कभी सुर्खियों में उछालकर किसी की छवि को तार-तार कर देना और फिर सालों बाद एक छोटे से “खेद” नोटिस में उसे समेट देना—क्या यही है पत्रकारिता की जिम्मेदारी? दैनिक भास्कर का ताजा ‘खेद’ विज्ञापन इसी सवाल को खड़ा करता है कि जब बिना पुख्ता आधार के खबरें छापी गईं, तब जिनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची, उसका हिसाब कौन देगा—और क्या एक माफीनामा उस नुकसान की भरपाई कर सकता है?
अख़बार Dainik Bhaskar ने थूक कर चाट लिया…
आज लिख रहे हैं कि हमारी ख़बरें झूठी थी, लेकिन ख़बरें छपने पर लोगों का जो मानमर्दन होता है, उसका क्या… -शुभांगी सिंह

शुभांगी के पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स भी पढ़िए…
कमलेश गुज्जर-
यह देख लो तीसरा स्तंभ इनको यह सर्टिफिकेट कहां से मिल गया कि किसी की छवि को कभी भी सार्वजनिक रूप से धूमिल कर के फिर माफी मांग लेना बड़ी कठोर सजा होनी चाहिए इसके क्योंकि व्यक्ति जीवन में समाज में अपनी पहचान कठोर परिश्रम और कड़ी मेहनत के पीछे कामयाब करता है और दो टके के न्यूज़ वाले कभी कुछ भी छाप देते आम नागरिकों का तो क्या हाल होगा पुलिस थानों से पकड़े गए अंनगीनत लोगों का फोटो और चेहरा यह लोग बड़े शौक से छापते हैं। किसी को माफिया किसी को बदमाश घोषित कर देते हैं इनका कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस व्यक्ति के घर परिवार और उसके सामाजिक प्रवेश पर क्या फर्क पड़ेगा इनको तो एक दिन का मसाला मिलना चाहिए। लेकिन अब इसे कहते है थूक कर चाटना।
हेमंत जयमन दबंग-
दैनिक भास्कर (अलवर) ने मेरे खिलाफ एक खबर छापी, स्वर्गीय न्यायाधीश यादराम मीणा के भाई बृजेश मीणा ने एक दिन पूर्व पुलिस थाने में एलानिया SC-ST एक्ट में एफआईआर कराने की धमकी दिया था.. अगले दिन SC-ST एक्ट में झूठी FIR दर्ज कराई गई, जिसका हवाला देते हुए दैनिक भास्कर अलवर ने खबर छाप दी थी…FIR के अनुसार जो घटनास्थल था, मैं उस समय वहां पर मौजूद नही था.. जबकि मैं उस दौरान एक अन्य साथी पत्रकार के साथ आबकारी अधिकारी के ऑफिस में आबकारी अधिकारी का एक मामले में वर्जन ले रहा था.. मुझसे ये तक नही पूछा अखबार ने की आपका क्या कहना है… केवल FIR के आधार पर छाप दिया नाम… बाद में पुलिस जांच में वो FIR पूरी तरह से झूठी साबित हुई… पुलिस ने अदम झूठ में FR कोर्ट में पेश कर दी… दैनिक भास्कर के क्राइम रिपोर्टर राधेश्याम तिवाड़ी को जब मैंने यह कहा कि अब तो छाप दो कि उक्त FIR में मुझपर झूठे आरोप लगाए गए थे, तो वह साफ मना कर गया…फिलहाल संबंधित दस्तावेज प्राप्त करने के बाद कार्यवाही करने का सुझाव मिला है.. सीनियर अधिवक्ताओं के द्वारा…
खबरों की खबर-
वर्ष 2006 में दैनिक भास्कर एमडी सुधीर अग्रवाल ने एकतरफा खबर छापने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए निर्देश दिए थे कि FIR में जिसके खिलाफ आरोप है उसका भी पक्ष लेकर छापा जाएगा। बिना पक्ष लिए खबर नही छपेगी। दोनों पक्षो की संतुलित खबर छपती थी। काफी वर्षो तक यह नियम अपनाया, लेकिन वर्ष 2014 के बाद एक तरफा खबरे छपने लग गई। हालांकि भास्कर बड़े नेता, प्रभावशाली लोगों के खिलाफ एकतरफा खबरे नही छपती। सामान्य व बिना प्रभाव वाले लोगो के साथ भास्कर अभी भी एकतरफा, बिना पक्ष लिए खबरें छाप रहा है। झूठी खबरे छापने में रिकॉर्ड बना रहा है।
नीता चौधरी-
मेरे हसबैंड का भी हरेसमेंट किया था जोधपुर पुलिस वालों के साथ मिलकर। बस इतनी गलती थी अपने ड्राइवर के कहने पर उसे लेने चले गये वो चोरी मे लिप्त था बस उनकी स्कूटी देखकर ही आरोप मढ़ दिया कि चोरी की है। उस फैक्ट्री मालिक के साथ मिलकर। पुलिस वाले भी सादी वर्दी में हमारे घर आए कि चोरी का माल यहां उतरवाकर 3 साल की जेल करवायेंगे। लेकिन पढ़ा लिखा काम आता है और घर का सीसीटीवी काम आया। हिम्मत की जोधपुर कमिश्नरेट गयी वहां एफआईआर लिखवाई अपने वकील के द्वारा। अखबार में तो झूठी कहानी दे दी। लेकिन मेरे हसबैंड बेकसूर थे बाहर आ गये। आपको फॉलो किया था। बेमतलब न्यूज से मैंने और मेरे बच्चे ने बहुत हरेसमेंट झेला समाज का मगर आपसे हिम्मत मिली कि जब आप जैसे वकील को फंसाया गया हरेसमेंट किया गया तो मेरे हसबैंड तो साधारण से इंसान हैं। बस आज मैं मजबूती से खड़ी हूं। हमें पता है ये अखबार वाले और पुलिस वालों का खेल। ये तो बकते है छोटी मोटी चोरी नहीं बड़ी बड़ी चोरी करो जिससे हम प्रमोशन भी पा लें बेकसूर को फंसाकर।
एडवोकेट राहुल दत्त शर्मा-
देश का तीसरा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया आजकल लिफाफा मीडिया की श्रेणी में आते हैं इनको सिर्फ लिफाफे कैसे बनाने है उसपर ध्यान है सच्ची खबरों और गरीबों की खबरों पर तो इनका ध्यान नहीं होता है आम जनता की समस्या तब तक उठाएंगी जब तक लिफाफा मजबूत ना हो जाए और अपने आप को सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट और देश के न्यायाधीशों से ऊपर समझने लगते है सारी मीडिया ट्रायल अपने न्यूज चैनल और पेपरों में ही छाप देता है चाहे वो सच हो या झूठ।


