बिनोद बिहारी वर्मा-
बिहार की राजनीति में हाल के घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सम्राट चौधरी की ताजपोशी को लेकर अलग-अलग तरह के विश्लेषण सामने आ रहे हैं। एक पक्ष मानता है कि यह निर्णय नीतीश कुमार की सहमति से हुआ है—यहां तक कि उनके नाम पर ही सहमति बनी। वहीं दूसरी ओर यह भी चर्चा है कि भाजपा स्वयं सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री के रूप में आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं थी, बल्कि गठबंधन संतुलन बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया।
समारोह की सादगी भी इस बात की ओर संकेत करती है कि यह एक रणनीतिक निर्णय था, न कि शक्ति प्रदर्शन।
परंतु, यदि इसे व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो एक अलग तस्वीर उभरती है।
बिहार की राजनीति सदैव सामाजिक समीकरणों और जातीय आधार पर टिकी रही है।
- राजद का मुख्य आधार यादव और मुस्लिम मतदाता हैं।
- जदयू का आधार परंपरागत रूप से कुर्मी, कुशवाहा और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) रहा है।
- वहीं, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी जैसे नेता अपने-अपने जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या यह बदलाव केवल नेतृत्व परिवर्तन है, या एक बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा?
कुर्मी वोट बैंक, जो जदयू की रीढ़ रहा है, उसे सीधे तौर पर तोड़ पाना किसी भी दल के लिए कठिन रहा है। लेकिन कुशवाहा समुदाय, जिसकी जनसंख्या प्रतिशत अधिक मानी जाती है, उसमें सेंध लगाना एक प्रभावी रणनीति हो सकती है। यदि यह समीकरण बदलता है, तो जदयू का पारंपरिक आधार कमजोर हो सकता है।
आज की स्थिति में जदयू मुख्यतः कुर्मी वोट बैंक तक सीमित होता दिख रहा है, जबकि अति पिछड़ा वर्ग (EBC) का झुकाव परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है—क्या जदयू 2-3% के सीमित आधार पर भविष्य की राजनीति में अपनी प्रभावशीलता बनाए रख पाएगा?
यह केवल एक ताजपोशी नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में एक संभावित पुनर्संरचना की शुरुआत भी हो सकती है। आने वाला समय यह तय करेगा कि यह कदम जदयू के लिए पुनर्जीवन साबित होता है या उसके अस्तित्व के लिए चुनौती। आपका दृष्टिकोण क्या है?
बिहार सिर्फ अलग राज्य नहीं है, यह पूरी अलग दुनिया है।
आज भाजपा के लिए एक तरह से ऐतिहासिक दिन है। भाजपा ने हिन्दी-पट्टी को सबसे पहले फतह किया, लेकिन बिहार में अभी तक एक दिन के लिए भी अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पायी। अब जाकर भाजपा से कोई पहला मुख्यमंत्री बना है। गली-नाली के उद्घाटन को भी इवेंट बना देने वाली पार्टी में हर्ष अनुपस्थित दिख रहा है। होना जश्न चाहिए, माहौल मातम जैसा लग रहा है।
मातम तो जदयू वालों को मनाना चाहिए था। बिहार में पार्टी नंबर-1 रही हो या नंबर-2 या नंबर-3, 20-25 सालों से सबसे बड़ी कुर्सी पर उसका कब्जा रहा है। आज कब्जा हट गया। जदयू के सबसे बड़े नेता कुर्सी से उतर गये। फिर भी जदयू में जश्न का माहौल है। इसका कारण गोपनीय भी नहीं है। आज भले ही बिहार में पहली बार भाजपा से कोई मुख्यमंत्री बना हो, लेकिन वह मुख्यमंत्री भी बनाया है नीतीश जी ने ही। मुख्यमंत्री भाजपा से तो है, लेकिन कायदे से भाजपा का नहीं है। है कहीं और इतना मायावी लोकतंत्र? सीएम भाजपा का, पसंद जदयू की।
नीतीश कुमार जाते-जाते भी अपनी लकीर बड़ी कर गये हैं, कि अभी भी वही हैं बिहार के सबसे बड़े नेता, कि बिहार अभी भी बाहर से चाणक्य आयात नहीं करेगा। नेता बड़े हैं, इसमें तो शायद ही कोई संदेह करे। सीएम बड़े रहे, इसपर सबसे पहले मैं संदेह करूँगा। नीतीश जी के पूरे कार्यकाल में पहले 5 साल को हटाने के बाद सिर्फ गोबर बचता है। नीतीश जी के कार्यकाल का ज्यादातर हिस्सा सनका हुआ है। अंत के कुछ साल तो बेलगाम अफसरशाही और भीषण भ्रष्टाचार वाले। कभी कलई खुली तो लालूजी का कार्यकाल भी बेहतर होने का आभास दे सकता है।
मेरी व्यक्तिगत सोच है कि बाबुओं के भरोसे चलने वाली सरकार से लाख गुणा बेहतर वह सरकार भी है, जिसे ‘काला अक्षर, भैंस बराबर’ व्यक्ति ही लीड कर रहा हो। इस लिहाज से नीतीश जी का जाना बिहार के लिए हितकर है। यह काम 15 साल पहले होता, तो शायद बिहार का बहुमूल्य डेढ़ दशक व्यर्थ होने से बच जाता।
लेकिन डर है कि बिहार अभी जड़त्व से निकला नहीं है। जेपी ने अपने बुढ़ापे में बिहार को ऐसा अभिशप्त किया कि साढ़े 3 दशक बाद भी मुक्ति मिलती नहीं दिख रही है। बिहार को आगे बढ़ने के लिए लालू-नीतीश की छाया से यथाशीघ्र बाहर होने की जरूरत है। लेकिन बिहार को जो नया सीएम मिला है, उसके ऊपर दोनों ही छाया प्रबलता से उपस्थित हैं।
सम्राट चौधरी लालूजी की नर्सरी से निकले हैं। इनके और इनके पिताजी शकुनि चौधरी के कुछ पुराने वीडियो वायरल हो रहे हैं। एक वीडियो में शकुनि चौधरी नरेंद्र मोदी को भागलपुर की जमीन में गाड़ देने का आह्वान करते दिख रहे हैं। लालूजी की कृपा ने सम्राट चौधरी को पहली बार मंत्री बनाया। अब जब सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने हैं, तो वह नीतीश जी की कृपा ने बनाया है।
सम्राट चौधरी की सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि लालू-नीतीश की छाया से मुक्त हो सकें। इसके बाद दूसरी बड़ी चुनौती रहेगी कि दिल्ली के सामने रीढ़ सीधी रख सकें। पहली चुनौती से पार पाना एकबारगी संभव है, लेकिन दूसरी चुनौती को पार करना असंभव लगता है।
लेकिन राजनीति है बहुत दिलचस्प चीज। इधर प्रत्याशित से अधिक अप्रत्याशित घटने की परंपराएँ रही हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्रियों की सूची बनायी जाये, तो नवीन पटनायक उसमें ऊपर से ही कहीं दिखेंगे। नवीन पटनायक जब पहली बार मुख्यमंत्री बने, उनके पास पहले से कोई अनुभव नहीं था, ओडिया भी नहीं आती थी। मौजूदा मुख्यमंत्रियों में पड़ोसी उत्तर प्रदेश के योगीजी की प्रशंसा सब करते हैं। इस युग की भाजपा में योगी जो कर पा रहे हैं, वह प्रशंसनीय है भी। हमारे प्रधानमंत्री जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, उन्हें जनता ने नहीं चुना था। तो बहुत उदाहरण हैं। बहुत अच्छी प्रेरणाएँ हैं।
हम एक बिहारी होने के नाते बिहार के हित में प्रार्थना करेंगे कि हमारे नये मुख्यमंत्री भी इसी तरह का कोई अच्छा उदाहरण स्थापित करें। अभी तक हमारे नये सीएम नेता तो रहे हैं, अब उन्हें खुद को लीडर सिद्ध करना है। लीडर तमाम इफ्स ऐंड बट्स को पार कर ही लेते हैं। तो हमारी ओर से शुभकामनाएँ। अपना भी अच्छा करिये। बिहार का भी भला करिये। वर्ना हमलोग तो हैं ही दर्शकदीर्घा में, जो चियर कम करते, लेकिन हूट दमभर करते हैं।
(बिहार अलग दुनिया क्यों है, इसपर एक बीसी वाली थियरी है मेरी। दरअसल पृथ्वी के शुरुआती दिनों में, जब न तो पृथ्वी के पास वातावरण की सुरक्षित परत थी और न ही चुंबकीय क्षेत्र, कई आकाशीय पिंड आते-टकराते रहते थे। विज्ञान बताता है- ऐसे ही किसी पिंड की टक्कर से चंद्रमा की उत्पत्ति हुई है। मेरी थियरी कहती है कि बिहार वाला हिस्सा भी ऐसा ही कोई बाहरी आकाशीय पिंड है। इसीलिए अद्भुत है। दुनिया 21वीं सदी का एक-चौथाई पार कर लेती है, हम 20वीं सदी के आधे पर ही अटके रह जाते हैं।) -सुभाष सिंह सुमन


