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आज के अखबार : दल बदल कानून को सख्त बनाने की आम आदमी पार्टी की कोशिश को भी याद नहीं किया है

संजय कुमार सिंह

आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्डा के नेतृत्व में राज्यसभा के सात सदस्यों के दल-बदल के बाद जब उनकी सदस्यता बचने या जाने पर चर्चा हो रही थी तब उनके निजी विधेयक की खबर इंडियन एक्सप्रेस में प्रमुखता से छपी है। सुबह अखबार देखने के बाद मैंने ‘राघव चड्डा का प्राइवेट बिल’ गूगल किया तो मुझे कई खबरों के लिंक मिले। इनमें सबसे पुराना पांच घंटे पहले का था और इस समूह के हिन्दी अखबार जनसत्ता का था। जनसत्ता में रहते हुए मैंने इंडियन एक्सप्रेस की खबरों का खूब अनुवाद किया है और अरुण शौरी की लंबी-लंबी खबरें जो सवा-डेढ़ पेज की होती थीं उसी दिन छपती थीं। आज ऐसा नहीं है। दिन में पांच घंटे पहले का मतलब हुआ एक्सप्रेस की खबर से ही लिखी गई है। जनसत्ता के महानगर एडिशन में आज यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अंदर होने लायक नहीं है और अंदर हो भी तो यही साबित होता है कि खबरों की तमीज अब अखबारों (बनाने वालों) में नहीं रह गई है। राघव चड्डा ने ऐसा कोई बिल पेश किया था – यह तो बहुतों को याद होगा और होना चाहिए। इसके बाद जब राघव चड्ढा ने दल-बदल की, इतने सदस्यों के साथ की कि दल बदल कानून से बच सकें तो इस विधेयक की चर्चा बनती है। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी ने जब इनकी सदस्यता खत्म करने की मांग की है तो भी उस खबर को याद किया जाना चाहिए था। आज जनसत्ता में आप सांसद संजय सिंह की फोटो के साथ यह खबर है। लेकिन राघव चड्ढा के प्राइवेट बिल की खबर अखबार छपने के बाद इंडियन एक्सप्रेस से की गई है (होगी)।

आम आदमी पार्टी के बर्बाद और खत्म हो जाने की तथाकथित खबरों तथा इसके कारणों की विशेषज्ञ जानकारी तथा इसके लिए पार्टी प्रमुख अरविन्द केजरीवाल को दोषी ठहराने वाली अटकलों तथा विशेष सूचनाओं के बीच पार्टी छोड़कर जाने वाले राज्यसभा सदस्यों की सदस्यता खत्म करने की मांग करना निश्चित रूप से खबर है लेकिन यह खबर (या सूचना) ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आम आदमी पार्टी की ओर से राघव चड्ढा ने ही दल बदल कानून को सख्त बनाने के लिए निजी विधेयक पेश किया था। खबरों के अनुसार (और अब तो जनसत्ता में हिन्दी में है), राघव चड्ढा ने 5 अगस्त 2022 को प्राइवेट मेंबर के तौर पर संविधान (संशोधन) बिल पेश किया था। यह उनके राज्यसभा में आने के तीन महीने बाद की बात है। बिल में कहा गया है कि दल-बदल विरोधी कानून में विधायकों की खरीद-फरोख्त को रोकने की बात कही गई थी। हालांकि बिल अभी भी पेंडिंग है। राघव चड्ढा के ऑफिस ने दि इंडियन एक्सप्रेस के कमेंट की रिक्वेस्ट का जवाब नहीं दिया। इस खबर से यह भी पता चलता है कि दल बदल पर आम आदमी पार्टी की सोच क्या है और राघव चड्ढा तथा सत्तारूढ़ भाजपा की क्या है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह विचारधारा की बात है। आम आदमी पार्टी की ओर से राघव चड्ढा ने यह विधेयक पेश किया था और भारतीय जनता पार्टी ने न सिर्फ राघव चड्ढा और टीम को बल्कि पहले भी दूसरे दलों के लोगों को स्वीकार किया है। तोड़फोड़ भी करती रही है। यही नहीं, गोदी मीडिया के भाग कहे जाने वाले ज्यादातर अखबारों ने आज इस खबर को प्रमुखता देने की जरूरत नहीं समझी। सच्चाई यह है कि सिद्धातहीन जनप्रतिनिधियों ने जब आया राम-गया राम की हद कर दी तो दल बदल विधेयक की जरूरत महसूस की गई थी। यह उस 70 साल में हुआ जब नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि कुछ नहीं हुआ। वर्षों बाद एक (सत्तारूढ़) पार्टी के रूप में भाजपा ने हर दल के भांति-भांति के लोगों को न सिर्फ स्वीकार किया है बल्कि जिसपर भ्रष्टाचार के आरोप लगाती थी उसे मुख्यमंत्री बना दिया। उनसे हिन्दू-मुसलमान भी करवा रही है। जाहिर है, उसे ऐसे किसी कानून की जरूरत नहीं महसूस हुई होगी और यह भी विचारधारा का मामला है।

अरविन्द केजरीवाल के मामले में सीबीआई की ओर से सरकार या सरकारी वकील या सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है और अब यह चर्चित है कि किसी संस्था के कार्यक्रम में जाने और विचारधारा से फैसले प्रभावित नहीं होते। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है, “यदि यह मान लिया जाए कि जज के परिवार का कोई सदस्य सरकारी पैनल में है इसलिए जज को ऐसे मामलों की सुनवाई नहीं करनी चाहिए तो ट्रायल कोर्ट्स से लेकर उच्चतम स्तर तक न्यायपालिका का बड़ा हिस्सा काम ही नहीं कर पाएगा।” जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि किसी भी पक्षकार को यह दिखाना जरूरी होता है कि कथित संबंध का मामले के फैसले पर सीधा प्रभाव या संबंध है। इस मामले में ऐसा कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। मुझे लगता है कि यह ठोस आधार नहीं है तो विचारधारा का मामला है और विचारधारा फैसले को प्रभावित करे या नहीं अभी तो फैसला पूरी तरह प्रभावित है। इसलिए, राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी छोड़ने और भाजपा में शामिल होने के जो तर्क बता रहे हैं वो सब विचारधारा के मुद्दे हैं। इसे आसानी से समझने के लिए स्वार्थ को मुद्दा कहा जा सकता है। ऐसे में राघव चड्डा जब दल बदल के खिलाफ एक सख्त कानून बनाने की मांग कर रहे थे तब जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि किसी भी पक्षकार को यह दिखाना जरूरी होता है कि कथित संबंध का मामले के फैसले पर सीधा प्रभाव या संबंध है। इस मामले में ऐसा कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। इस तरह जिस मामले में अऱविन्द केजरीवाल दावा कर रहे हैं कि उन्हें फंसाया गया है उससे बचने के लिए राघव चड्ढा भाजपा में शामिल हो गए हैं। दूसरी ओर, यह भी तथ्य है कि दल बदल के मामले में  राघव का बिल ज़्यादा सख़्त दल-बदल विरोधी कानून की मांग करता था। उन्होंने मांग की थी कि पार्टी तोड़ने के लिए दो तिहाई नहीं बल्कि तीन चौथाई बहुमत की ज़रूरत हो।

अपने बिल के जरिए राघव चड्ढा ने विधायकों द्वारा उन्हें चुनने वाले वोटरों की लोकतांत्रिक इच्छाओं को पूरी तरह नजरअंदाज़ करते हुए गलत तरीके से पार्टी बदलने का ज़िक्र किया था। राघव चड्ढा के प्रस्तावित बिल में संविधान के दसवें शेड्यूल के लिए और कड़े नियमों के जरिए दल-बदल विरोधी नियमों को मजबूत करने की मांग की गई थी। इसमें दल-बदल के आधार पर चुने हुए प्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराने की भी मांग की गई थी। प्रस्तावित कानून का मकसद संविधान के आर्टिकल 102 और 191 में बदलाव करके और दसवें शेड्यूल में बदलाव करके पार्टी के लेजिस्लेटिव स्ट्रेंथ के दो तिहाई से तीन तिहाई तक करने की मांग की गई थी। उन्होंने तर्क दिया था कि इंटर पार्टी मर्जर की लिमिट बढ़ाकर हमारी डेमोक्रेसी को मजबूत करना और हमारे पब्लिक प्रतिनिधियों को पॉलिटिकल पार्टी वर्कर के बजाय जानकारी रखने वाले लॉमेकर बनने में मदद करना था। इसलिए ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने से बैन करने की मांग की गई थी। इसमें यह भी प्रस्ताव दिया गया कि अगर सांसद या विधायक चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदलते हैं, तो उन्हें छह साल के लिए चुनाव लड़ने से बैन कर दिया जाएगा। वहीं रिसॉर्ट पॉलिटिक्स को रोकने के लिए ऐसे चुने हुए प्रतिनिधियों को सरकार से समर्थन वापस लेने के 7 दिनों के अंदर चेयर के सामने पेश होना जरूरी होगा। ऐसा न करने पर उन्हें अयोग्य घोषित किया जा सकता है। बिल में कहा गया था, “संविधान के दसवें शेड्यूल में किसी सदन के सदस्य की ओरिजिनल पॉलिटिकल पार्टी का मर्जर तभी माना जाएगा जब संबंधित पार्टी के कम से कम तीन-चौथाई सदस्य ऐसे मर्जर के लिए सहमत हों।” इस तरह, जाहिर है कि संविधान की रक्षा के लिए सख्त दल बदल विरोधी कानून की मांग करने वाले राघव चड्ढा का भाजपा ने अपने पाले में बांह फैला कर स्वागत किया है।

मीडिया जब तथ्यों को छिपाता है और भाजपा अनुकूल खबरें ही देता है तो आज भाजपा के अनुकूल खबरें छपी हैं। इनमें प्रधानमंत्री का यह दावा है भी है कि (बंगाल) राज्य टीएमसी के अपराधी चलाते हैं (दिं ऐशियन )। मणिपुर को कौन चला रहा है इसका पता प्रधानमंत्री को है या नहीं। खबरों से दिख रहा है कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बंगाल जीतने के लिए लगे हैं जबकि आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने दावा किया है कि बीजेपी में विलय का फैसला लेने वाले 7 सांसदों की सदस्यता रद्द होगी। संजय सिंह ने इस मामले में रविवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस की। इसमें उन्होंने कहा, ‘संविधान के कई जानकारों, देश के वरिष्ठ अधिवक्ता व संविधान विशेषज्ञ कपिल सिब्बल और पीडीटी आचार्य ने साफ़ कर दिया है कि आप को तोड़कर बीजेपी में विलय करने का फ़ैसला लेने वाले सात लोगों की सदस्यता ख़त्म होगी। ये बहुत साफ़ तौर पर है।’ संजय सिंह ने कहा कि उन्होंने राज्य सभा के सभापति से मांग की है कि इस मामले की सुनवाई जल्द से जल्द करके अपनी ओर से न्यायपूर्ण फैसला दें। संविधान की 10वीं अनुसूची में भी साफ़ तौर पर लिखा गया है कि इस तरह की किसी भी तोड़फोड़ की इजाजत भारत का संविधान नहीं देता है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में संजय सिंह ने कहा कि उन्होंने सभापति से अपील कर दी है और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाक़ात के लिए समय मांगा है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री ने कहा है और देशबन्धु में पहले पन्ने पर छपा है, टीएमसी के गुंडों का चुन -चुन कर हिसाब होगा। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर बताती है कि ऑनलाइन कंटेंट के मामले में सरकार का ऑनलाइन कंटेंट ब्लॉक करने का आदेश एक साल में 24,000 हो गया है जो पहले के मुकाबले दूना है। सरकार का कहना है कि एआई और डीप फेक के कारण अर्जेन्ट ब्लॉक करने का अंतरिम उपाय बढ़ गया है। मेरा मानना है कि ऐसी पोस्ट हटवाना अगर इतना जरूरी है तो इस बात की भी व्यवस्था होनी चाहिए कि ऐसी पोस्ट हो ही नहीं। लेकिन इस दिशा में कुछ खास नहीं है और कम से कम ऐसी कोई खबर नहीं है। इससे लगता है कि सरकार अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल कर रही है और खबरें (पोस्ट) हटावाने पर खासा जोर है। यह सिर्फ सरकार के लिए नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस की ही एक खबर के अनुसार, हंसराज कॉलेज ने अपने 30 छात्रों को सोशल मीडिया पर कॉलेज को बदनाम करने के आरोप में निलंबित कर दिया है। मामला अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल का है लेकिन संसद में अपमानजनक भाषा के उपयोग पर कार्रवाई नहीं होने के उदाहरण हैं।  

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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