बंगाल में आज मतदान है। द टेलीग्राफ में छपी बख्तरबंद गाड़ी की तस्वीर। कैप्शन के अनुसार, यह मुर्शिदाबाद के समसेरगंज की है। कल टेलीग्राफ में समसेरगंज की खबर छपी थी। मैंने यहां उसकी चर्चा नहीं की थी लेकिन आज इस तस्वीर के साथ उस खबर को और बंगाल में भाजपा को समझने में सहूलियत होगी। दिन में खबर आई कि भाजपा के एक उम्मीदवार को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया और उसके साथ सुरक्षा के नाम पर एक निहत्था सिपाही था। केंद्रीय सुरक्षा बलों की टुकड़ियां पता नहीं कहां हैं। इस तरह घुसपैठिए तलाशने से शुरू हुई मनमानी लॉजिकल डिसक्रिपेंसी तक पहुंची और चुनाव आयोग के काम में न्यायिक अधिकारियों को लगाने तथा ट्रिब्यूनल बनाने के बावजूद काम समय पर पूरा नहीं हुआ और चुनाव आयोग ने 139 लोगों को वोट देने की इजाजत दी तो खबर वह भी है। इंडियन एक्सप्रेस में इनकी कहानी भी है और एक से मुलाकात भी करवाई गई है। द टेलीग्राफ ने भी बताया है कि एसआईआर के साये में कैसा चुनाव हो रहा है। कुल मिलाकर बंगाली भाई आपस में लड़ रहे हैं। हिन्दू मुसलमान तो नहीं हो पाया है।

संजय कुमार सिंह
यह दिलचस्प है कि पिछली बार आठ चरणों में होने वाला पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार दो ही चरण में हो रहा है। आज पहले चरण का मतदान है और आज ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ‘खबर’ है। आप जानते हैं कि केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी भिन्न राज्यों के छोटे दलों के टुकड़े करने, उन्हें बर्बाद करने के बाद और ऐसी कोशिशों के क्रम में इस बार पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ पूरी तैयारी और गंभीरता से चुनाव ‘लड़’ रही है। इसकी तैयारी पहले से थी और चुनाव की घोषणा से पहले ही आई-पैक के ठिकानों पर ईडी का छापा पड़ा था। यह कुछ समय पहले या कुछ समय बाद भी पड़ सकता था। लेकिन उस दिन पड़ने के कारण ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि छापे के जरिए उनकी पार्टी की चुनावी जानकारी भाजपा को लेनी थी। इसीलिए छापे की जानकारी स्थानीय पुलिस को भी नहीं दी गई या देर से दी गई। दूसरी ओर, कोलकाता में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद छापे वाली जगह जाकर कुछ (अपनी) फाइलें ले आईं। लोगों को यह पहले से पता था कि आई-पैक तृणमूल के लिए चुनावी प्रबंध के काम करता है और ममता बनर्जी का आरोप था कि केंद्र की भाजपा सरकार ईडी के जरिए उनकी चुनावी जानकारी व डेटा लेना चाहती थी। जिसे वे खुद जाकर ले आईं। इसके खिलाफ मामला हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। इसपर कार्रवाई जारी है लेकिन आज के अखबारों में खबर होना दिलचस्प है। देशबन्धु ने इस खबर को दो कॉलम में छापा है और बताया है, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई कड़ी फटकार। कहा है, ममता के आचरण ने लोकतंत्र को खतरे में डाला। यही नहीं, अदालत का मानना है – किसी मुख्यमंत्री का जांच में हस्तक्षेप करना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर सकता है। मुझे लगता है कि ममता बनर्जी के आरोप में दम है, छापे की टाइमिंग से लेकर आज इस खबर की टाइमिंग बता रही है कि केंद्र सरकार अपनी दूसरी ताकतों से तृणमूल को हराने की कोशिश कर रही है। चुनाव आयोग के जरिए एसआईआर होना और उसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा नहीं रोका जाना तथा उसमें लॉजिकल डिसक्रिपेंसी ठीक करने की कोशिश तथा इसमें समय ज्यादा लगने के कारण लाखों वोटर को वोट डालने से वंचित रखना भी लोकतंत्र को खतरे में डाल रहा है। इसलिए, मैं इस खबर को पहले पन्ने लायक नहीं मानता और मेरी चले तो कहूंगा कि इस खबर का आज छपना या कल ऐसी टिप्पणी किया जाना भी लोकतंत्र पर हमला हो सकता है। इसलिए इस खबर के मामले में पत्रकारीय सतर्कता जरूरी है (थी)।
तथ्य है कि इसके बावजूद अमर उजाला में यह खबर लीड है। चार कॉलम की लीड का शीर्षक है, “ईडी की जांच में मुख्यमंत्री का दखल लोकतंत्र के लिए खतरा : सुप्रीम कोर्ट”। यही नहीं, इस खबर का उपशीर्षक है, “ममता पर सख्त टिप्पणी : यह केंद्र राज्य विवाद नहीं बल्कि एक व्यक्ति के आचरण का मामला” है। मुझे लगता है कि यह केंद्र राज्य के विवाद या मुकाबले में केंद्र की तरफ से ईडी का उपयोग करने का मामला है और सुप्रीम कोर्ट निष्पक्ष होकर देखता तो राय कुछ और हो सकती थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट केंद्र के साथ हो गया लगता है और इसलिए ममता बनर्जी या उनकी पार्टी केंद्र से अलग लगती है और यह महसूस नहीं हो रहा है कि केंद्र सरकार भी एक पार्टी है जिसे भारतीय जनता पार्टी कहा जाता है। प्रधानमंत्री भाजपा के प्रधान प्रचारक भी हैं। मुझे लगता है कि इस खबर को लीड बनाने से पहले इन बातों का ख्याल रखा जाना चाहिए था। आज चूंकि पश्चिम बंगाल में मतदान है, तृणमूल कांग्रेस के प्रति भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार की एजेंसियों का रुख हमें मालूम है इसलिए इस खबर को भी इसी आलोक में देखा-समझा जाना चाहिए था। लिहाजा मुझे अमर उजाला का यह शीर्षक अटपटा लग रहा है कि, किसी ने नहीं सोचा होगा – मुख्यमंत्री जांच में दखल देगा। मुझे लगता है कि छापा मुख्यमंत्री या बंगाल में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल का चुनाव प्रबंध करने वाली पार्टी के ठिकाने पर था तो मुख्यमंत्री के दखल नहीं देने का कोई कारण ही नहीं है। वैसे भी, ऐसा किसी ने नहीं सोचा होता तो छापे की पूर्व जानकारी नियमानुसार राज्य पुलिस को दी जानी चाहिए थी। जानकारी नहीं होने का मतलब भी यही है कि छापे के निशाने पर कंपनी और दफ्तर नहीं सत्तारूढ़ राजनीतिक दल है। और तब मुख्यमंत्री की कार्रवाई एकदम सामान्य लगती है लेकिन यह विचारधारा का मामला भी हो सकता है और विपक्षी दलों को परेशान करने वाली पार्टी तृणमूल को भी कर सकती है वरना सरकार, सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग के लिए सब बराबर हैं। एक जैसे हैं और होने ही चाहिए।
मुख्यमंत्री के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी वाली यह खबर आज नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है। जाहिर है, अखबारों ने वही किया है जो सरकार चाहती है। अखबारों में आज कोलकाता का द टेलीग्राफ खास है। इसकी लीड का शीर्षक है, SIR के साये में – सड़कों पर बख्तरबंद गाड़ियां हटाए गए मतदाता —चुनाव में बदलाव के आरोप। मुझे लगता है कि अखबारों में साया सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग का भी है। सुप्रीम कोर्ट की बात ऊपर कर चुका। चुनाव आयोग की खबर अमर उजाला में चार कॉलम में है। इसका शीर्षक है, पीएम पर टिप्पणी मामले में खरगे को आयोग का नोटिस। 24 घंटे में मांगा जवाब, सीतारमण, रिजिजू समेत तीन मंत्रियों ने चुनाव आयोग से की थी शिकायत। शिकायत की एक और खबर थी। उसपर कार्रवाई या कार्रवाई नहीं होने की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 अप्रैल 2026 को राष्ट्र को संबोधित किया था। इसे लेकर विपक्षी दलों और कई नागरिकों ने आरोप लगाया कि यह भाषण चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन था। आरोप यह भी था कि संबोधन में विपक्ष पर राजनीतिक टिप्पणी की गई और सरकारी मंचों (जैसे दूरदर्शन/रेडियो) का इस्तेमाल हुआ। खबर थी कि चुनाव आयोग ने शिकायत को संज्ञान में लिया था और जांच होने वाली थी या हो रही होगी। क्या कोई कार्रवाई हुई? पता नहीं, नोटिस जारी होने या पक्ष मांगने की खबर भी नहीं है। एक जैसे दो मामलों में अगर एक में कार्रवाई हो, दूसरे में नहीं तो मीडिया का काम है कि दूसरे के बारे में पूछकर बताये या यह बताए कि दूसरे मामले में कोई खबर नहीं है। आज अखबारों ने यह भी नहीं किया है।
इसी तरह, अखबारों में (देशबन्धु में सिंगल कॉलम) खबर है, चुनाव आयोग ने 1072 करोड़ की नकदी और महंगी धातु की जब्ती की खबर दी है। यह राशि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में जब्त हुई बताई जाती है। जब चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप हैं तब मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट सभी दलों के लिए है लेकिन प्रधानमंत्री के खिलाफ शिकायत पर कार्रवाई की खबर याद नहीं है। और प्रधानमंत्री तो छोड़िए, भाजपा के खिलाफ भी कार्रवाई की खबर नहीं मिलती है। उदाहरण के लिए इस जब्ती के साथ नहीं बताया गया है कि कौन कितने रुपए के साथ कहां पकड़ा गया। खबर से सिर्फ यह प्रचार हो रहा है कि चुनाव आयोग अपना काम कर रहा है। सच्चाई यह है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 के दौरान एक होटल में नकदी मिलने का मामला काफी चर्चित हुआ था। उसमें पार्टी और नेता का नाम भी खुलकर आरोपों में आया था। यह आरोप भाजपा के महाराष्ट्र के नेता पर नहीं, राष्ट्रीय महासचिव पर लगा था। विपक्षी दल बहुजन विकास आघाड़ी (बीवीए) ने आरोप लगाया था कि यह “वोटरों को प्रभावित करने” के लिए था। होटल के कमरों से चुनाव टीम ने करीब ₹9.93 लाख नकद बरामद भी किया। हालांकि भाजपा ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया था। ऐसे में बरामदगी की खबर किस काम की?
बंगाल में चुनाव जितना गंभीर हो गया है उस गंभीरता से आज सिर्फ दि इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपी है। शीर्षक में ही बताया गया है बंगाल के बृहद निष्कासन के बाद 34 लाख अपील में सिर्फ 139 निपटाए गए। साफ तौर पर यह लॉजिकल डिसक्रिपेंसी के बहाने लोगों के मतदान अधिकार छीनने का मामला है। भले इसकी शुरुआत घुसपैठियों को बाहर करने के कथित गंभीर मुद्दे से शुरू हुई पर घुसपैठिए होने नहीं थे, मिले नहीं और चुनाव आयोग वही करता रहा जो उसे करना था। इंडियन एक्सप्रेस ने बाकी खबरों से साथ आई-पैक मामले में सुप्रीम कोर्ट की खबर भी छापी है लेकिन कई अखबारों में यही एक खबर पहले पन्ने लायक है। टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स में चुनाव की खबर को महत्व नहीं मिला है। द हिन्दू में यह खबर सेकेंड लीड है। दि एशियन एज में आज मतदान की खबर लीड है। ममता बनर्जी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की खबर को हिन्दुस्तान टाइम्स ने पूरा महत्व दिया है। दि एशियन एज ने अमित शाह के बयान को प्रमुखता से छापा है जिसमें उन्होंने दीदी के सत्ता से बाहर होने की भविष्यवाणी की है। यही नहीं, प्रधानमंत्री का दावा भी है कि भारत आतंकवाद के आगे कभी नहीं झुकेगा। इससे वे क्या कहना चाहते हैं, समझना मुश्किल है लेकिन कहा है तो खबर होनी ही है। उन्होंने यह बात पहलगाम हमले की बरसी पर कही। आप जानते हैं कि पहलगाम के हमलावर महीनों नहीं पकड़े गए, एक मुठभेड़ में उन्हें मार गिराने का दावा जरूर किया गया लेकिन तमाम अगर-मगर के साथ। इसमें यह पता नहीं चला कि अपराध करके वे महीनों जंगल में कैसे और कहां छिपे रहे। आतंकवाद की इस वारदात के बाद दिल्ली में भी एक वारदात हुई और जवाबी ऑपरेशन सिन्दुर का जो हुआ सो आप जानते ही हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


