिस कमिश्नर बनाया जाना है। इसी तरह, बिहार के चर्चित और कड़क आईपीएस जयंत कांत की पत्नी स्मृति पासवान भाजपा नेता हैं। जमुई से टिकट चाहती थीं। अब उनके पति मालदा के चुनाव पर्यवेक्षक हैं। इसी तरह, इस बार चुनाव से पहले बंगाल में ईडी का छापा पड़ा। मुख्यमंत्री की अपनी शिकायत थी। उनकी अपनी कार्रवाई की आलोचना हुई लेकिन ईडी की कार्रवाई और उसके समय से दिक्कत नहीं है। अरविन्द केजरीवाल और हेमंत सोरेन का मामला सर्वविदित है।
कहने की जरूरत नहीं है कि अदालतों के आदेशों, सुप्रीम कोर्ट के सवालों और कार्रवाइयों से संबंधित खबरों में अक्सर भाजपाई नजरिया चीखता रहता है। आज ऐसी ही एक खबर अमर उजाला में है। शीर्षक है, “धर्म बदला तो खत्म हो जाएगा एससी का दर्जा : सुप्रीम कोर्ट”। द हिन्दू में यह खबर लीड और हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड है। खबर यह है कि आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को शीर्ष कोर्ट ने बरकरार रखा है। खबर में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि प्रमाणपत्र पर भी लाभ नहीं मिलेगा। यह कानूनी नजरिया (और आदेश) है। जाहिर है हाईकोर्ट का भी नजरिया कानूनी ही था जो नहीं माना गया। इसलिए फैसले पर टिप्पणी की जरूरत नहीं है – एक ही मामले में कानून के अनुसार दो परस्पर विरोधी फैसले हैं, लिए गए हैं। लेकिन कानून का अनुपालन तो मुद्दा होना ही चाहिए। यहां कुछ फैसले और स्थितियों की याद आती है। इनमें डिग्री दिखाना और चुनाव लड़ने के लिए दाखिल शपथपत्रों की सत्यता की जांच ही नहीं मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित नियम पर फैसला और सुनवाई का मामला भी है। राजनीतिक नजरिया तो हो ही सकता है। मेरा मानना कि जाति के आधार पर आरक्षण का अधिकार देना विवेक और उदारता का मामला है। अधिकार की जरूरत समझना भी इसी श्रेणी के तहत आएगा। संविधान के निर्माताओं ने इसकी जरूरत समझी इसलिए ऐसा कानून बनाया। इससे किसी लाभ की उम्मीद रही होगी और अब इससे संबंधित फैसलों में यह देखा जाना चाहिए कि वह लाभ हुआ या नहीं और नहीं हुआ तो कैसे मिले। जाहिर है कि इस कानून को लागू हुए काफी समय हो चुका है और अनंत काल तक लागू रहने का मतलब नहीं है लेकिन प्रभावी नहीं होता तो लागू रखना पड़ेगा और अनुपालन उदारता से नहीं हो तो फायदा भी नहीं होगा। दूसरी ओर, राजनीति ने आर्थिक आधार पर आरक्षण का नया मामला बना दिया। इसका दुरुपयोग हो रहा है सो अलग। फिर भी इस कानून का लाभ उदारता से नहीं देना मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट का कानूनी नजरिया जो हो, इस फैसले में जिनके लिए आरक्षण का प्रावधान है उनके प्रति उदारता नहीं दिखती है। इसलिए यह खबर लीड है। देशबन्धु में यह टॉप पर दो कॉलम में है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


