सरकारी खर्चे से विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने की योजना का खुलासा हुआ। दि एशियन एज ने शीर्षक में ही लिखा है, मोदी सरकार की पहली बड़ी हार। पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल है, कानून नहीं तो संशोधन कैसा। देशबन्धु ने इससे संबंधित खबर प्रमुखता से छापी है। इसके अलावा अमर उजाला की खबर है, सरकार की योजना विपक्ष के खिलाफ अभियान चलाने की है।

यह प्रदर्शन, इसका कल (रात) ही होना और आज अखबारों में छपना बता रहा है कि तैयारी पहले से थी और पता तो था ही। सवाल यह है कि जानते बूझते सरकार ने यह दांव क्यों चला होगा? जाहिर है, इस हार में भी उसे लाभ दिख रहा है। इसीलिए मैं पूरे प्रयास को शुरू से हेडलाइन मैनेजमेंट मानता रहा हूं। एक लाभ तो हुआ ही है। पश्चिम बंगाल में जो ऐतिहासिक हुआ और हो रहा है उसकी चर्चा तो रह ही गई। यह नहीं होता तो वही होता।
संजय कुमार सिंह
दि इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, विपक्ष अड़ा, महिला विधेयक गिरा। इसके साथ छपी एक और खबर का शीर्षक है, जब मतदान की बारी आई तो सरकार को लगा, विधेयक गिर जाएगा तब ठीकरा विपक्ष पर फोड़ दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, लोकसभा में विपक्ष ने विधेयक को गिराया, यह राजग सरकार की पहली विधायी हार है। असल में महिला आरक्षण के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम पहले ही पास हो चुका है। महिला आरक्षण देने की मांग तब नहीं मानी गई थी। अभी जब बंगाल चुनाव में लाखों मतदाता मताधिकार से वंचित किए गए, सुप्रीम कोर्ट के ट्रिब्यूनल से भी काम नहीं हो पाया और सुप्रीम कोर्ट भी मताधिकार के प्रति गंभीर नहीं दिखा तो हेडलाइन मैनेजमेंट जरूरी था। वैसे भी ममता बनर्जी और सबसे ज्यादा महिला सांसद वाले तृणमूल का विरोध करते हुए भाजपा महिला विरोधी नजर आ रही थी। सुब्रमण्यम स्वामी के आरोप और मधु किश्वर के हमलों का असर था ही, तो सरकार के लिए कुछ करना जरूरी हो गया होगा और यह विधेयक इसीलिए पेश किया था कि पास हो जाए तो श्रेय मिलेगा नहीं और तब ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा जा सकेगा। भाजपा ने एक और चाल चली कि महिला विधेयक को परिसीमन से जोड़ दिया। परिसीमन से भाजपा को फायदा होना है और पास होना मुश्किल था। संविधान संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है जबकि आम संशोधन बहुमत से पास हो जाते हैं। सरकार को (और सबको) यह सब मालूम था। सरकार को उम्मीद रही होगी कि विपक्ष इसका विरोध नहीं करेगा और प्रचार भी इसी ढंग से किया जा रहा था। कल मैंने यहां इस बारे में लिखा ही था। पर आज ज्यादातर अखबारों ने खास बातें बता दी है। इसीलिए, द हिन्दू का शीर्षक तथ्यात्मक है। मुख्य शीर्षक और उपशीर्षक भी प्रतियोगिता परीक्षा के सवाल के जवाब जैसा है। वैसे भी टाइम्स ऑफ इंडिया जब सात रुपए का है तो द हिन्दू 12 रुपए का है। इसमें सरकार की सेवा का दबाव अपनी जगह है। इसलिए शीर्षक बिकाऊ नहीं हो पर सच्चाई है।
वैसे भी, नारी शक्ति वंदन अधिनियम या महिला आरक्षण का मामला अलग है और इस बारे में देशबन्धु ने लिखा है, केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण कानून यानी ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023‘ को 16 अप्रैल 2026 से लागू कर दिया है। संसद में गुरुवार से ही इसके संशोधन पर 3 दिनों के लिए बहस शुरू हुई। इस बीच, आधी रात को मूल कानून लागू करने का नोटिफिकेशन जारी किया गया। इसका मतलब यह है कि महिला आरक्षण के जिस कानून में संशोधन की बात की जा रही है, वह लागू ही नहीं हुआ था। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, कानून में बदलाव तभी हो सकता है जब वह लागू हो चुका हो। अचानक सरकारी नोटिफिकेशन की यही वजह है। हालांकि, कानून लागू होने के बावजूद संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण तुरंत नहीं मिलेगा। 2023 के कानून के मुताबिक, यह 2027 की जनगणना और उसके आधार पर होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू किया जा सकेगा। द हिन्दू का शीर्षक है, परिसीमन पैकेज का भाग, संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हुआ। आप जानते हैं कि परिसीमन से सांसदों की संख्या डेढ़ गुना होने का अनुमान था। ज्यादातर सीटें उत्तर भारत में या हिन्दी पट्टी में बढ़नी थी जबकि दक्षिण की सीटें अपेक्षाकृत और तुलनात्मक रूप से ठीक भी बढ़तीं तो उत्तर भारत में इतनी सीटें हो जाएंगी कि केंद्र में सरकार बनाने के लिए दक्षिण में लोकप्रियता जरूरी नहीं रह जाएगी। इसलिए इसका विरोध तो हो ही रहा था दो तिहाई समर्थन की आवश्यकता की शर्त भी इसीलिए है। उपशीर्षक के अनुसार, विधेयक को 352 वोट के दो तिहाई निशान से कम वोट मिले। 298 इसके पक्ष में था जबकि 230 इसके खिलाफ था। मतदान के समय सदन में 528 सदस्य उपस्थित थे। गृहमंत्री अमित शाह ने विपक्ष को चेतावनी दी है कि उसे महिला मतदाताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा।
हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, “महिलाओं के आरक्षण के लिए लोकसभा की सीटें बढ़ाने वाले परिसीमन (पर) विभाजन ने विधेयक को गिरा दिया”। खबर का इंट्रो है, “सभी राज्यों में 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने के अमित शाह के मौखिक आश्वासन के बावजूद एकजुट विपक्ष ने 131 वें संविधान संशोधन विधेयक को पास नहीं होने दिया”। इस खबर के साथ छपा एक शीर्षक है, “सरकार के लिए अगला कदम : कैबिनेट मीटिंग, अभियान”। स्मृति काक रामचंद्रन की बाईलाइन वाली हिन्दुस्तान टाइम्स की इस खबर में कहा गया है, सरकार ने शुक्रवार को लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक के खिलाफ वोट देने के लिए विपक्ष को ‘महिला-विरोधी’ के तौर पर पेश करने की कोशिश की। इस संदेश को पूरे देश में फैलाने के लिए एक बड़ा अभियान तैयार किया। वहीं शनिवार को कैबिनेट की एक बैठक असामान्य रूप से तय है जिसे लेकर भी अटकलें तेज़ हो गई हैं। 131वां संविधान संशोधन बिल लोकसभा में ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में नाकाम रहा और इसके कुछ ही मिनट बाद, राजग के फ्लोर लीडर्स भाजपा नेता जेपी नड्डा की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में शामिल होने के लिए दौड़ पड़े। संसद के बाहर, मूसलाधार बारिश के बीच, भाजपा की महिला सांसदों ने विपक्ष और खासकर कांग्रेस के खिलाफ नारे लगाए। ऐसा लगा कि यह राजग के उस संभावित अभियान की रूपरेखा तय कर रहा है, जिसके ज़रिए वह विपक्ष को निशाना बनाएगा।
इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने पर अंदर जो सब होने की जानकारी दी है उनमें प्रमुख है, संसद की हार में सरकार के लिए सीख और जोरदार ड्रामा, अच्छी-खासी निश्चिंतता और एक हार। इसके अलावा दीप्तिमान तिवारी और लिज मैथ्यू की बाईलाइन वाली खबर है, लोकसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण और परिसीमन का प्रावधान करने वाला संविधान संशोधन विधेयक वोटिंग के लिए रखे जाने से कुछ घंटे पहले ही सरकार को यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि उसके पास ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं है। लेकिन भाजपा नेताओं और सरकारी सूत्रों ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि वे इस मोड़ पर विधेयक को वापस नहीं लेंगे; इसके बजाय वे चाहेंगे कि यह विपक्ष के हाथों ही गिर जाए। विधेयक को बचाने की आखिरी कोशिश में, सत्ताधारी पार्टी ने दिन के दौरान अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी और कुछ अन्य विपक्षी पार्टियों से संपर्क करने की कोशिशें कीं। उन्हें ऐसा लगा कि जब विधेयक वोटिंग के लिए आएगा, तो विपक्ष के ही कुछ धड़े इसका समर्थन करेंगे, क्योंकि उन्हें चुनावों के दौरान सवालों का सामना करने की चिंता थी। स्मृति काक रामचंद्रन की खबर के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक्स पर कहा, “उनकी (विपक्ष की) सोच न तो महिलाओं के हित में है और न ही देश के।” हालांकि, ऐसी अटकलें थीं कि सरकार एक नया बिल ला रही है, जो महिला आरक्षण कानून को एक नई ‘परिसीमन प्रक्रिया’ से जोड़ देगा—यह प्रक्रिया सिर्फ़ निर्वाचन क्षेत्रों का आकार बदलने के लिए होगी, न कि उनकी संख्या बदलने के लिए—लेकिन वरिष्ठ नेताओं ने इस मामले पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
दि एशियन एज का शीर्षक भी टाइम्स ऑफ इंडिया जैसा है और शीर्षक में ही लिखा है, मोदी सरकार की पहली बड़ी हार। दि एशियन एज ने राहुल गांधी के भाषण का जिक्र भी पहले पन्ने पर विस्तार से किया है। द टेलीग्राफ ने भी लिखा है, संसद में मोदी के लिए पहले बड़े झटके में महिला आरक्षण और लोकसभा के विस्तार की योजना नाकाम हो गई। विधेयकों को बहुमत नहीं मिला। टेलीग्राफ की एक खबर का शीर्षक है – विपक्ष ने कहा, महिलाओं की आड़ में चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक एक तरह का प्रयोग है। मुझे नहीं जमा लेकिन एक शीर्षक खास है, “संविधान पर आक्रमण (था), हमने रोका : राहुल”। इसके साथ बड़े फौन्ट में बड़ी (लंबी) खबर का शीर्षक है, “अमित शाह बोले – महिलाएं देख रही हैं कि कौन है रास्ते का रोड़ा”। मुझे लगता है कि जो महिलाएं देख रही होंगी वे समझ भी रही होंगी। हालांकि, आज तो काफी कुछ खबरों से भी समझाया गया है या समझ आ रहा है। अमर उजाला में सरकार की हार जैसा कुछ शीर्षक में नहीं है लेकिन बैनर खबर है और इससे भी साफ है कि सरकार के लिए मामला कितना गंभीर है। अमर उजाला में सांसदों के प्रदर्शन की तस्वीर का कैप्शन है, विपक्ष के खिलाफ अभियान चलाएगा एनडीए….। इसमें सांसदों या महिलाओं के हाथों में तख्तियां नहीं हैं। इससे लगता है कि तैयारी पहले से थी। सबसे खास बात देशबन्धु ने प्रमुखता से छापी है, कानून नहीं तो संशोधन कैसा विपक्ष। इसकी चर्चा पहले कर चुका हूं। जाहिर है, भाजपा अगर महिला आरक्षण को लेकर विपक्ष के खिलाफ कोई आंदोलन चलाएगी तो वह राजनीति होगी, निराधार। सरकारी खर्च पर तो हो ही रही है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


