कन्हैया शुक्ला-
अपने ही देश में ऐसे ऐसे पत्रकार पड़े हैं जो बहुत बहुत शानदार काम कर रहे हैं. हद से ज्यादा जोखिम उठाते हुए। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित एरिया बस्तर के एक ऐसे ही पत्रकार हैं, नाम है विकास तिवारी “रानू”… अब तक करीब 171 माओवादियों की सक्रिय समाज में वापसी करवा चुके रानू जैसे लोग सही मायनो में पत्रकारिता के असली नायक हैं।
बस्तर, जो क्षेत्रफल में केरल से भी बड़ा माना जाता है, वहां पत्रकारिता की असली जिम्मेदारी ज्यादातर स्थानीय पत्रकारों ने ही संभाली है। वही सबसे पहले खबरें तोड़ते हैं, फोटो और वीडियो जुटाते हैं, जिन्हें बाद में बड़े शहरों के पत्रकार अपने नाम से चलाते हैं। पहले इन ‘स्ट्रिंगर्स’ को शायद ही कभी क्रेडिट मिलता था, लेकिन अब तकनीक ने उन्हें अपनी आवाज दी है—एक ऐसी आवाज जो न तो दबाई जा सकती है, न छीनी जा सकती है।
विकास उर्फ रानू तिवारी का प्रोफाइल….
जगदलपुर के विकास उर्फ रानू तिवारी ने जनवरी 2021 में ‘बस्तर टॉकीज’ नाम से अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया, यह नाम उन्हें तब लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी ने सुझाया था। जिसके आज 605K से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं, और तीन हजार के आसपास वीडियो अपलोड हुए हैं। इससे पहले रानू ट्रांसपोर्ट और मोबाइल दुकान जैसे कई छोटे-मोटे काम करते थे, लेकिन सब बंद हो गया। 2013 में उन्होंने बिना किसी औपचारिक ट्रेनिंग के पत्रकारिता शुरू की। हालांकि, कुछ समय तक रानू स्थानीय चैनलों जैसे inh न्यूज, न्यूज24 का डिजिटल प्लेटफार्म लल्लूराम इत्यादि के लिए सक्रिय रहे, लेकिन जल्द ही निराश हो गए।
विकास बताते हैं, “मुझसे कहा जाता था कि माइनिंग कंपनियों पर पॉजिटिव स्टोरी करो, जबकि मैं जानता था कि वे आदिवासियों के लिए कुछ नहीं कर रही हैं। यहां तक कि उनका CSR फंड भी बस्तर में खर्च नहीं हो रहा था।” इसी असंतोष के चलते उन्होंने अपना चैनल शुरू किया।
वह कहते हैं, “साथ ही मुझे यह डर भी सताने लगा था कि सत्ता का गुणगान करने वाली खबरों के चलते कभी ग्रामीण मेरे साथ मारपीट कर सकते हैं, इसलिए मैंने मुख्यधारा के चैनल छोड़ने का फैसला किया।”
रानू कहते हैं कि अब उन्हें मुख्यधारा के किसी समाचार चैनल में नौकरी करने की कोई इच्छा नहीं है और वह पूरी तरह अपने यूट्यूब चैनल पर ही ध्यान दे रहे हैं। वह कहते हैं, “मैं एक पत्रकार हूं और मेरा काम लोगों तक कहानियां पहुंचाना है। मुझमें चाय की दुकान चलाने जैसा कोई दूसरा हुनर नहीं है, इसलिए फिलहाल मेरा पूरा फोकस अपने यूट्यूब चैनल को आगे बढ़ाने पर है।”
फेसबुक पर बस्तर टॉकीज चैनल के पेज पर 357k फालोवर्स हैं, वहीं अब तक 3.5k वीडियो अपलोड किए जा चुके हैं। एफबी पर बस्तर टॉकीज के पेज का जो बायो है उसमें लिखा है- इस टॉकीज में लगने वाली हर फिल्म का किरदार आदिवासी है।

लंबे समय से छत्तीसगढ़ में नक्सलवादी जड़ जमाये हुए थे जिसके खात्मे की तारीख़ मार्च 2026 रखी गयी थी. लगता नही था कि ऐसा संभव हो पायेगा.
एक कलमकार Ranu Tiwari ने छत्तीसगढ़ के सुदूरवर्ती, पहुँच और मार्ग विहीन नक्सल गढ़ में एक ऐसा इतिहास रचा जिससे छत्तीसगढ़ नक्सल मुक्त हो पा रहा है. इस अदभुत कार्य जिसमे हर बार जान का सीधा सीधा खतरा था, एक आम आदमी कल्पना भी नही कर सकता है जो इन्होंने किया है.सैकड़ो नक्सलियों को आत्म समर्पण करवाने वाले रानू तिवारी जी को गांधी शांति पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए, रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए, पदमश्री या पद्मभूषण दिया जाना चाहिए!
रानू तिवारी के यूट्यूब पर अपलोड कुछ शानदार वीडियो उनकी अपनी शैली अपने अलग अंदाज में देखिए….
भड़ास से हुई बातचीत में रानू बताते हैं कि उन्होंने अब तक तकरीबन 171 से अधिक माओवादियों का सरकार के सहयोग से आत्मसमर्पण करा चुके हैं। हाल ही में उन्होंने बस्तर के जंगलों का बड़ा नाम पापाराव का राज्य के गृहमंत्री विजय शर्मा के सहयोग से 11 साथियों के साथ मय हथियार सरेंडर कराया। रानू ने अब तक पापाराव, सतीश गोपा, रामदेव, राहुल तेलम जैसे बड़े माओवादियों के हाथों से हथियार छुड़वाकर सक्रिय समाज में वापसी करा चुके हैं।
बस्तर इलाके में रानू तिवारी जैसे पत्रकारों की ताकत है—इलाके और लोगों की गहरी समझ। उन्होंने आदिवासी संस्कृति, फर्जी मुठभेड़ों और माओवादी इंटरव्यू तक की कहानियां सामने लाकर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा। इन पत्रकारों की खासियत यह है कि वे ‘आउटसाइडर’ नहीं, बल्कि ‘इनसाइडर’ हैं। इसलिए उनकी रिपोर्टिंग में संवेदनशीलता और गहराई दिखती है। औपचारिक ट्रेनिंग की कमी ही उनकी ताकत बन गई—उनकी शैली ज्यादा व्यक्तिगत और वास्तविक है।
अब ये पत्रकार पहले से ज्यादा कमा भी रहे हैं। तिवारी को पहली बार यूट्यूब से 1.5 लाख रुपये मिले। आज वह हर महीने करीब 50,000 रुपये तक कमा रहे हैं।
18 Dec 2025 को रामेश्वरम हिंदी पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित हो चुके विकास उर्फ रानू तिवारी को जानने वाले चाहते हैं कि उन्हें नेशनल एवार्ड मिलना चाहिए .. गोयनका या गृहमंत्री की तरफ़ से.. इसके पीछे की वजह है कि रानू और अन्य उनके जैसे स्थानीय पत्रकारों ने बहुतों को मारने-मरने से बचा के मुख्यधारा में वापस लेकर आए हैं, जिसका उन्हें प्रतिफल भी मिलना चाहिए।
भड़ास4मीडिया से रानू तिवारी की बातचीत और सोशल मीडिया से कलेक्ट किए गये इनपुट पर आधारित


