ओरण-गोचर जनांदोलन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार का आरोप, प्रशासनिक कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल
राजस्थान के जैसलमेर में वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र सिंह राठौड़ के रेस्टोरेंट पर प्रशासन द्वारा बुलडोजर कार्रवाई को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें इसे ओरण-गोचर भूमि जनांदोलन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार बताया जा रहा है। राठौड़ ने आरोप लगाया है कि यह कार्रवाई उनके द्वारा ओरण और गोचर भूमि आवंटन के खिलाफ उठाई गई आवाज का प्रतिशोध है।
मामले के अनुसार जैसलमेर में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए भूमि आवंटन को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर सुनियोजित तरीके से ओरण और गोचर भूमि को सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए उपलब्ध कराने की प्रक्रिया चल रही है, जबकि ये भूमि स्थानीय पारिस्थितिकी, धार्मिक आस्था और ग्रामीण जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। इस मुद्दे पर जुलाई से ही जनआक्रोश सामने आने लगा था।
इसी दौरान उपेंद्र सिंह राठौड़ ने एक पत्रकार और पत्रकार संगठन के पदाधिकारी के रूप में प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया के जरिए इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। आरोप है कि प्रशासन ने इस आवाज को दबाने के लिए विभिन्न तरीकों से दबाव बनाने की कोशिश की, जिसमें उनके ‘स्वाद रेस्टोरेंट’ को निशाना बनाया गया।
राठौड़ के अनुसार वर्ष 2000 से संचालित उनके रिसोर्ट और रेस्टोरेंट से जुड़ी फाइल, जो वर्षों से विभिन्न विभागों में लंबित थी और अपील स्तर पर विचाराधीन थी, उसे अचानक निरस्त कर दिया गया। इसके बाद कथित रूप से नोटिस, दबाव और कार्रवाई की श्रृंखला शुरू हुई। दिसंबर माह में कोर्ट से स्टे मिलने के बावजूद अगले ही दिन प्रशासनिक विभागों की लगातार कार्रवाई, गैस सिलेंडर जब्ती और किचन सील करने जैसे कदम उठाए गए।
आरोप यह भी है कि 17 फरवरी को ओरण-गोचर भूमि संरक्षण को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद प्रशासन और अधिक आक्रामक हो गया। 18 फरवरी को भारी प्रशासनिक अमले के साथ रेस्टोरेंट को सील कर दिया गया, जबकि अगले दिन इस मामले की अदालत में सुनवाई प्रस्तावित थी।
घटनाक्रम का चरम 17 मार्च को सामने आया, जब राठौड़ प्रशासनिक कार्यालय में दस्तावेजों की प्रति के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे, उसी दौरान कथित रूप से बिना पूर्व सूचना के जेसीबी मशीनों से उनके रेस्टोरेंट को तोड़ दिया गया। इस कार्रवाई में लाखों का सामान नष्ट होने और करीब डेढ़ करोड़ रुपये के नुकसान का दावा किया गया है।
इस पूरे प्रकरण में राजनीतिक चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। राठौड़ का कहना है कि उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेताओं, सांसद, विधायकों और मुख्यमंत्री कार्यालय तक अपनी बात साक्ष्यों के साथ पहुंचाई, लेकिन कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं हुआ। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या एक युवा प्रशासनिक अधिकारी इतनी बड़ी कार्रवाई बिना उच्च स्तर के निर्देशों के कर सकता है।
राठौड़ ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की जांच किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश या वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी से कराई जाए, साथ ही यह स्पष्ट किया जाए कि वर्षों से संचालित संस्थान अचानक अवैध कैसे घोषित कर दिया गया। इसके अलावा ओरण-गोचर भूमि आवंटन प्रक्रिया में पारदर्शिता की भी मांग की गई है।
यह मामला अब केवल एक रेस्टोरेंट पर कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर दबाव और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर हमले के रूप में देखा जा रहा है।

राज्य सरकार इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करवाएं, जिसका विश्वास मुझे कम ही है।
क्योंकि एक युवा प्रशासनिक अधिकारी कभी भी अपने बूते तो इस तरह का कदम नहीं उठा सकता है, इसके पीछे जिन्होंने जिला कलेक्टर को वरदहस्त प्रदान किया है वह उच्च रसूख वाले ही रहे होंगे।
जिसकी चर्चा पिछले दो महीनों से राजस्थान के पावर कारीडोर में सुन रहा हूं।
देश की न्याय व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास है कि मुझे वहां से अवश्य न्याय मिलेगा। -उपेंद्र सिंह राठौड़, वरिष्ठ पत्रकार
जैसलमेर के वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र सिंह राठौड़ के इस पच्चीस साल पुराने रेस्टोरेंट पर जिला प्रशासन ने बुलडोजर चलवा दिया। राठौड़ साहब जन सरोकार के मुद्दों को लेकर चल रहे आंदोलन में सक्रिय थे। बस यही उनका जुर्म था। मुल्लों को टाइट करते करते भाजपाई बुलडोज़र अब हिंदुओं के सीने पर भी चढ़ने लगा।
वो राहत इंदौरी जी ने कहा है न- “लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है!”
जैसलमेर के कलेक्टर को छोड़ना नहीं चाहिए। सुप्रीम कोर्ट तक इसके ख़िलाफ़ जाना चाहिए। ओरिजिनल रेस्टोरेंट कैसा था और बुल्डोज़ किए जाने के बाद कैसा दिख रहा है, वीडियो देखें। -यशवंत सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
ऐसा ही मामला डायनामाइट न्यूज़ वाले पत्रकार मनोज टिबरेवाल जी के साथ हुआ था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक पीछा किया। दोषी अफ़सर को नाप कर ही चैन लिया। उनकी खबरों के लिंक पढ़ें-
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इस FIR को पढ़िए, अगर एक पत्रकार न्याय दिलाने को पीछे पड़ जाए तो क्या नहीं करा सकता!
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