त्रिभुवन-
यह सचमुच दुःखद है और उससे भी अधिक हृदय को हल्की; लेकिन सुदीर्घ पड़ा से भर देने वाला। एचजेयू के दीक्षांत समारोह में जो घटित हुआ, उसके बारे में सबसे बड़ी विडंबना यही है कि शोर बहुत हुआ, पर बात समझी ही नहीं गई। जैसे किसी उजले कक्ष में अचानक इतनी आवाज़ें भर जाएँ कि सबसे सरल वाक्य भी सुनाई देना बंद हो जाए। मैंने समाचारों के माध्यम से अब तक जो पढ़ा, जाना और समझा है, उसका निष्कर्ष यही है कि विश्वविद्यालय के युवाओं की इच्छा न तो असंगत थी, न उद्दंड, न अपमानजनक। वे न धन माँग रहे थे, न नौकरी, न कोई असाधारण सुविधा। वे राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष जैसे उच्च पदों पर बैठे और अपने विश्वविद्यालय के कुलाधिपति से सम्म्मान और अधिकारपूर्वक केवल एक स्मृति चाहते थे।
एक ऐसी स्मृति, जिसे वे अपने घर ही नहीं, जीवन की दीवार पर टाँग सकें, अपने घरवालों को दिखा सकें, अपने समय की उपलब्धि की तरह सँजो सकें, अपने आपको बता सकें कि उन्होंने किन ऊँचे लोगों से यह उपलब्धि प्राप्त की है। वे चाहते थे कि प्रदेश के उच्च पदों पर विराजमान व्यक्तियों, जैसे महामहिम राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, उच्च शिक्षा मंत्री और उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा और कुलपति प्रो. एनके पांडे साहब के हाथों डिग्री लेते हुए उनका एक चित्र हो; ऐसा चित्र जिसमें केवल चेहरा न हो, भविष्य का आशीर्वाद भी हो। जिसे वे गर्व के साथ रख सकें। इस देश में जिस समय स्वयं राजनेता सपरिवार जाकर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ फोटो खिचवाकर प्रचारित कर रहे हों तो इन युवाओं की भी तो कुछ आकांक्षा होगी!
यौवन अक्सर बहुत छोटी दिखने वाली चीज़ों में अपना सबसे बड़ा उत्सव खोज लेता है। एक तस्वीर कई बार केवल तस्वीर नहीं होती; वह माँ-बाप की आँखों में चमक बनती है, किसी छोटे कस्बे के घर में पहली बड़ी उपलब्धि का प्रमाण बनती है, किसी छात्र की सोशल मीडिया डीपी में नहीं, उसके आत्मविश्वास में टँगी रहती है। वह उनके इन्स्टा की रील भर नहीं रहती है। वह कहती है : देखो, मैं वहाँ तक पहुँचा था; मैंने अपनी मेहनत को मान्यता लेते देखा था। इस भाव को यदि ठीक से पढ़ा जाता तो शायद इतना धुँधलका न बनता। यह एक तरह से कम्युनिकेशन के उच्चतम संस्थान में मिस-कम्युनिकेशन का जीवंत उदाहरण है।
और यहाँ सबसे ज़रूरी बात यह है कि यदि छात्रों के भीतर वैचारिक आक्रोश होता, मन में विरोध और कुंठा होती तो उसका रूप बिल्कुल अलग होता। वे काले झंडे दिखाते, नारे लगाते, कटु शब्द बोलते, सार्वजनिक असहमति दर्ज़ करते या मंच पर जूता उछाल देते या किसी पर स्याही फेंक देते। पर उन्होंने जो चाहा, वह विरोध की भाषा नहीं, सम्मान की भाषा थी। वे इन गरिमामय हस्तियों के साथ एक फ्रेम में आना चाहते थे; वे उस क्षण को जीवन की अर्जित ऊष्मा की तरह सहेजना चाहते थे। इसे अपमान कैसे कहा जा सकता है? यह तो उलटे उन पदों के प्रति विश्वास का द्योतक है। यह तो युवा मन का वह निष्कपट संकेत है, जिसमें सत्ता नहीं, स्नेह देखा जाता है; पद नहीं, प्रतिष्ठा का स्पर्श; औपचारिकता नहीं, आशीर्वाद। मुझे दु:ख है, मीडिया के मेरे कुछ साथी इस घटनाक्रम की व्याख्या में थोड़ा ट्विस्ट कर रहे हैं।
ऐसे समय में यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि उप मुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा और कुलपति प्रो. पांडे ने तत्परता से परिस्थिति को सँभाला, उसे बिखरने नहीं दिया और अंततः कार्यक्रम को संभव हद तक बेहतर स्वरूप दिया। यह कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं है। संस्थान कई बार विवाद से नहीं, विवाद की व्याख्या से घायल होते हैं। और एचजेयू का दुर्भाग्य भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। इस नए अंकुरित होते विश्वविद्यालय को प्रायः अनावश्यक और अवांछित विवादों के घेरे में खींच लिया जाता रहा है। मानो कुछ संस्थानों के हिस्से प्रश्न अधिक आते हों और कुछ के हिस्से मौन। जबकि हम सब जानते हैं कि इस प्रदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में कितनी विसंगतियाँ बिना किसी सार्वजनिक बेचैनी के गुजर जाती हैं। डिग्रियों की विश्वसनीयता से लेकर नियुक्तियों की गुणवत्ता तक। पर वहाँ अक्सर कोई पंक्ति नहीं लिखी जाती; यहाँ एक कंपन भी तूफ़ान बना दिया जाता है।
आधी-अधूरी सुविधाओं के बीच, इतनी दूर न आवागमन का साधन है और न वहाँ छात्रावास। न शिक्षकों को सरकारी आवास दिए गए हैं, न कुलपति का आवास है। न पुस्तकालय सुसमृद्ध है। यह कैसी विडंबना है कि सरकार एक साथ एक विश्वविद्यालय और आरआईसी बनाती है। लेकिन शिक्षा का उच्च केंद्र अभावों से ग्रस्त है और आरआईसी क्या वैश्विक मानदंड छू रहा है। शिक्षा के प्रति इतनी आपराधिक उपेक्षा क्यों? इतने साल बाद भी क्यों स्थायी और निर्विवाद नियुक्तियाँ नहीं हुई हैं? क्यों वहाँ तक आवागमन के साधन नहीं हैं? आख़िर आरआईसी, कंस्टीट्यूशन क्लब और एक विश्वविद्यालय की तुलना तो करके देखिए! एक विश्वविद्यालय के परिसर में अगर उसी के कुलाधिपति और बाकी मेहमानों को इतनी बेहतरीन सरकारी कारों की सुविधा के बाद भी जाने में दिक्कत है तो थोड़ा वहाँ के विद्यार्थियों और शिक्षकों की समस्या को भी समझ लिया जाए!
यह एक सरकारी विश्वविद्यालय है। इसलिए हर किसी के निशाने पर आ जाता है। लेकिन कितने ही निजी और डीम्ड विश्वविद्यालय, जहाँ अपार धांधलियाँ हैं; लेकिन मजाल कि कहीं कुछ आ जाए। प्रोफेसर साहब ख़ुद हैं कॉमर्स में पीएचडी, करवा रहे हैं कम्प्युटर साइंस में पीएचडी। सोसाइटी के दस्तावेजों को कूटरचित करने के दोषी पाए जाते हैं, लेकिन कहीं कुछ नहीं होता। सेना तक से सम्मान आ जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट 50-50 हज़ार डिग्रियों को इस आधार पर निरस्त कर देता है कि तकनीकी शिक्षा की डिग्रियाँ दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से संभव ही नहीं।
लेकिन किसी को जेल भेजना तो दूर, कोई प्राथमिकी तक दर्ज़ नहीं होती। यह सातवें अचरज़ के समान है। लेकिन है। हम देखते हैं कि खुले मैदान में विश्वविद्यालय दिखा दिया जाता है और बाद में कुलपति भी बहाल होते हैं और जैसे कहीं कुछ हुआ ही नहीं। एक विवि की नियुक्तियों में भ्रष्टाचार होता है। संभागीय आयुक्तों की जाँच होती है; लेकिन सब ठंडे बस्ते में। ऐसे किस्से अनंत हैं।
दरअसल, मुझे लगता है कि यह क्षण आरोप का नहीं, आत्मपरीक्षण का होना चाहिए। विशेषकर इसलिए कि हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय घुटनों पर चलता और अपने शैशव से उठता हुआ एक संचार विश्वविद्यालय है। यहाँ के विद्यार्थी, यहाँ के शिक्षक और स्वयं यह संस्थान तीनों यदि एक-दूसरे को सुनने की कला में ज़रा और धैर्य रखें तो भूलभुलैया जैसी स्थितियाँ भी सहज रास्ता पा सकती हैं। संचार का सबसे बड़ा संकट शब्दों की कमी नहीं, भावों का पक्षद्रोही उद्वेलन है। और यहाँ तो भाव बहुत ही सुंदर थे : सम्मान, निकटता, मान्यता, स्मृति और सदाशयता की इस उत्कट अभीप्सा। लेकिन उसे ग़लत पढ़ लिया गया।
एचजेयू के नेतृत्वकारी शिक्षक आदरणीय हैं और वैदुष्य के वाहक हैं। और इसके छात्र? वे सचमुच बहुत प्यारे हैं; वे अपने समय के बेचैन पर उजले बच्चे हैं, जो मान-सम्मान की भाषा अब भी समझते हैं, जो उपलब्धि को केवल काग़ज़ पर नहीं, संबंध में बदल देना चाहते हैं। उसे दीर्घकालीन स्मृति बनाना चाहते हैं। इसलिए इस पूरे प्रसंग को कठोरता से नहीं, करुणा और परिपक्वता से पढ़ा जाना चाहिए। आख़िर आप देखिए कुछ छात्र कितनी बेहतरीन जगहों और कितनी अच्छी रिपोर्टिंग कर रहे हैं। वे अख़बारों के फ्रंट पेज तक तैयार करते हैं। कोई कहीं है कोई कहीं। वे उपलब्धियाँ हैं। विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ बाँटने की जगह नहीं होते; वह मनुष्यता के लहजे गढ़ने की जगह भी होते हैं। और जहाँ मनुष्यता बची हुई हो, वहाँ संवाद की संभावना कभी समाप्त नहीं होती।
जो लोग दीक्षांत समारोह को छोड़कर तत्काल चले गए, उन्हें जानना चाहिए कि दीक्षांत का अर्थ क्या है? दीक्षांत यानी भारतीय ज्ञान परंपरा में वह अवभृथ यज्ञ, जो ब्रह्मचर्य के उपरांत गुरु के पास वर्षों की साधना के उपरांत दीक्षा के समय इसलिए अनिवार्य रूप से किया है कि उसमें हर शिष्य की शिक्षा में रह गई त्रुटि, दोष और उसके अंतिम परिष्कार होते हैं। किए जाते हैं। यानी हर शिष्य के बौद्धिक गुणों को एक्सीलेंस देने का समय है यह। इस यज्ञ का ब्रह्मा यानी यज्ञ जिसकी देखरेख में हो रहा है, वह संपन्नता के आख़िरी क्षण तक उठकर जा ही नहीं सकता। ऐसा करने पर वह नरक का भागी होगा। मुझ पर भरोसा न हो तो “शब्दकल्पद्रुम”, “अमरकोश” और जाने कितने ही ब्राह्मणग्रंथों में झांका जा सकता है।
आप भारतीय ज्ञान परंपरा का बहाना बनाकर सिर्फ़ नाम बदलकर नहीं बच सकते। आप अगर नाम बदल रहे हैं तो उसके मूल अर्थ और उसकी कर्मपीठिका तक तो जाना ही होगा। आप शादियों में घंटों यों ही बिता देते हैं। विधानसभा में जाने कैसे-कैसे विधायकों की कैसी-कैसी हरकतों को झेल लेते हैं; लेकिन विद्यार्थी आपको सेलिब्रिटी मानकर आपके हाथों से सम्मानित होना चाहते हैं और आप इस दुर्लभ प्रेम को अधूरा ही छोड़े जा रहे हैं। आप कैसे अभागे मनुष्य हैं। यह बदली हुई पीढ़ी है, जो आपका सम्मान करती है। पुरानी विद्यार्थी पीढ़ी होती तो वह किसी नेता के हाथों सम्मानित होने में शायद अपमानित महसूस करती! इस भावना को समझा जाना चाहिए।
और जिस बात पर तूफान उठा हुआ है, अगर उसे भी कुछ समझने की कोशिश करें तो हमें अंतत: हंसी ही आएगी। मुझे फ़ैज़ साहब का वह शेर याद आ रहा है, जिसमें उन्होंने ऐसी ही किसी बात की गांठ खोली थी :
वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था
वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है
तो सारा इस्माइल ने कहा था : “इतनी बेइज़्ज़ती के बाद इज़्ज़त देने के लिए शुक्रिया!”
सारा इस्माइल का यह वाक्य अपने भीतर एक गहरी, काँपती हुई मानवीय संवेदना की अपेक्षा रखता है। इसे केवल तन्क़ीद की तरह पढ़ना शायद उसके सबसे कोमल अर्थ को खो देना होगा। इसकी एक सहृदय व्याख्या यह हो सकती है कि कभी-कभी मनुष्य का हृदय, आहत होने के बाद भी, अपने भीतर कृतज्ञता का एक छोटा-सा दीप बचाकर रखता है। जैसे बहुत तेज़ आँधी के बाद भी किसी खिड़की के कोने में रखा दिया पूरी तरह बुझता नहीं, बस लौ थोड़ी नीली पड़ जाती है।
इस वाक्य में शिकायत है, पर उसके भीतर संवाद की आख़िरी इच्छा भी है। यह ऐसा नहीं कहता कि सब कुछ समाप्त हो गया; अपितु यह कहता है कि जो टूटा, खंडित हुआ, उसके बाद भी यदि सम्मान का एक कण या एक लम्हा बचा है तो उसे मैं पहचानती हूँ। यह एक आहत आत्मा का उच्छवास है, पर साथ ही एक सुसंस्कृत आत्मा का भी, जो अपमान की राख में से भी आदर का एक अक्षर चुन लेती है। कितनी अद्भुत बात है कि एक युवा लड़की अपने सबसे दु:खी क्षण में भी पूरी तरह क्रूर नहीं होती; वह धन्यवाद की भाषा बचाए रखती है, मानो अपने ही टूटे हुए व्यक्तित्व को यह याद दिला रहा हो कि विनम्रता पर किसी एक घटना का अधिकार नहीं।
यह पंक्ति उस गुलाब की तरह है, जिसे किसी ने बहुत रूखे हाथों से छुआ हो, फिर भी वह अपने भीतर सुगंध का अंतिम अधिकार नहीं छोड़ता। इसमें आत्मसम्मान है; क्योंकि वह अपमान को नाम देकर सामने रखती है; और इसमें उदारता भी है, क्योंकि वह सम्मान के क्षण को नकारती नहीं। यानी यह पंक्ति पराजय या अपमान की नहीं, संवेदना की परिपक्वता की पंक्ति है। यह कहती है: आपने मुझे दु:ख दिया, यह मैं भूली नहीं; पर तुमने यदि अंततः सम्मान दिया तो उसे भी मैं देखने की शालीनता रखती हूँ। लेकिन किसी के लबों से गुलाब जलते हैं तो कृपया बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते रहना ठीक नहीं है।
और शायद सबसे सुंदर अर्थ यही है कि यह वाक्य मनुष्य की उस दुर्लभ क्षमता को उजागर करता है, जिसमें वह पीड़ा को भी भाषा की गरिमा में बदल देता है। यह क्रोध का पत्थर नहीं, पीड़ा का चमकता हुआ दर्प और दर्पण है, जिसमें सामने वाला भी दिखता है और बोलने वाले की आत्मा भी। यही इसकी सकारात्मकता है। कि टूटकर भी भद्दा न होना, दु:खी होकर भी भाषा को सलीका देना और अपमान के इतिहास में भी सम्मान के एक छोटे-से क्षण को दर्ज़ कर लेना। उसका तात्पर्य अपमान करना होता तो वह वहीं “मुझे नहीं चाहिए, ऐसे लोगों से डिग्री” जैसा कुछ भी बोलकर अपमानित कर सकती थी। यही बात तो जैसे कविता करती है कि घाव को नकारती नहीं, पर उसे इतना सुंदर बना देती है कि वह केवल घाव न रह जाए, एक गहन जीवनानुभव बन जाए। और अंत में मुंडकोपनिषद् की इस बात को समझने का प्रयास करें :
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ 8 ॥
अविद्यायां बहुधा वर्तमाना
वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागा-
तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ 9 ॥
अर्थात् : अविद्या के बीच रहने वाले और अपने को ही बड़ा बुद्धिमान समझने वाले वे मूढ़ मनुष्य वस्तुतः उस अन्धे के समान हैं, जिसे दूसरा अन्धा व्यक्ति मार्ग दिखाने का दावा करता हुआ कहीं भी लिये फिरता है। वे चलते बहुत हैं, पर पहुँचते कहीं नहीं; बोलते बहुत हैं, पर जानते कुछ नहीं; और अपने ही भ्रमों की धूल में पीड़ित होकर दिशाओं-दिशाओं भटकते रहते हैं। कबीर ने इसे ही तो अंधे अंधा ठेलिया, दोऊ कूप पड़ंत बताया था। ऐसे लोगों का आत्मविश्वास प्रकाश नहीं, अज्ञान का आवरण होता है। इसीलिए जहाँ विनम्रता के प्रति आदर नहीं, वहाँ विद्या भी नहीं; और जहाँ तत्त्वदृष्टि नहीं, वहाँ पाण्डित्य भी अंततः भटकन का ही एक दूसरा नाम बन जाता है। बहुधा अविद्या के अंधकार में रहनेवाले वे विपरीत-बुद्धि लोग यज्ञ के अल्पसमय से ही ‘हम कृतार्थ हो गये हैं’ इस प्रकार अभिमान किया करते हैं। क्योंकि कर्मठ और सुविज्ञ लोगों को कर्म के रागानुराग के कारण तत्त्व का ज्ञान नहीं होता, इसलिये वे दुःखार्त्त होकर यज्ञ की मूल प्राप्ति से च्युत हो जाते हैं!


