नई दिल्ली (सदर बाजार) | राजधानी दिल्ली के सदर बाजार से एक दिलचस्प लेकिन चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार Ravish Ranjan Shukla की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि कैरोसिन तेल की बिक्री अभी शुरू भी नहीं हुई, लेकिन स्टोव के दाम अचानक आसमान छूने लगे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार में स्टोव की मांग तेजी से बढ़ी है, जिससे व्यापारियों ने कीमतों में बढ़ोतरी कर दी है। दुकानदारों का कहना है कि जैसे ही सरकार की ओर से कैरोसिन तेल बेचने की बात सामने आई, लोगों ने एहतियातन स्टोव खरीदना शुरू कर दिया। इससे बाजार में मांग और दाम—दोनों बढ़ गए।
हालांकि, सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि घरेलू गैस (LPG) की उपलब्धता में कोई कमी नहीं है। लेकिन जमीन पर हालात कुछ और ही संकेत दे रहे हैं। कई इलाकों में लोग गैस सिलेंडर के लिए लंबा इंतजार कर रहे हैं, जिससे वैकल्पिक ईंधन के तौर पर कैरोसिन की चर्चा तेज हो गई है।
यही वजह है कि सवाल उठ रहे हैं—अगर गैस की सप्लाई पूरी तरह सामान्य है, तो फिर कैरोसिन तेल बेचने का फैसला क्यों लिया गया? क्या यह संभावित संकट की आशंका है या फिर वितरण व्यवस्था में कोई बड़ी खामी?
सदर बाजार के व्यापारियों का कहना है कि यह स्थिति “मांग से पहले डर” (fear-driven demand) की वजह से बनी है। जैसे ही लोगों को लगा कि गैस की किल्लत हो सकती है, उन्होंने स्टोव खरीदकर खुद को सुरक्षित करने की कोशिश शुरू कर दी।
कुल मिलाकर, बाजार की यह हलचल सिर्फ कीमतों का मामला नहीं है, बल्कि यह आम लोगों के मन में पैदा हो रहे असमंजस और भरोसे की कमी को भी दर्शाती है। अब देखना होगा कि सरकार इस पर क्या स्पष्टता देती है और बाजार कब तक स्थिर होता है।
एनडीटीवी के पुराने टाइम से जुड़े पत्रकार रवीश रंजन की ग्राउंड रिपोर्ट “कैरोसिन तेल मिलना शुरू भी नहीं हुआ और स्टोव के दाम आसमान छू रहे हैं” क्यों? और हाँ, गैस की उपलब्धता में कोई दिक़्क़त नहीं है तो फिर कैरोसिन तेल बेचने की बात सरकार ने की ही क्यों? -उमाशंकर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
सोचिए इस युद्ध से फ़ायदा किसे हो रहा है…
युद्ध से पहले सऊदी तेल का निर्यात 6,660,000 बैरल प्रति दिन करता था युद्ध के बाद अब 3,330,000 बैरल प्रति दिन।युद्ध के बाद यह 50% की गिरावट दर्ज की गई लेकिन
युद्ध से पहले तेल की कीमत $ 67 प्रति बैरल थी जो अब बढ़कर $130 प्रति बैरल हो गई…फिर सऊदी ने एशियाई खरीदारों पर $19.50 प्रति बैरल का प्रीमियम जोड़ दिया है..ये अब तक का सबसे बड़ा प्रीमियम है..अब खाड़ी देश स्ट्रेट आफ हरमुस को बायपास करके पाइप लाइन के जरिए Red Sea से 70 लाख बैरल तेल प्रतिदिन भेज रहे हैं…सोचिए तेल कम निकाल रहे हैं और मुनाफा ज्यादा कमा रहे हैं..इसी तरह ट्रंप के दोनों बेटों की हिस्सेदारी द्रोन बनाने वाली कंपनी में है जो इजरायल से लेकर गल्फ देशों को ये बेच रहे हैं..सोचिए युद्ध से मुनाफा कौन कमा रहे हैं…परेशान कौन है श्रीलंका, फ़िलीपींस, भारत और दूसरे एशियाई देश के लोग जो ईंधन की ज़रूरतों के लिए स्ट्रेट आफ हरमुस पर निर्भर है… -रवीश रंजन शुक्ला, वरिष्ठ संवाददाता एनडीटीवी


