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आज के अखबार : अकले टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक्जिट पोल के नतीजों की खबर ली और दी है

आम नागरिक की हालत और प्रधानमंत्री की सेवा दोनों साथ-साथ। हेडलाइन मैनेजमेंट प्रधानमंत्री का, कमाल अमर उजाला का। यह कमाल कल का है। कल मैं यह कॉलम नहीं लिख पाया था।

संजय कुमार सिंह

देश में चुनाव ही नहीं एक्जिट पोल का हाल भी बुरा है। सोशल मीडिया पर जब पिछले चुनावों के एक्जिट पोल के गलत साबित होने की चर्चा आम है तब आज ज्यादातर अखबारों ने एक्जिट पोल के नतीजों या चुनावी हाल को लीड बनाया है। मेरे नौ अखबारों में चुनावी हाल का सबसे अच्छा विवरण कलोकाता के अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ में है (जो होना ही था) तो ज्यादातर ने भाजपा को जीतता बताया है। अकेले टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक्जिट पोल की खबर ली है और बताया है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के मामले में एक्जिट पोल के नतीजे अलग है पर असम भाजपा को और केरल कांग्रेस को दे रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह चुनाव प्रचार के दौरान ही स्पष्ट हो गया था और असम का मामला पवन खेड़ा की प्रेस कांफ्रेंस (और उसमें लगाए गए आरोपों के कारण) उलझ सा गया है। मतदान के बाद पवन खेड़ा को सामान्य तौर पर जमानत मिल जाती तो बात अलग होती। इसके बावजूद असम बंगाल को ही बताने का मतलब है भाजपा के मन की बात करना। अखबार की अपनी नौकरी के दौरान और उसके बाद भी एक्जिट पोल से संबंधित जानकारियों ने इसकी विश्वसनीयता खत्म कर दी थी। अब जब अखबारों के हेडलाइन ही मैनेज किए जा रहे हैं तो इसकी कोई विश्वसनीयता नहीं है। वैसे भी, गलत भविष्यणाणी करने वाले अक्सर गलत ही होते हैं और सही होना अटकल ही है। वैसे भी, एक्जिट पोल जब कल टेलीविजन पर दिखा दिया गया, सोशल मीडिया पर पढ़ लिया गया, इसकी विश्वनीयता संदिग्ध है और नतीजा जो आएगा उसे ही माना जाएगा तो इसे लीड बनाना वैसे भी बेमतलब है लेकिन मतलब या काम की बात अब होती कहा हैं। मेरे लिए कोई मजबूरी नहीं है कि फालतू बात ही करूं।

मुझे लगता है कि कल इंदिरापुरम के अपार्टमेंट में आग लगने की घटना पर चर्चा होती तो जनहित में कुछ काम होता, समाज के बारे में जानकारी मिलती। ठीक है कि इस हादसे में किसी की जान नहीं गई, कोई गंभीर रूप से हताहत नहीं हुआ लेकिन हादसा बहुत बड़ा और गंभीर था, व्यवस्था औऱ सिस्टम का भी सवाल है पर मीडिया में उसकी चर्चा न हो और हादसों में मरने वालों की संख्या ही बताई जाए तो इसका कोई उपयोग नहीं है। मीडिया को और सिस्टम को भी हादसे रोकने की दशा में कार्रवाई करनी चाहिए। आम लोगों में जागरूकता फैलाना भी मीडिया का ही काम है। जहां तक मुझे याद है बहुमंजिली इमारतों में आग लगती है तो एक-दो फ्लैट ही चपेट में आते हैं और आग नियंत्रित कर ली जाती है। इसलिए, शुरू में तो मैं निश्चिंत था लेकिन आग की भयावहता परेशान करने वाली थी। मैंने जो खबरें पढ़ी और वीडियो देखे उनसे लगता है कि एक निर्माणाधीन फ्लैट से आग शुरू हुई और एक घर में चार लोग फंस गए थे। कुछेक फ्लैट बंद भी थे। आग लगने पर सब लोग अपनी जान बचाकर भागे और जो लोग फ्लैट में फंस थे उनकी परवाह पड़ोसियों ने नहीं, दमकल वालों ने की और उन्हीं लोगों ने इन्हें तथा ऑक्सीजन पर निर्भर मरीजों को सुरक्षित निकाला। चर्चा यह होती रही कि दमकल कर्मियों के पास ऊंची मंजिल में पानी बुझाने के उपकरण नहीं थे। बाद में पड़ोस के फ्लैट से पानी डालकर आग रोकने की कोशिशें देखी गईं लेकिन ऐसा करने वालों में जानकार होने के लक्षण नहीं दिखे। उनकी सहायता के लिए कोई पेशेवर भी नहीं था। मुझे लगता है कि इन्हीं कारणों से सात फ्लैट जल गए। पत्रकार मित्र अजीत अंजुम ने अपने वीडियो के जरिए बताया है कि उसने अपना घर अपनी मेहनत और सूझबूझ से बचा लिया। परिचितों, मित्रों का साथ भी मिला लेकिन अजीत की आलोचना करने वालों की कमी नहीं है। इतनी है कि अजीत को एक वीडियो बनाकर सफाई देनी पड़ी और यह समाज की हालत है। आलोचना उनकी नहीं हुई जो घर में बंद लोगों को छोड़कर भाग गए और उसकी हो रही थी जो मदद मांगने के लिए मित्रों से गुहार लगा रहा था और खुद भी जान जोखिम में डालकर प्रयास करता दिख रहा था। हालांकि, बाद में उसने कहा कि वह खतरे में नहीं था या जोखिम नहीं ली थी। अपने घर को या पड़ोस के टावर को भी आग से बचाने के प्रयास किए।

आज इस खबर को अखबारों में उतनी प्रमुखता नहीं मिली है जितनी मिलनी चाहिए थी। अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है क्योंकि भरपूर विज्ञापन है और पहले पन्ने की लीड एक्जिट पोल ही है। दूसरे पहले पन्ने पर आग की खबर है। नवोदय टाइम्स में आग की खबर या फोटो पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन गंगटोक में प्रधानमंत्री के फुटबॉल खेलने की खबर फोटो के साथ पहले पन्ने पर है। हिन्दुस्तान टाइम्स में आग लगने की खबर पहले पन्ने पर तीन कॉलम की फोटो के साथ है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह दो कॉलम में है। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर छपी एक खबर से पता चलता है कि आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में शामिल होने और इसे मंजूरी मिल जाने के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री, भगवंत मान को राष्ट्रपति से मिलने के लिए 5 मई को समय मिला है। बंगाल चुनाव में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की व्यस्तता देखते हुए राष्ट्रपति से मिलने का समय इतनी देर से मिलने का कारण यह भी हो सकता है कि वे भी व्यस्त हों पर खबर तो यह है ही और मुझे लगता है कि खबर में यह भी बताया जाना चाहिए था कि एक मुख्यमंत्री को राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगने और मिलने में कितना समय लगा। द हिन्दू में एक और दिलचस्प खबर है। इसके अनुसार शिक्षाविद सुपर्णा दिवाकर ने सुप्रीम कोर्ट में दायर शपथपत्र में कहा है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार अध्याय की समीक्षा हुई थी। आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे हटाने का आदेश दिया है। दूसरी ओर, हाईकोर्ट के जज के बच्चों को सीबीआई के जरिए काम और पैसे दिए जाने और अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ उनके फैसलों से संबंधित आरोपों की जांच की कोई खबर नहीं है। पहली नजर में यह भ्रष्टाचार का मामला तो लगता ही है। देशबन्धु में प्रकाशित खबर के अनुसार, केंद्र सरकार ने बंगाल में अंतिम चरण के मतदान के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है और सोशल मीडिया पर इससे संबंधित आदेश फर्जी है फिर भी वायरल हो रहा है। यह दिलचस्प है कि सरकारी की सख्ती के बावजूद ऐसे फर्जी पत्र जारी किए जाते हैं। दि एशियन एज ने तीन कॉलम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दावा प्रकाशित किया है। इसके अनुसार, समाजवादी पार्टी महिला विरोधी, उत्तर प्रदेश विरोधी ताकतों से तालमेल करती है। यह दिलचस्प है कि अमर उजाला में कल ही यह खबर लीड थी। दि एशियन एज में आज छपने का मतलब है, सरकारी प्रचार को महत्व देना। वैसे भी, प्रधानसेवक जी चुनाव और मतदान के लिहाज से हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए बयान देने और दौरे करने से नहीं चूकते हैं। बंगाल में कल मतदान के दिन छपने के लिए यह बयान था तो टेलीविजन की खबरों के लिए बनारस में मंदिर का दौरा, 17 किलोमीटर लंबा रोड शो और गंगा एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन था। आज अखबारों में यह सब तो छपा है, तृणमूल सांसद डेरिक ओ ब्रायन की चुनौती नहीं है जो उन्होंने ‘नरेन्द्र’ को दी है और पूछा है, है हिम्मत। मुझे लगता है कि आज डेरिक ओ ब्रायन की चुनौती होती न होती, प्रधानमंत्री या भाजपा ने इसके जवाब में कुछ नहीं किया या यह प्रचारित किया गया कि तृणमूल पार्टी वालों ने ईवीएम में भाजपा के बटन पर टेप लगा दिया था। पर वह भी पहले पन्ने पर तो नहीं दिखा।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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