डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म द लल्लनटॉप एक बार फिर अपने कंटेंट को लेकर विवादों में आ गया है। हाल ही में वेबसाइट पर प्रकाशित एक हेल्थ आर्टिकल, जिसमें निजी अंगों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी प्रमुखता से दिखाई गई, को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
आलोचकों का कहना है कि इस तरह के विषयों को बिना किसी आयु-सीमा या चेतावनी के सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर परोसना नाबालिग दर्शकों के लिए अनुचित है। उनका तर्क है कि जिस प्रकार फिल्मों और वेब कंटेंट को ‘A’ सर्टिफिकेट जैसी श्रेणियों में बांधा जाता है, उसी तरह डिजिटल मीडिया के लिए भी स्पष्ट मानक तय होने चाहिए।
विरोध जताने वालों ने यह भी सवाल उठाया है कि जो मीडिया संस्थान समाज, संस्कृति और मर्यादा पर बहस करते हैं, वे खुद अपने प्लेटफॉर्म पर संवेदनशील और निजी विषयों को किस जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस तरह का कंटेंट “जानकारी” के नाम पर परोसा जा रहा है, लेकिन इसकी प्रस्तुति शैली इसे सनसनीखेज और आकर्षण आधारित बना देती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यौन स्वास्थ्य जैसे विषयों पर जागरूकता जरूरी है, लेकिन उसकी भाषा, प्रस्तुति और प्लेटफॉर्म की पहुंच को ध्यान में रखना भी उतना ही आवश्यक है। फिलहाल इस पूरे मामले ने डिजिटल पत्रकारिता की सीमाओं, जिम्मेदारियों और नियमन की जरूरत पर एक नई बहस छेड़ दी है।
प्रकरण पर वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय लिखते हैं-


प्रिय लल्लनटॉप, कृपया अपनी वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के आगे ‘A’ सर्टिफ़िकेट अवश्य लगाएं। ताकि नाबालिग बच्चे समय से पहले कामदेव के बाण से घायल न हो जाएं!
अब हर कोई शिव तो है नहीं कि अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दे। फिर क्यूँ अपने प्लेटफार्म पर गाहे बगाहे जाने वाले नाबालिगों को नीलकंठ समझकर विषपान करा रहे हो!
A सर्टिफ़िकेट वाली फ़िल्मों में भी सारे दृश्य एडल्ट नहीं होते, पर एक भी एडल्ट की कैटेगरी का हो तो उन्हें A सर्टिफ़िकेट लेना ही पड़ता है।
तो फिर देश, दुनिया और समाज को धर्म, मर्यादा व ज़िम्मेदारियों का पाठ पढ़ाने वाली मीडिया के लिए कोई मानक क्यों नहीं?


