भारत में पत्रकारिता जगत में प्रतिष्ठित स्थान रखने वाले मुंबई प्रेस क्लब ने अपने तीन सदस्यों गुरबिर सिंह, बर्नाड डिमेलो और श्रीकांत मोडक को निष्कासित कर दिया है। इन तीनों ने भीमा कोरेगाँव मामले के आरोपियों को क्लब की छत पर एकत्र किया। उनमें से कुछ आरोपी सर्वोच्च न्यायालय और एनआईए न्यायालय द्वारा निर्धारित जमानत शर्तों से बंधे थे, जिनके अनुसार जमानत पर रहते हुए सह-आरोपियों से मिलने की स्पष्ट मनाही थी। औपचारिक जाँच के बाद तीनों दोषी पाए गए और प्रबंध समिति ने दो-तिहाई से अधिक मतों से निष्कासन का प्रस्ताव पारित किया।
१९ जनवरी २०२६ की शाम
उस शाम मुंबई प्रेस क्लब की छत पर इन तीनों ने एक पार्टी का आयोजन किया था। शाम सात बजे से रात ग्यारह बजे तक चली इस बैठक में भीमा कोरेगाँव मामले के आरोपी — वरवरा राव, वर्नन गोन्साल्विस, अरुण फरेरा, गौतम नवलखा, आनंद तेलतुंबडे, हैनी बाबू, रोना विल्सन और सुधीर ढवाले उपस्थित थे। बाद की जाँच में सामने आया कि यह महज एक सामान्य पार्टी नहीं, बल्कि एक संवेदनशील न्यायिक मामले से जुड़े व्यक्तियों की सुनियोजित बैठक थी।
क्लब के सेक्रेटरी को दो शिकायतें प्राप्त हुईं। पहली शिकायत विस्तृत और दस्तावेजी साक्ष्यों से पुष्ट थी, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि बैठक में उपस्थित कुछ व्यक्ति विशेष जमानत शर्तों से बंधे थे। शिकायतकर्ता के सवाल सीधे थे ऐसी बैठक क्लब परिसर में कैसे हुई, जिम्मेदार कौन है और क्लब प्रशासन क्या रुख अपनाएगा? क्लब के चेयरमैन और सेक्रेटरी ने इसकी गंभीरता समझी और तुरंत कारवाई शुरू की।
कारण बताओ नोटिस और उसके बाद के घटनाक्रम
गुरबिर सिंह को तत्काल कारण बताओ नोटिस जारी की गई। परंतु उन्होंने संस्थागत शिष्टाचार का पालन करने की बजाय वह नोटिस सोशल मीडिया पर डाल दी और वास्तविकता से परे जानकारी फैलाना शुरू कर दिया। उसी दौरान दो ऑनलाइन पोर्टल्स ने यह झूठी खबर प्रकाशित की कि क्लब ने आनंद तेलतुंबडे और अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाया है। जाँच पूरी न होने के कारण क्लब ने सार्वजनिक बयान देने से परहेज किया।
उल्लेखनीय है कि सिंह ने अपने अभियान में बार-बार तेलतुंबडे और नवलखा के नाम आगे किए, जबकि इन दोनों की जमानत शर्तों में सह-आरोपियों से मिलने पर कोई रोक नहीं है। इन नामों को उछालकर उन्होंने लोगों का ध्यान उन व्यक्तियों से हटाया जो वास्तव में जमानत शर्तों के उल्लंघन के आरोपी थे। यह कोई संयोग नहीं था।
कुछ दिनों बाद डिमेलो और मोडक ने पत्र लिखकर स्वीकार किया कि बैठक उन्होंने ही आयोजित की थी। सिंह ने हालाँकि विस्तृत लिखित जवाब में मामले से अपना संबंध नकारा और एक अजीब तर्क दिया जमानत शर्तें उन पर नहीं हैं, इसलिए उनका पालन करने की जिम्मेदारी उन्हीं की है जिन पर वे लागू हैं। उन व्यक्तियों को एकत्र करने में अपनी सक्रिय भूमिका को उन्होंने सुविधाजनक रूप से नजरअंदाज कर दिया।
जाँच समिति के निष्कर्ष
प्रबंध समिति ने चेयरमैन राजेश मस्करेन्हास, सेक्रेटरी मयुरेश गणपत्ये और ट्रेजरर सौरभ शर्मा की तीन सदस्यीय जाँच समिति गठित की। सीसीटीवी फुटेज में गुरबिर सिंह दूसरों से पहले छत पर आते, वेटर्स को मेज ‘C’ आकार में लगाने का निर्देश देते और हर मेहमान का स्वागत करते हुए दिखे। बिलिंग रिकॉर्ड के अनुसार बारह हजार पाँच सौ रुपए का बिल खाना, पेय और पार्टी चार्जेज सहित सिंह ने स्वयं चुकाया। एंट्री रजिस्टर से स्पष्ट हुआ कि हैनी बाबू, रोना विल्सन और अरुण फरेरा सिंह के मेहमान के रूप में दर्ज होकर क्लब में आए थे। बैठक किसने बुलाई, किसके लिए और किसने खर्च उठाया तीनों सवालों के जवाब एक ही नाम की ओर इशारा करते थे।
जाँच के दौरान बाहरी दबाव के प्रयास भी हुए। आनंद तेलतुंबडे और गौतम नवलखा ने जाँच लंबित रहते हुए ही सेक्रेटरी को पत्र लिखकर अनुशासनात्मक कारवाई न करने की सलाह दी। एक रिक्विजिशन भी तैयार किया गया जिसमें कारवाई को गैरकानूनी बताया गया और सदस्यों को पूरी जानकारी दिए बिना हस्ताक्षर करवाए गए। समिति ने इन सभी दबावों को दरकिनार करते हुए साक्ष्यों के आधार पर अपना काम पूरा किया।
प्रबंध समिति का निर्णय और क्लब का पक्ष
२७ अप्रैल २०२६ की बैठक में सदस्य अनुराग कांबले ने महत्वपूर्ण बात रखी जिन व्यक्तियों ने क्लब को ‘अर्बन नक्सल अड्डा’ कहलवाने में योगदान दिया, उन्हीं ने क्लब परिसर में आरोपियों के लिए यह बैठक आयोजित की। उन्होंने छह वर्षों के निष्कासन का प्रस्ताव रखा, शशांक पराडे ने अनुमोदन किया और दो-तिहाई से अधिक सदस्यों ने उसे पारित किया।
क्लब प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि तेलतुंबडे, नवलखा या किसी अन्य पर कोई प्रतिबंध नहीं है। किंतु संस्था की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाले आचरण की और न्यायालय के आदेशों के उल्लंघन से जुड़े मामलों की जाँच और कारवाई करना क्लब का दायित्व है। पत्रकारिता से जुड़ी संस्थाएँ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की आधारशिला होती हैं और यदि ये संस्थाएँ ही न्यायिक मामलों में लापरवाही बरतें तो यह लोकतंत्र के लिए घातक होगा। मुंबई प्रेस क्लब पत्रकारिता की स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्ध है और उसी निष्ठा के साथ इस बात के लिए भी प्रतिबद्ध है कि उसके परिसर का उपयोग कानून के शासन को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं होने दिया जाएगा।


