संजय कुमार सिंह
आज मैंने 11 अखबार देखे। इनमें दो ही अखबार ऐसे हैं जिनमें आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा के नेतृत्व में पार्टी के कुल 10 में से सात सदस्यों का भाजपा में शामिल होना लीड नहीं है। ये दो अखबार हैं, कलकत्ता का द टेलीग्राफ और दक्षिण भारत का द हिन्दू। टेलीग्राफ का संस्करण दिल्ली से नहीं है और मैं कलकत्ता एडिशन ही देखता हूं जबकि द हिन्दू का दिल्ली एडिशन काफी समय से आ रहा है। द टेलीग्राफ में राघव चड्डा के दल बदल की खबर सिंगल कॉलम में है जबकि द हिन्दू में तीन कॉलम में है। बाकी सबमें यह लीड है और आप जानते हैं कि राघव चड्ढा काफी समय से भारतीय जनता पार्टी में जाते दिख रहे थे लेकिन बड़ी-बड़ी बातें भी कर रहे थे। पहले भी किया है और पार्टी प्रमुख अरविन्द केजरीवाल की खास पसंद रहे हैं। देश के प्रतिभाशाली युवाओं के प्रतिनिधि माने जा सकते हैं और इसलिए इन्होंने जो किया उसे भविष्य के भारत (या भारत के नेता) का संकेत भी माना जा सकता है। मेरा मानना है कि जो स्थितियां हैं उसमें मीडिया खासकर अखबारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। आप जानते हैं और मैं देख रहा हूं कि भाजपा अपने विरोधी दलों को खत्म करती जा रही है जो सहयोगी दल हैं उन्हें भी इस लायक नहीं छोड़ा है कि वे मजबूत विरोध कर सकें। ना सहयोगी शिवसेना बची ना अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे नीतिश कुमार बचे। नीतिश कुमार की एक और खासियत है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने पर उन्होंने भाजपा के सहयोग से चलने वाली सरकार से इस्तीफा दे दिया था लेकिन बाद के समय में भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री की कुर्सी तोड़ते रहे। कुछ समय लालू यादव (उनके बेटे) के साथ रहे लेकिन फिर मोदी शरणम गच्छामी कर दिया था। मोदी के निशाने पर अब ममता बनर्जी है और महिला मुख्यमंत्री तथा सबसे ज्यादा महिला सांसदों की नेता को चुनाव हराने के लिए नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाया और नारी शक्ति वंदन का ड्रामा किया। इसके बाद राष्ट्र के नाम संबोधन के जरिए भी वही सब करने की कोशिश की। इसकी शिकायत की गई है लेकिन कार्रवाई का पता नहीं है। इस बीच अगर कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को आतंकी कह दिया (हालांकि उन्होंने इससे इनकार किया है) तो उनकी शिकायत की गई है और चुनाव आयोग कार्रवाई कर रहा है।
आज खबर है कि आम आदमी पार्टी का राज्यसभा का संसदीय दल टूट गया, भाजपा की भूमिका का पता नहीं चला या जो पता चला या जो समझ में आता है उसकी पुष्टि नहीं हुई। आइए, आज भिन्न अखबारों के शीर्षक देखें और अगर आप स्थितियों को जानते-समझते हैं तो बताइए कि जो शीर्षक है उससे आपको सही जानकारी मिल रही है। यहां मैं सभी अखबारों की खबर नहीं लिख रहा हूं लेकिन जैसी खबर आपके अखबार में है उसके आधार पर बताइए कि आपके अखबार की खबर कैसी है और वह कौन सा अखबार है।
1. अमर उजाला
आप में सबसे बड़ी टूट, राघव के नेतृत्व में सात राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल है। दो उपशीर्षक हैं, 1) उच्च सदन में पार्टी के उपनेता अशोक मित्तल, संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजिन्दर गुप्ता ने भी छोड़ी पार्टी। 2) चड्ढा बोले, आदर्शों व बुनियादी मूल्यों से भटकी पार्टी। मित्तल के यहां 10 दिन पहले ही पड़े थे ईडी के छापे। भाजपा की प्रशंसा में अखबार ने यह भी लिखा है, अपने दम पर बहुमत के और करीब भाजपा। मुझे लगता है यहां अपने दम को स्पष्ट किया जाना चाहिए था या इस खबर का मतलब नहीं है। सबको पता है कि भाजपा का अपना दम ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसी भी है।
2. देशबन्धु
राघव की बगावत से ‘आप’ दो फाड़। उपशीर्षक है, राघव चड्डा समेत आम आदमी पार्टी के सात सांसदों ने बदला पाला। यहां दल बदल कानून ध्यान आता है और अखबार ने एक खबर छापी है, दल बदल कानून क्या कहता है।
3. नवोदय टाइम्स
बगावत से बिखरी आम आदमी पार्टी। उपशीर्षक है, 10 राज्यसभा सदस्यों में से सात भाजपा में शामिल। भाजपा में शामिल नहीं होने वाले आप के सांसदों में एक नाम संजय सिंह का है। एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने लिखा है, अयोग्य घोषित करने की मांग करूंगा।
4. नवभारत टाइम्स
आप में टूट, राघव बोले – सात सांसद हमारे साथ, उपशीर्षक है – भाजपा प्रमुख से मिले राघव, संदीप पाठक, अशोक मित्तल। राघव चड्ढा बोले, एक गुट के रूप में बीजेपी में शामिल होंगे।
5. दैनिक भास्कर
मुख्य शीर्षक है, पंजाब से दिल्ली तक… हम आपके सात नहीं (इसे ऐसे भी लिखा जा सकता था, …. हम सात आपके)। फ्लैग शीर्षक है, ऑपरेशन लोटस – राघव चड्ढ़ा सहित 7 राज्यसभा सांसदों ने आप छोड़ी, भाजपा अध्यक्ष ने किया स्वागत। कुछ अखबारों ने ही इस खबर के साथ आप का पक्ष रखा है। दैनिक भास्कर में तीन उपशीर्षक है, एक आप का पक्ष है – यह पंजाब सरकार का कामकाज रोकने की साजिश है।
6. दि इंडियन एक्सप्रेस
मुख्य शीर्षक है, आप को एक बड़े झटके में, इसके 10 राज्यसभा सदस्यों में से सात ने भाजपा में दलबदल की। इस मुख्य शीर्षक के तहत चार कॉलम की फोटो है और एक-एक कॉलम की दो खबरों का शीर्षक है 1) आप ने इसे ‘विश्वासघात’ कहा, भाजपा पर एक अन्य ‘ऑपरेशन लोटस’ का आरोप 2) चड्ढा को हटाया जाना, मित्तल ईडी के रडार पर : आप ने शुरुआती संकतों की ओर इशारा किया।
7. टाइम्स ऑफ इंडिया
चड्ढा, 6 अन्य राज्यसभा सांसदो के आप छोड़ने से बड़ा झटका, भाजपा में शामिल हुए, इंट्रो है – दलबदल कानून की दो तिहाई सीमा पूरी करते हैं।
8. हिन्दुस्तान टाइम्स
आप (में) उथलपुथल : 7 राज्यसभा सांसदों ने बगावत की, केजरीवाल का साथ छोड़ा। इंट्रो है – केजरीवाल ने कहा, पंजाब के लोगों के साथ धोखा हुआ।
9. द हिन्दू
आप के 7 राज्य सभा सदस्यों ने पार्टी छोड़ी, भाजपा में विलय तय
10. द टेलीग्राफ
चड्ढा, 6 अन्य सांसद भाजपा में शामिल हुए
11. दि एशियन एज
आप में विस्फोट : चड्ढा, 6 अन्य राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल होंगे।
स्पष्ट है कि अखबारों की चिन्ता यह नहीं है कि आम आदमी पार्टी ने किसे (या कैसे लोगों को) राज्य सभा का सदस्य बनाया और भाजपा उन्हें तोड़ने या अपने पाले में लेने में कैसे कामयाब हो गई। कहने की जरूरत नहीं है कि लोकतंत्र में यह बड़ा मामला है और हम देख रहे हैं कि भाजपा ने एक बार सत्ता पर कब्जा पाने के बाद उसपर बने रहने के लिए क्या सब किया है और अब जब प्रधानमंत्री पर कंप्रोमाइज्ड और सीआईए प्लांट होने का आरोप है तब उनकी सरकार को समर्थन देने का अर्थ बदल गया है। वैसे भी, राज्य सभा को उच्च सदन कहा जाता है और तमाम अधिवक्ताओं को इस सदन में रखा जाता रहा है जो पार्टी लाइन पर काम करते रहे हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी को जब भाजपा की सरकार आर्थिक घोटाले में फंसाने की कोशिश कर रही थी तब आप ने चार्टर्ड अकाउंटेंट को सदस्य बनाया और भले पार्टी के सदस्यों ने पार्टी के लिए काम किया उन्हें सरकार से वेतन-भत्तों के मद में पैसे मिले। ऐसा पहले से होता आया है। कई उदाहरण हैं। ऐसे में सोशल मीडिया पर यह सब चर्चा है कि आप ने किसे क्यों सदस्य बनाया और क्या करना चाहिए था आदि। मेरा मानना है कि पार्टी का निर्णय उसका आंतरिक मामला है, जो बताया जाए और जो दिखाई दे वह निष्कर्ष या खबर हो सकता है। ऐसे में स्वाति मालीवाल पहले से अपनी पार्टी के खिलाफ काम कर रही थीं और राघव चड्ढा के खिलाफ कार्रवाई करते हुए पार्टी ने जिन्हें सदन का नेता बनाया उनपर सरकारी कार्रवाई हो गई। ऐसे में सात सासंदों का एक साथ या एक गुट के रूप में पार्टी से अलग होना दल बदल कानून को अंगूठा दिखाना है। नैतिकता का तकजा है कि वे इस्तीफा दें। भाजपा राज में यह सब होता नहीं है। देखिए आपके अखबार में क्या है। जरूरी समझें तो मुझे भी बताएं लेकिन मीडिया जो नहीं कर रहा है वह शर्मनाक है।
आप के साथ जो हुआ वह पंजाब में इसकी सरकार गिराने की साजिश लग रही है। ईडी-सीबीआई का डर दिखाकर और पैसे देकर तो कोई भी सरकार गिराई जा सकती है यह भी समस्या है। दूसरी ओर, भाजपा ‘शीश महल’ जैसे मुद्दे छोड़ नहीं रही है। अभी भी उसे भुनाने की कोशिश चल रही है। ऐसे में सोशल मीडिया एक्स पर राजीव ध्यानी ने लिखा है, शान्ति भूषण, एडमिरल रामदास, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव ,आनंद कुमार, राजमोहन गांधी, अजीत झा, मेधा पाटकर, आशुतोष, मयंक गांधी, अंजलि दमानिया, संतोष हेगड़े, धर्मवीर गांधी, एस पी उदयकुमार, सोनी शोरी, बल्ली सिंह चीमा, लिंगराज प्रधान, क्रिस्टीना सामी…. बनाम राघव चड्ढा, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, राजेंद्र गुप्ता, विक्रम साहनी इत्यादि। इसपर प्रशांत भूषण ने लिखा है, आम आदमी पार्टी छोड़ने वाले पहले समूह और आप छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले सात लोगों के हालिया समूह में क्या अंतर है? पहले समूह के लोग तब पार्टी छोड़कर गए जब केजरीवाल ने उन सिद्धांतों से समझौता किया जिन पर पार्टी की स्थापना हुई थी। राघव चड्ढा के नेतृत्व वाले दूसरे समूह ने सत्ता के सभी लाभों का आनंद लिया, जिसमें राज्यसभा के लिए मनोनीत होना भी शामिल था। ये लोग विशुद्ध अवसरवादिता के चलते भाजपा में शामिल हुए हैं, जिनमें कोई सिद्धांत नहीं है। राघव चड्ढा भाजपा में जा रहे हैं ये तो बच्चा-बच्चा समझ रहा था। पंजाब सरकार ने सुरक्षा हटाई तो जो हुआ और जिस तेजी से हुआ उसके बाद कोई शक नहीं रह गया था। उधर लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी वाले डॉ अशोक कुमार मित्तल के यहां ईडी छापे के बाद ‘मेरी मर्जी’ कहना ही रह गया था। इसमें इस बात का कोई मतलब नहीं है कि केजरीवाले ने किसे राज्य सभा सदस्य बनाया किसे नहीं बनाया। मुद्दा यह भी तो होना चाहिए कि भाजपा ने किसे और कैसे-कैसों को अपने दल में शामिल किया। उसके कार्यकर्ता कहां हैं, कैसे हैं। हम केजरीवाल की गलतियां ढूंढ़कर संतोष करें या भाजपा की प्रशंसा करें फर्क नहीं पड़ता है।
सौरभ भारद्वाज ने कहा है, पार्टी की ताकत उसके आम लोग हैं। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी ने कहा था, ना खाउंगा, ना खाने दूंगा। लेकिन नेशनल हेरल्ड की एक एक खबर के अनुसार, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा किए गए ₹54,282 करोड़ के बेहिसाब खर्च को उजागर किया है, जिससे पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ऑडिट रिपोर्ट में व्यय अभिलेखों में खामियों की ओर इशारा किया गया है, जिससे पता चलता है कि सार्वजनिक धन के एक महत्वपूर्ण हिस्से का ठीक से हिसाब-किताब या सत्यापन नहीं किया जा सका। इन निष्कर्षों ने राजकोषीय निगरानी और सरकार द्वारा सार्वजनिक धन के प्रबंधन को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। खबरों के अनुसार, पवन खेड़ा को गुवाहाटी हाईकोर्ट से भी नहीं मिली जमानत, कोर्ट ने बताया जालसाजी-साजिश का गंभीर मामला: कहा- निर्दोष महिला को विवाद में घसीटा, पूछताछ जरूरी। लेकिन जांच कौन कर रहा है? वही असम पुलिस? इस बार सीबीआई, ईडी क्यों नहीं और राज्य पुलिस की जांच के लिए पवन खेड़ा को गिरफ्तार करना जरूरी है। मुंबई पुलिस ने पत्रकार अर्नब गोस्वामी को किसी और के मामले में गिरफ्तार किया था तो सुप्रीम कोर्ट ने एक हफ्ते के अंदर जमानत दे दी थी। पवन खेड़ा ने पूर्व में भ्रष्ट कहे जाने वाले कांग्रेसी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए तो अब भाजपाई मुख्यमंत्री ने 100 पुलिस वालों को विमान से दिल्ली भेज दिया और सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा को हाईकोर्ट जाने के लिए कहा। मुख्यमंत्री ने तो खेड़ा का पेड़ा बनाने के लिए कहा ही है। सरकार सत्ता से चिपक कर हिन्दुओं का भला कर रही है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


