उर्मिलेश-
हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सत्यम वर्मा की गिरफ़्तारी अत्यंत निंदनीय है. यूपी की नोएडा पुलिस ने उन पर अनर्गल आरोप मढ़े हैं. देश की प्रमुख न्यूज एजेंसी- UNI-यूनीवार्ता में लंबे समय तक काम कर चुके सत्यम वर्मा को अंग्रेजी-हिंदी के श्रेष्ठ अनुवादकों में शुमार किया जाता है.
पर आज के निजाम के मिजाज और शासकीय कामकाज की शैली देखिये! प्रकाशित खबरों के मुताबिक सत्यम वर्मा को पुलिस ने “नोएडा के श्रमिक अशांति प्रकरण” में किसी आधार और साक्ष्य के बगैर 16 अप्रैल को लखनऊ से गिरफ्तार कर लिया.

यह शैली सिर्फ ‘इमर्जेंसी’ जैसी नहीं; ‘इमर्जेंसी का भी बाप’ है! क्योंकि इस तरह का निरंकुश शासकीय कामकाज किसी ‘इमर्जेंसी’ की आधिकारिक घोषणा के बगैर हो रहा है! कमोबेश, सभी भाजपा-शासित प्रदेशों में बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है..
19 अप्रैल को दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में देश के विख्यात वरिष्ठ अधिवक्ता काॅलिन गोंजाल्वेस सहित कई कानूनविदों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सत्यम वर्मा की गिरफ़्तारी को अवैध और असंवैधानिक कदम करार दिया.
वरिष्ठ पत्रकार-लेखक सत्यम वर्मा को अविलंब रिहा कर उन पर थोपे मामलों को वापस लेना चाहिए.
जाने माने जन इतिहासकार प्रो. लाल बहादुर वर्मा के बेटे और यूनीवार्ता के संपादक पत्रकार सत्यम वर्मा को नोएडा पुलिस ने मजदूर आंदोलन से बेहद सतही तरीके से जोड़ते हुए गिरफ्तार कर लिया। सत्यम वर्मा पर आरोप है वो मजदूरों को लखनऊ से भड़का रहे थे। 10 हजार की दिहाड़ी में 4 हजार का सिलेंडर खरीद रहे मजदूर किसी के भड़काने से बहक जाएंगे ? महंगाई, बेरोजगारी, न्यूनतम मजदूरी मांग रहे लोग अब देश के खिलाफ षड्यंत्रकारी की तरह पेश किए जा रहे हैं। -आलोक चिक्कू
नवीन कुमार-
यह तस्वीर सीने के आरपार कर देने वाली है। हमारे समय के सबसे मुखर जन बुद्धिजीवियों में से एक सत्यम वर्मा की गिरफ्तारी हममें से हरेक की गिरफ्तारी है। यह हर चिंतक, हर बुद्धिजीवी, हर विचारशील छात्र, युवा और शिक्षक की सामूहिक गिरफ्तारी है। हिंदी विश्व को गंवार समझने वाले नरेंद्र मोदी की उजड्डताएं बर्बरता के नए मापदंड रच रही हैं। उनकी खिसकती जमीन को बचाने के लिए मीडिया ने जिस तरह अपने आपको बिछा दिया है वह शर्मनाक है। लेकिन यह समय है, जब हम सबको जो स्वतंत्रता, न्याय और बराबरी के पक्षधर हैं, इस गिरफ्तारी के खिलाफ उठ खड़ा होना होगा।
हिंदी विश्व के जो भी गणमान्य घोषित तौर पर इस गिरफ्तारी का विरोध नहीं कर रहे हैं वो मनुष्यता के हत्यारों के पक्ष में खड़े माने जाएंगे, चाहे वो कितने भी महान, विशिष्ट या साधारण क्यों न हों। इधर-उधर बात करने की कायर होशियारियां हम संविधानवादी समतावादी लोग याद रखेंगे।
योगी सरकार शर्म करो।
सुभाष चंद्र कुशवाहा-
सत्यम वर्मा, सुप्रसिद्ध इतिहासकार लालबहादुर वर्मा के पुत्र हैं और एक सजग बुद्धिजीवी हैं। उन्होंने शिक्षा, साहित्य, चेतना और सामाजिक सरोकारों के लिए स्वयं को समर्पित किया है। लखनऊ के जनचेतना केंद्र के संस्थापक सत्यम वर्मा पत्रकारिता, प्रकाशन और प्रगतिशील साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं।
नोएडा मजदूर आंदोलन से उनका या किसी भी सामाजिक व्यक्ति का नाता अधिकतम इतना ही हो सकता है कि वह उसका समर्थन करे। सत्यम वर्मा न तो नोएडा गए और न ही मजदूर आंदोलन में शामिल हुए। फिर किस आधार पर उनकी गिरफ्तारी हुई? यह एक संवैधानिक देश में गंभीर चिंता का विषय है।
इतनी अराजकता किसी भी देश के लिए उचित नहीं है। क्या किसी को केवल इस आधार पर मनमाने तरीके से गिरफ्तार किया जा सकता है कि वह आपका अंधभक्त नहीं है? यह एक गैर-संवैधानिक कृत्य है। सत्यम वर्मा को रिहा किया जाना चाहिए और यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उनका अपराध क्या था। #satyamvarma #JusticeForAll



Mohammad Anees
April 22, 2026 at 4:11 pm
कहाँ से लाता है फर्जी न्यूज तू कोर्ट ने बिना साक्ष्य देखें रिमांड कैसे दे दिया निठल्ले कभी तो सही खबर डाल ले दल्ले