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स्मिता प्रकाश v/s मिरांडा हाउस कॉलेज: छात्राओं और प्राध्यापकों ने ‘मैडम ANI’ का सामूहिक बहिष्कार किया था!

हेमंत कुमार झा-

यह संकेत है कि समय बदल रहा है और इसकी आहट कहीं दूर से सुनाई देने लगी है। देश की सबसे बड़ी न्यूज एजेंसी एशियन न्यूज इंटरनेशनल, जिसे उसके शॉर्ट फॉर्म “एएनआई” के नाम से जाना जाता है, की मालकिन और प्रधान संपादक स्मिता प्रकाश के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित कॉलेज मिरांडा हाउस में जो हुआ, वह जेन जी के मानस में आ रहे बदलावों की दूर से आती आहट है।

स्मिता प्रकाश को “द मून क्लब ऑफ मिरांडा हाउस” के द्वारा “सुवक्ता” के रूप में एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम को “ओरेटोरिया” के नाम से जाना जाता है। वे निर्धारित समय से पांच मिनट पहले कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गई लेकिन वे तब चकित रह गई जब उन्होंने देखा कि वहां उनके स्वागत में कोई खड़ा नहीं है, सभागार खाली है और सर्वत्र एक सन्नाटा सा पसरा है। हॉल के किसी कोने में दो चार लड़कियां आपस में बतियाती या मोबाइल में व्यस्त हैं। उन्होंने भी आमंत्रित वक्ता को कोई तवज्जो नहीं दी।

दरअसल, कॉलेज की तमाम छात्राओं और प्राध्यापकों ने स्मिता प्रकाश के होने वाले “व्याख्यान” का सामूहिक बहिष्कार कर दिया था। ऐसी परिस्थिति देख जो आयोजन के कर्ताधर्ता थे, वे भी कहीं मुंह छुपा कर भाग खड़े हुए।

बताया जा रहा है कि कार्यक्रम के लिए इमरती और समोसे का इंतजाम किया गया था। कॉलेज की लड़कियों ने मय इमरती समोसा हलवाई को बैरंग वापस भेज दिया।

क्यों हुआ ऐसा? वह भी दिल्ली विश्वविद्यालय के इतने प्रतिष्ठित संस्थान में। मिरांडा हाउस देश के चुनिंदा नामचीन गर्ल्स कॉलेजों में शुमार किया जाता है और यहां से पढ़ कर निकली लड़कियों ने एकेडेमिक्स, प्रशासन, जर्नलिज्म आदि क्षेत्रों में अपना ऊंचा मुकाम हासिल किया है। यहां के प्रोफेसरों का नाम है।

यह बदलते समय का संकेत है कि इस संस्थान ने सामूहिक रूप से उस वक्ता के व्याख्यान का बहिष्कार कर दिया जिसके बारे में उन्हें अंदाजा था कि वे क्या बोलने वाली हैं, क्या बोल सकती हैं, क्या बोलती रही हैं। वही…भारत विश्वगुरु बन रहा है, भारत महाशक्ति बन रहा है, भारत इतने ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बन रहा है, भारत विदेशों में अपने झंडे गाड़ रहा है, प्रधानमंत्री के सपनों का विकसित भारत 2047, इतिहास का पुनर्पाठ, भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक बोध आदि आदि आदि।

स्मिता प्रकाश ने नरेंद्र मोदी के कई इंटरव्यूज लिए हैं जिन्हें आज भी यूट्यूब पर देखा जा सकता है। उन नरेंद्र मोदी के, जो मीडिया को इंटरव्यू देने के लिए नहीं जाने जाते। लेकिन, स्मिता मैडम को उन्होंने साक्षात्कार दिए। एकाधिक बार दिए। कैसे सवाल पूछे होंगे उनसे स्मिता प्रकाश ने? उन्हें देखा और सुना जा सकता है।

ऐसे सवाल, जिनका देश के जरूरी सवालों से कोई वास्ता नहीं, ऐसे सवाल, जिन्हें किसी देश के प्रधानमंत्री से पूछने का कोई मतलब नहीं, ऐसे सवाल, जो मोदी जी की छवि के निखार में काम आ सकें। सिर्फ किसी नेता का छवि निर्माण…पत्रकारिता की आत्मा को गिरवी रख किसी खास नेता को लार्जर देन लाइफ दिखाने के संगठित और सुव्यवस्थित प्रयासों का एक अध्याय मात्र।

नरेंद्र मोदी के दौर में देश के मीडिया ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जो साख खोई है उसकी चर्चाएं देश विदेश में हैं। अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग्स में भारतीय मीडिया का स्थान नीचे किसी अंधेरी तलहटी में जा पहुंचा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तो इसकी गति इतनी हास्यास्पद हो गई कि विदेशों में लोग हंसते थे…जब भारत के कई नामचीन मीडिया चैनलों ने “ब्रेकिंग न्यूज” चलाई…”भारतीय सेना इस्लामाबाद में घुसी, पाकिस्तान के फलां शहर पर भारतीय सेना का कब्जा आदि आदि आदि।” यह पत्रकारिता की पेशेवर नैतिकता के पतन की पराकाष्ठा थी और किसी नेता विशेष के महिमामंडन की हास्यास्पद कोशिश।

भारतीय मीडिया के नैतिक पतन में बतौर किसी मीडिया संस्थान की सर्वेसर्वा, स्मिता प्रकाश की कैसी भूमिका रही है, मिरांडा हाउस की छात्राओं और वहां के प्राध्यापकों के द्वारा उनके व्याख्यान के सामूहिक और आश्चर्यजनक रूप से शत प्रतिशत बहिष्कार ने उस भूमिका पर गंभीर टिप्पणी की है। यह जेन जी के मानस में उपज रहे असंतोष की अभिव्यक्ति तो है ही, बौद्धिक तबके के ऊब की अभिव्यक्ति भी है।

समय बदल रहा है। लप्पेबाजियों के द्वारा नई पीढ़ी के मानस लोक को प्रभावित कर “नए भारत” के स्वप्नों के सृजन की कोशिशें अब नाकामयाब होती दिख रही हैं। कोई चुनाव जीत लेना अलग बात है, तात्कालिक परिस्थितियों का नतीजा है, लेकिन दूर क्षितिज पर बदलावों की लालिमा नजर आने लगी है। बौद्धिक वर्ग उद्वेलित है, नई पीढ़ी द्वंद्व में है। उस मरियल और कुपोषित से दिखने वाले नौजवान के उस अति वायरल वीडियो का स्मरण करें, जिसमें वह अपनी केंकियाती सी आवाज में किसी पत्रकार के माइक पर चिल्ला रहा है…”पहले अमेरिका हमको कहता था, तू क्या है बे, अब हम अमेरिका को कहते हैं कि तू क्या है बे”…। उस वीडियो को आज भी लोग देखते हैं और खूब हंसते हैं। अब तो और भी खूब खूब हंसने लगे हैं। बेचारा वह मंद बुद्धि, मरियल, कुपोषित नौजवान…जो अपनी निर्बल बाहें उठा कर अमेरिका को चुनौती देता दिख रहा था, आज सहज हास्य का प्रतीक है। प्रतीक है उस छद्म का जिसने युवाओं को दिग्भ्रमित करने के अलावा और कुछ नहीं किया।

छद्म पर आधारित, बड़े ही जतन और योजनाबद्ध तरीके से स्थापित किए जाते रहे मिथक टूट रहे हैं, लप्पेबाजियों पर आधारित नारों की संस्कृति का अवसान हो रहा है। कुछ बीत रहा है, कुछ ओझल हो रहा है। दूर…कहीं दूर से बदलावों की आहटें सुनाई देने लगी हैं। दुनिया की सर्वाधिक युवा आबादी के मानस लोक में कुछ तो ऐसा नया है जो घटित हो रहा है। अब तो स्वयं मोदी के कार्यक्रमों के लिए गलगोटिया यूनिवर्सिटी जैसी जगहों से बसों में भर कर युवाओं को ले जाने और किसी भी तरह महामानव की आभा को बनाए रखने की नाकामयाब कोशिशों की चर्चाएं होने लगी हैं। मीडिया के उनके धुरंधरों की लफ्फाजियां सुनने कौन जाएगा?

मूल खबर…

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