सरकार खबरें हटवाने और खबर देने वालों के अकाउंट बंद करवाने में व्यस्त है। मीडिया में राजनीति और युद्ध की प्रतिस्पर्धा चल रही है। गौर फरमाइए,
(1) “युद्ध से स्थिति चुनौतीपूर्ण, संकट पर राजनीति न करें”
(2) “नासिक यौन शोषण मामले में अशोक कुमार एकनाथ खरात की गिरफ्तारी के बावजूद उसके पीड़ितों को राहत नहीं है। यह अपराध के वीडियो सार्वजनिक होने से है।”
(3) भाजपा सरकार ने पिछले 10 वर्षों में असम में घुसपैठ को रोका है, लेकिन यह ‘पर्याप्त नहीं है’।
(4) नवोदय टाइम्स में तीन कॉलम की खबर अलग है, भारत के दो और एलपीजी जहाज होर्मुज से निकले
(5) “सियासी फायदे के लिए कांग्रेस दे रही खतरनाक बयान, एक करोड़ भारतीयों की जान खतरे में डालना चाहती है पार्टी।”

संजय कुमार सिंह
आज युद्ध से संबंधित कई खबरें हैं। इनमें विविधता तो है ही इसके खिलाफ अमेरिका के भिन्न शहरों में भारी विरोध प्रदर्शन की भी खबर है। ज्यादातर अखबारों की लीड जब युद्ध से संबंधित खबर है तो टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड पाकिस्तान की मध्यस्थता की खबर है। आप जानते हैं कि युद्ध में मध्यस्थता की कैसी और कितनी भूमिका है। खाड़ी युद्ध चलते रहने से भारत समेत कई देशों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए मध्यस्थता की जरूरत महसूस की जा रही है। पाकिस्तान की मध्यस्थता की खबर पर भारत और खासकर विदेश मंत्री एस जयंशकर की प्रतिक्रिया और उसपर कांग्रेस की टिप्पणी पिछले दिनों चर्चा में थी। विदेश मंत्री ने मध्यस्थता के लिए ‘दलाली’ शब्द का प्रयोग किया था और जाहिर है इसकी आलोचना हुई थी। भले ही खबर कम छपी और आपको न दिखी हो। वैसे भी, अंतरराष्ट्रीय मामलों और खासकर युद्ध में मध्यस्थता दलाली नहीं है। इसके विरोध (तथा समर्थन) के बाद अब जब पाकिस्तान ने कहा है कि वह ‘जल्दी ही’ अमेरिका, ईरान के बीच वार्ता की मेजबानी करेगा तो निश्चित रूप से यह बड़ी खबर है। मेरे नौ (आज 10) में सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड होना, रेखांकित करने लायक है। खासकर तब जब खबर का इंट्रो है – तेहरान, वाशिंगटन से अभी तक पुष्टि नहीं है। जाहिर है, पुष्टि के बिना खबर अधूरी, गलत या बेमतलब भी हो सकती है। मुख्य खबर के साथ छपी एक खबर का शीर्षक है, “अमेरिका जमीनी हमले की तैयारी कर रहा है, ईरान ने कहा आपका इंजतार है”।
आज अखबारों में युद्ध के गंभीर होने के संकेत हैं और कल सोशल मीडिया में तेहरान टाइम्स के पहले पन्ने की खबर चर्चा में थी। तेहरान टाइम्स के विशेष अंक का शीर्षक था, जहन्नम में स्वागत है। अमेरिकी सैनिकों के लिए ईरान जहन्नम साबित होगा और जो अमेरिकी सैनिक ईरान की जमीन पर पैर रखेंगे वे ताबूत में ही लौटेंगे। ठीक है कि मामला ईरान और अमेरिका का है। हम वहां नहीं जा रहे हैं और यह हमारे लिए है भी नहीं। लेकिन जनहित में युद्ध तो खत्म होना ही चाहिए। युद्ध का प्रभाव हम पर पड़ रहा है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने दो-तार दिन में ही ऑपरेशन सिन्दूर बंद करवाने का दावा किया था। अब हमारे विदेश मंत्री जयशंकर ने मौजूदा जंग खत्म करने के लिए अमेरिका और ईरान की वार्ता में पाकिस्तान की मध्यस्थता के सवाल पर दो टूक कहा है कि हम दलाल देश नहीं हो सकते हैं। हमारे प्रधानमंत्री ने कहा है और कल अमर उजाला का शीर्षक था, राजनीति बंद करें, नागरिकों के भरोसे युद्ध संकट का पूरी ताकत से मुकाबला कर रहा है भारत। आज भी अमर उजाला का एक शीर्षक है, खाड़ी देशों में भारतीयों की सुरक्षा प्राथमिकता : मोदी। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने कहा है और अमर उजाला में उपशीर्षक है, सियासी फायदे के लिए कांग्रेस दे रही खतरनाक बयान, एक करोड़ भारतीयों की जान खतरे में डालना चाहती है पार्टी। प्रधानमंत्री यह सब तब बोल और छपवा रहे हैं जब अपने, ‘मन की बात’ में उन्होंने लोगों को अफवाहों के खिलाफ सतर्क किया है। यह खबर दि एशियन एज में है और लीड का शीर्षक है, मोदी ने केरल को एलडीएफ, यूडीएफ के लूट और कुशासन से मुक्त कराने की कसम खाई। आप समझ सकते हैं कि प्रधानमंत्री का हेडलाइन मैनेजमेंट कैसा प्रभाव छोड़ रहा है।
नवोदय टाइम्स में यह खबर टॉप पर है। शीर्षक है, युद्ध से स्थिति चुनौतीपूर्ण, संकट पर राजनीति न करें। प्रधानमंत्री की इस अपील को पढ़ने के बाद एक और शीर्षक पर नजर गई। अमित शाह ने कहा है, हर अवैध प्रवासी को वापस भेजना होगा। आप जानते हैं कि यह केंद्र सरकार का काम है फिर भी 12 साल से सत्ता में जमी पार्टी के गृहमंत्री अमित शाह कहते रहे हैं कि बंगाल सरकार सीमा पर बाड़ बनाने और दूसरे काम करने के लिए जमीन नहीं दे रही है। इसलिए अवैध प्रवासियों को रोकना संभव नहीं हो रहा है। वैसे यह काम सीमा सुरक्षा बल का है जो उनके तहत ही काम करता है। इस तरह अमित शाह पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार पर इसका दबाव बनाते रहे हैं। हालांकि, असम में भाषण के बाद हर अवैध प्रवासी को वापस भेजना होगा शीर्षक से छपी खबर में कहा गया है, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को कहा कि भाजपा सरकार ने पिछले 10 वर्षों में असम में घुसपैठ को रोका है, लेकिन यह ‘पर्याप्त नहीं है’। खबर के अनुसार इसका कारण है, ‘क्योंकि प्रत्येक अवैध प्रवासी को उनके देशों में वापस भेजा जाना चाहिए’। मुझे लगता है कि यह गलत या घटिया रिपोर्टिंग का नमूना है। अगर ऐसा ही कहा है तो फूहड़ राजनीति। क्योंकि, घुसपैठ रोकना केंद्र सरकार का काम है, राज्य सरकार द्वारा जमीन नहीं दिए जाने से रोकना संभव नहीं है तब रोका कैसे है और जो रोका है वह पर्याप्त नहीं है तो तृणमूल कैसे जिम्मेदार है। अगर घुसपैठियों को उसने निकाला नहीं तो यह उसका काम ही नहीं है। केंद्र सरकार इनकी पहचान कर इन्हें निकालने का काम क्यों नहीं करती है। कुल मिलाकर, अमित शाह और भाजपा की राजनीति यह है कि घुसपैठ हो रही है क्योंकि पश्चिम बंगाल सरकार जमीन नहीं दे रही है और जमीन नहीं दे रही है क्योंकि वह घुसपैठ रोकना नहीं चाहती है। ऐसी दशा में घुसपैठ हो रही है और सरकार कहती है कि सबको वापस भेजा जाना चाहिए पर 12 साल में भेज नहीं पाई या भेजा नहीं गया तो अकेले तृणमूल कैसे जिम्मेदार है? वैसे यह मामला असम का है और यहां तो भाजपा की सरकार है फिर भी भाजपा इस पर राजनीति कर रही है और यह कहते हुए कर रही है कि (दूसरे) राजनीति न करें।
देसी राजनीति की इन खबरों के साथ आज अमेरिकी युद्ध से संबंधित कई खबरें हैं। द टेलीग्राफ की लीड बताती है कि युद्ध का कोई अंत नजर नहीं आ रहा है और अमेरिका में ट्रम्प के खिलाफ नो किंग्स प्रदर्शन हुआ। खबरों के अनुसार अमेरिका के भिन्न शहरों में कल जोरदार प्रदर्शन हुए। मुझे लगता है कि युद्ध और ट्रम्प से भारत भी प्रभावित है। इसलिए आज यही खबर लीड होनी चाहिए थी। आम पाठकों के लिए के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि युद्ध खत्म होने के कोई आसार नहीं हैं, कहा जा सकता है कि इसका असर और प्रभाव बढ़ रहा है। ट्रम्प फंसे हुए हैं और मुश्किल में दिख रहे हैं। जो कहते हैं, करते नहीं हैं और जो करते हैं वह कहते नहीं है। फिर भी ना हार मान रहे हैं और ना युद्ध खत्म कर रहे हैं। बदले में दुनिया का एक बड़ा हिस्सा प्रभावित है और इसलिए अमेरिका में रहने वालों का एक बड़ा वर्ग ट्रम्प के खिलाफ है। मुख्य शीर्षक के नीचे, द टेलीग्राफ का एक शीर्षक है, “संदेश : हम ऊब गए हैं।” अखबार में सिंगल कॉलम की यह सूचना जरूर है कि एलपीजी से लदे दो जहाज होर्मुज पार कर चुके हैं और भारत पहुंचने वाले हैं। अमर उजाला का शीर्षक है, जमीनी हमले की तैयारी में अमेरिका, ईरान बोला-हमारा सैनिक तैयार, कर रहे इंतजार। नवोदय टाइम्स की लीड भी लगभग यही है, जमीनी लड़ाई की तैयारी में अमेरिका। लेकिन देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, ट्रम्प के खिलाफ सड़कों पर जनसैलाब। दैनिक भास्कर की खबर से पता चलता है कि अमेरिका में पहली बार 50 राज्यों में साढ़े तीन हजार जगहों पर लोगों ने प्रदर्शन किए, 16 देशों में भी विरोध प्रदर्शन हुआ। मुख्य शीर्षक है, “ट्रम्प घिरे; ईरान जंग के खिलाफ अमेरिका में 80 लाख लोग सड़कों पर उतरे।” दैनिक भास्कर आज नौ निगेटिव अखबार है। शायद इसलिए, दो पहले पन्नों पर राजनीति, नरेन्द्र मोदी और भाजपा की राजनीति की आम खबरें नहीं हैं। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, पाकिस्तान में वार्ता के बीच जमीनी घुसपैठ के खिलाफ ईरान ने चेतावनी दी। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक भी लगभग वही है। इसके अनुसार, क्षेत्रीय राजनयिकों की बैठक और कोशिश के बीच ईरान ने अमेरिका को जमीनी युद्ध के खिसाफ चेतावनी दी। दि इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, ‘इंतजार कर रहा हूं’ : ईरान ने अमेरिका को जमीनी कार्रवाई के खिलाफ चेतावनी दी, और समुद्री सैनिक पहुंचे।
इन खबरों के बीच सरकार की राजनीति और हेडलाइन मैनेजमेंट का आलम यह है कि सरकार लगातार कह रही है कि गैस की किल्लत नहीं है, विपक्ष पैनिक क्रिएट कर रहा है आदि लेकिन पीएनजी वाले मोहल्लों में एलपीजी नहीं देने के नियम सख्ती से लागू किए जाने के कारण देशबन्धु में खबर है कि 6,000 पीएनजी ग्राहकों ने एलपीजी कनेक्शन छोड़ा। नवोदय टाइम्स और अमर उजाला की सेकेंड लीड है, अब पेट्रोल पंपों पर मिलेगा केरोसिन। नवोदय टाइम्स में तीन कॉलम की खबर अलग है, भारत के दो और एलपीजी जहाज होर्मुज से निकले। यही नहीं, हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड है – सरकार ने कहा, एलपीजी की आपूर्ति स्थिर है। जो लाइन में खड़ा था, जो ब्लैक में खरीद रहा है, जिसकी चाय-पकौड़े की दुकान बंद है उसके लिए इन खबरों का क्या मतलब? अगर किसी पर युद्ध का असर नहीं हुआ तो क्या वह समझ नहीं रहा है कि क्या हो रहा है? फिर भी खबर पहले पन्ने पर है। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, नासिक यौन शोषण मामले में अशोक कुमार एकनाथ खरात की गिरफ्तारी के बावजूद उसके पीड़ितों को राहत नहीं है। यह अपराध के वीडियो सार्वजनिक होने से है। गौर करने वाली बात है कि अशोक खरात ने कई महिलाओं का यौन शोषण किया है और उसके वीडियो बनाए हैं। इनमें वह खुद भी दिखाई दे रहा है। सहमति से या वैसे जहां सेक्स किया गया उस जगह की तस्वीर भी सार्वजनिक है। इसे देखकर समझना मुश्किल है कि कैसे किसी को सेक्स करने, वीडियो रिकार्ड करने की भनक नहीं लगी। पुलिस क्या करती रही। जाहिर है, मामला पावर और पैसे का होगा। फिर भी, गिरफ्तारी के बाद अगर वीडियो शेयर हो रहे हैं तो वे जब्त और सील क्यों नहीं हैं। जिन्हें पता है कि मामला खुल गया है, मुख्य अभियुक्त हिरासत में है उन्हें वीडियो साझा करने में डर क्यों नहीं लग रहा है। जाहिर है कि नियम यह होना चाहिए कि जब्त वीडियो लीक होने पर जब्त करने वाले लोग जिम्मेदार होंगे पर पता नहीं ऐसा होता है या नहीं और लोगों को डर क्यों नहीं है। डबल इंजन के बावजूद न सिर्फ अपराध होता रहा, वीडियो साझा करने का अपराध अब भी चल रहा है। सरकार खबरें हटवाने और खबर देने वालों के अकाउंट बंद करवाने में व्यस्त है। मीडिया में राजनीति और युद्ध की प्रतिस्पर्धा चल रही है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


