संजीव पालिवाल-
वो एक फोन कॉल और दस साल….
ज़िंदगी हर वक्त हैरान करती है। उसके अपने तरीके हैं हमें चमत्कृत करने के। हमें संवारने के। निखारने के। हम नहीं जानते कि ज़िंदगी ने हमारे बारे में क्या सोच रखा है। हमें हमसे बेहतर ज़िंदगी जानती है।
जनवरी 2015 की एक सुबह इत्मीनान से मैं नौकरी पर आया था। शाम होते होते मैंने अपने दोस्त Tasleem Khan तस्लीम खान को बुलाया और कहा कि यार, सोच रहा हूं कि नौकरी छोड़ दूं। हालात ऐसे थे कि बगैर लड़ाई झगड़े के नौकरी चल नहीं सकती थी। उसने दस सेकेंड सोचा औऱ बोला। छोड़ दो।
उस वक्त करीब दो सौ से ज़्यादा लोग मुझे रिपोर्ट करते थे। उससे कुछ महीनों पहले ये संख्या पांच से ज़्यादा थी।
मैंने तस्लीम से कोई और बात नहीं की। तुरंत एक लाइन का इस्तीफा भेज दिया। बॉस ने पूछा। एचआर ने वजह पूछी। मैंने किसी से कुछ नहीं कहा। कहने का फायदा नहीं था। मैं जान चुका था कि बॉस की नज़र में मैं उनका पसंदीदा इंसान नहीं हूं। वो कुछ महीनों पहले ही आये थे। किसी बॉस या इंसान की नज़र में आपकी कितनी वैल्यू है ये हमें हमेशा पता होता है। हम बस उसे पहचानने और एक्सेप्ट करने से इंकार करते रहते हैं। ये बात इश्क और जॉब दोनो पर लागू होती है।
अगले रोज़ मैं रिलीव हो गया। और तकरीबन 6 महीने मेरे पास कोई काम नहीं था। ये वक्त घर पर टीवी देखते हुए कटा। फिर एक नौकरी मिली। वो तीन महीने चली। तब तक Netflix लॉंच हो गया। मैं वो देख कर वक्त काटने लगा। ना किसी से बात होती ना किसी का फोन आता। गिनती के चार लोग थे, आज भी हैं, जो फोन करते थे। हालचाल लेते थे।
ऐसे ही 24 जनवरी 2016 की शाम, फोन की घंटी बजती है। सुप्रिया प्रसाद फोन करते है “क्या कर रहे हो”।
“कुछ नहीं” खाली बैठा आदमी क्या जवाब देगा। वही दिया।
“अच्छा सुनो, एक जॉब है, तुम्हारे प्रोफाईल की तो नहीं है। लेकिन अगर करना चाहो तो कर सकते हो। पैसे भी ज्यादा नहीं हैं। लेकिन ठीक-ठाक हैं।“

ज्यादा पैसे क्या होते हैं ये मुझे पता था। मैं ज़्यादा पैसे वाली ही नौकरी छोड़ कर आया था। और घर पर खाली बैठे इंसान की क्या डिमांड हो सकती है? खैर ठीकठाक पैसे की बात सुनकर मुझे सुकून मिला। चलो पेट भरने के जुगाड़ तो हो गया। पैसे ठीक ठाक ही थे।
मेरे लिये उस वक्त ज़्यादा बड़ी बात ये थी कि कोई मुझे याद कर रहा था। किसी ने सोचा कि एक आदमी खाली बैठा है। उसे कोई काम दिया जा सकता है। मैं खुश था कि सुप्रिय ने मुझे याद किया।
फिर इंटरव्यू हुआ। वो कहानी फिर कभी। फरवरी बीता, मार्च में फिर एक और इंटरव्यू हुआ। अप्रैल 2016 की 16 तारीख को मेरे फोन की घंटी बजी जिसमें एचआर ने बताया कि मुझे ऑफर लेटर भेजा जा रहा है। अगले हफ्ते मुझे ज्वाइन करना है। हालाकि, इस बीच मैं उम्मीद छोड़ चुका था।
और 25 अप्रैल 2016 को मैंने आजतक ज्वाइन कर लिया। आज से ठीक दस साल पहले। लेकिन जो मैं लिख रहा हूं वो कहानी उस दिन की नहीं है। कहानी पिछले दस साल की है। दरअसल जो काम मैं करने आया था, अगर सिर्फ वही काम करता तो आज आप सब मुझे जान ही नहीं पाते। मैं एक गुमनाम ज़िंदगी जी रहा होता। आज भी मैं वो काम करता हूँ। लेकिन उस काम की कोई पहचान नहीं है।
सुप्रिय ने एक ऐसा काम और किया जिसने मेरी ज़िंदगी बदल दी। सितंबर 2016 में उन्होंने मुझे साहित्य से जोड़ दिया। मुझे लेखक बना दिया। मुझे कविता वाचक बना दिया। मुझे नये सिरे से तराश दिया। मुझे नयी पहचान दे दी। रही बात पैसे की तो वो मुझे आज भी ठीक-ठाक मिलते हैं। लेकिन इज़्ज़त और जो पोज़ीशन उन्होंने मुझे दी वो बेमिसाल है।
सुप्रिय चाहते तो वो काम किसी को भी दे सकते थे। जिसे कह देते वो कर देता। उनके पास तो सैंकड़ो लोग हैं जो रिपोर्ट करते है। एक से एक धुरंधर, लेकिन ना जाने क्यों उन्होंने मुझे चुना। ये आज भी आश्चर्य है मेरे लिये।
दस साल में चार किताबें, 14 साहित्य आजतक, एक दर्जन से ज्यादा शहरों में लिटरेचर फेस्टिवल में शिरकत। बतौर साहित्यकार पहचान। कवियों में ज़बर्दस्त क्रेज़। हालत ये है कि इतने निमत्रण आते हैं कि विमन्रता से इंकार करना पड़ता है। कुछ और किताबें पाइप लाइन में हैं।
आज से दस साल पहले क्या मैं ये सब सोच सकता था? क्या ऐसा कोई ख्वाब था? सच कहूं तो नहीं। सुप्रिय की वो एक फोन कॉल। एक वाक्य – “एक जॉब है। करोगे। पैसे कम है लेकिन ठीकठाक है।“ मेरा बगैर हिचके हां कर देना।
ज़िंदगी सच में हैरान करती है। सुप्रिय को मेरा ही ख्याल क्यों आया। वो चाहते तो किसी को भी कॉल कर सकते थे। ज़िंदगी वाकई में एक पहेली ही है।
ज़िंदगी ने हमारे बारे में क्या सोच रखा है हमें कभी पता नहीं होता। हम बस उसके करतब पर हैरान हो सकते हैँ। धन्यवाद सुप्रिय प्रसाद, बार-बार हैरान करने के लिये।


