
संजय कुमार सिंह
अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, (सिर्फ 53 लाख की आबादी वाले) न्यूजीलैंड से मुक्त व्यापार करार और इससे रोजगार के अवसर बढ़ने का प्रचार। द हिन्दू ने इस करार की खबर को लीड तो बनाया ही है, ‘ऐतिहासिक’ भी लिखा है। दूसरी ओर, बंगाल में भाजपा का विज्ञापन एक करोड़ रोजगार की ‘संभावना’ जता रहा है लेकिन उसकी खबर या उससे संबंधित योजना का अता-पता ही नहीं है। एक निर्वाचित पूर्व मुख्यमंत्री को देश की न्याय व्यवस्था (असल में एक जज और एक मामले में) पर यकीन नहीं है लेकिन इस खबर को इस करार के बराबर प्रचार नहीं मिला है। हालांकि, आज यह खबर पहले पन्ने पर अरविन्द केजरीवाल के विरोध या सत्याग्रह के रूप में है। न्याय व्यवस्था पर उंगली या चिन्ता के रूप में नहीं है। हो भी कैसे, जब देश के प्रधानमंत्री सत्तारूढ़ दल के प्रधान प्रचारक बन गये हैं। लिहाजा देश का मीडिया, ‘राजा का बाजा’ बजाने वाला लग रहा है। देशबन्धु की लीड है, बंगाल में प्रचार थमा, मतदान कल है। दूसरे चरण में 1448 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। मुझे लगता है कि यह खबर है। नवोदय टाइम्स में सेकेंड लीड प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मन की बात’ है, बंगाल में भाजपा के शपथ ग्रहण में आउंगा। प्रधानमंत्री ने कहा है तो निश्चित रूप से खबर है लेकिन प्रधानमंत्री ने किसी प्रेस कांफ्रेंस में या किसी पत्रकार से कहा होता तो जरूर पूछा जाता कि बिहार में भाजपाई मुख्यमंत्री ने शपथ ली तो क्यों नहीं गए। प्रधानमंत्री इसीलिए प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते हैं और यह मन की बात के खबर हो जाने का दौर है। द टेलीग्राफ के अनुसार खबर यह है कि महिलाओं ने दीदी से कहा है कि उनके साथ है। दूसरी ओर, उनके प्रतिद्वंद्वी या देश की गिनी-चुनी महिला मुख्यमंत्रियों को उखाड़ फेकने में लगे महिला शक्ति वंदन करने वाले लोगों के प्रतिनिधि या उम्मीदवार सुवेन्दु अधिकारी ने अपने चुनाव प्रचार का समापन दुर्गा मंदिर में किया। इसके लिए जो कुछ कहा उसके जरिए ‘सनातनियों’ के लिए एक तरीका तय कर दिया है।इंडियन एक्सप्रेस की लीड बंगाल में चुनाव प्रचार खत्म होने की खबर है। अखबार ने लिखा है मोदी-ममता ने पश्चिम बंगाल के लिए अंतिम कोशिश की। जाहिर है, ममता बनर्जी का मुकाबला नरेन्द्र मोदी से है।

यह चुनावी खबर है और दो प्रमुख प्रतिनिधियों का हाल बता रही है लेकिन दि एशियन एज की लीड का शीर्षक वही है जो नवोदय टाइम्स में है। खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री ने कहा है कि वे मई में (बंगाल में) भाजपा की पहली सरकार के शपथग्रहण में कलकत्ता आएंगे। आपको यह सामान्य लग सकता है, प्रधानमंत्री ने कहा है तो खबर भी होगी लेकिन सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जिस ढंग से बंगाल में चुनाव प्रचार करते रहे हैं और चुनाव आयोग ने जो सब किया है उससे क्या प्रधानमंत्री (या भाजपा) की जीत तय हो गई है? प्रधानमंत्री को पता चल गया है? अगर नहीं तो उनका बोलना कितना सही है या गलत है? प्रधानमंत्री को पता नहीं है सिर्फ आश्वासन, भरोसा या उम्मीद के आधार पर कहा है तो उन्हें यह सब कहना चाहिए, ऐसा करना चाहिए? मुझे लगता है कि ऐसा कहा है तो खबर यही होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री ने ऐसा क्यों और कैसे कहा होगा और उनके कहे को कितनी गंभीरता से लेना चाहिए या क्यों नहीं लेना चाहिए। मेरी नजर में इसके दो कारण है। एक तो यह कि पश्चिम बंगाल जीतने की कोशिश में सरकार ने इस चुनाव को युद्ध जैसा बना दिया है और जब आरोप है कि चुनाव आयोग सरकार के नियंत्रण में है तो क्या आयोग ने सरकार (असल में प्रधानमंत्री) को ऐसा कोई आश्वासन दिया है और नहीं दिया तो मतगणना से पहले प्रधानमंत्री के ऐसे दावे का क्या मतलब है। खासकर तब जब अरविन्द केजरीवाल ने हाल में अदालत में आरोप लगाया (कहा) है कि देश के गृहमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि केजरीवाल को फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा। हाईकोर्ट के फैसले के बाद कोई सुप्रीम कोर्ट तभी जाता है जब वह हारता है। अरविन्द केजरीवाल कोर्ट में हार रहे हैं यह देश के गृहमंत्री को कैसे पता होगा और क्यों नहीं पता होगा जब उनके खिलाफ मामला सीबीआई का है, सीबीआई की ओर से देश के सॉलीसिटर जनरल पेश हो रहे हैं और वे संबंधित जज को उनके बच्चों के जरिए करोड़ों रुपए का काम दिलवा चुके हैं। केजरीवाल ने अदालत में यह भी कहा है कि ऐसा था तो सीबीआई को भी यह जानकारी पहले देनी चाहिए थी न कि पत्रकारों के खुलासे के लिए छोड़ देना चाहिए था।

इस तरह अदालत में अगर अरविन्द केजरीवाल को लग रहा है कि उनके साथ न्याय नहीं होगा तो बंगाल के चुनाव मैदान में निष्पक्ष चुनाव होता मुझे तो नहीं दिख रहा है। जाहिर है, मीडिया को भी ऐसा दिखना चाहिए। नहीं दिख रहा है या दिखने पर भी मुद्दा नहीं है तो जाहिर है कि देश में सब कुछ ठीक नहीं है। ना चुनाव निष्पक्ष हो रहे हैं और ना अदालत में फैसले निष्पक्ष होने का भरोसा है। फिर भी खबर ऐसे छपी है जैसे सरकार का प्रचार किया जा रहा हो। आज इस खबर को प्राथमिकता नहीं मिली है कि बंगाल में चुनाव के लिए मोटर साइकिल की सवारी प्रतिबंधित किए जाने के बाद चाय की दुकान को भी बंद रखने या सामान्य ढंग से काम करने से रोक दिया गया है। सोशल मीडिया पर तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने एक व्हाट्सऐप्प फॉर्वार्ड साझा किया है जो एक ऐसे चाय वाले का है जिसकी दुकान मतदान केंद्र से 100 मीटर की दूरी के अंदर है। चुनाव के लिए धारा 144 लागू रहेगी इसलिए चाय की दुकान सामान्य ढंग से काम नहीं करेगी और दुकान वाले ने अपने ग्राहकों को इसकी पूर्व सूचना दी है। मैंने पहले कभी ऐसा बंगाल में या किसी और राज्य में होता नहीं सुना है। पता नहीं, इस बार इस संदेश की जानकारी व्हाट्सऐप्प की लोकप्रियता बढ़ने के कारण है या फिर यह इस बार बंगाल में चुनाव को युद्ध बना दिए जाने के कारण है। देश के पांच राज्यों में चुनाव और नतीजों के इंतजार के इस माहौल में सरकार को प्रशंसा की जरूरत है और सरकारी कार्यों की प्रशंसा करते रहने वाले मेरे अखबारों में से एक, अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, न्यूजीलैंड से मुक्त व्यापार समझौता, 100 फीसदी भारतीय निर्यात पर कोई शुल्क नहीं। खबर में कहा गया है कि इससे लघु उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा …. निवेश और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। एआई से पता चला कि न्यूजीलैंड की आबादी 5,346,940 यानी 53.5 लाख है। इतनी आबादी के लिए निर्यात करार से भारत में निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
दूसरी ओर, भाजपा के विज्ञापन में दावा किया गया है, कल भय और भरोसा के बीच चुनाव है। भाजपा का मतलब है भरोसा और इस भरोसे के तहत जो दावे किए गए हैं उनमें एक है, एक करोड़ नई नौकरी और स्वरोजगार के मौके। यानी 53 लाख की आबादी वाले देश से मुक्त व्यापार समझौते की खबर तो लीड है लेकिन बंगाल में एक करोड़ नौकरियां और रोजगार के मौके बनने से जो बाजार बनेगा उसे जरूरत की चीजें कहां से मिलेंगी न तो उसकी चिन्ता है ना इस बड़े बाजार के तैयार होने की खबर या उसका प्रचार। भाजपा के इस विज्ञापन को खबर नहीं मानने का कारण जो हो, मुझे तो लगता है कि यह विज्ञापन भी खबर है और ऐसे कई विज्ञापन छपे हैं और इनकी चर्चा अमर उजाला ने इतनी प्रमुखता से नहीं की। तमाम विज्ञापनों में भाजपा ने भय और भरोसे की बात की है और दावा कर रही है कि बंगाल में व्याप्त भय को हटाकर भरोसा कायम करेगी। लेकिन चुनाव में बख्तबंद गाड़ियां चलें और सुरक्षा बलों की भयानक उपस्थिति हो, इसके बावजूद भाजपा के उम्मीदवार को ही दौड़ा लिया जा रहा है, तृणमूल की सासंद को पीटा जा सका है तो भरोसा स्थापित कैसे होगा? या भाजपा शासित राज्यों में भय नहीं है। कम से कम बंगाल के मुसलमानों में तो भय नहीं है। एक वायरल वीडियो कुछ मुस्लिम नागरिकों ने विकास और महंगाई (जैसे गैस सिलेंडर की कीमतें) को चुनावी मुद्दा बनाते हुए ऐसी बात कहा है, हिन्दुओं को सस्ती गैस दिला दें हम भाजपा को वोट देंगे। हमें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। इससे आप समझ सकते हैं कि किसपर कितना भरोसा है और 53 लाख की आबादी वाले देश से व्यापार करार की खबर लीड है और एक करोड़ लोगों को रोजगार का आश्वासन खबर नहीं है तो आप समझ सकते हैं कि देश में चल क्या रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड आम आदमी पार्टी के सात बागी सांसदों के भाजपा में विलय को सभापति की मंजूरी मिलना है। कल मैंने बताया था कि दल बदल कानून को और सख्त बनाने की मांग करने वाला राघव चड्ढा का निजी विधेयक अटका हुआ है और इसकी खबर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में थी। जनसत्ता समेत दूसरे अखबारों ने एक्सप्रेस के बाद खबर की थी।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


