कन्हैया शुक्ला-
भ्रष्टाचारी इतने संगठित और बेख़ौफ़ हैं कि उन्हें किसी का डर नहीं। न भगवान का, न मुख्यमंत्री का, न पुलिस का और न अपने उच्चाधिकारियों का। ग्रेटर नोएडा वेस्ट के आम्रपाली लेजर पार्क सोसाइटी के बाहर छोटे दुकानदार से कल उगाही करने आए दो युवकों को रेजिडेंट्स ने पकड़कर पुलिस के हवाले किया। आज पता चला कि अथॉरिटी के बुलडोजर ने उसी दुकानदार को, भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत करने का दंड देते हुए, उसके खोखे/गुमटी को रौंद दिया। इस दौरान बाकी दुकानदार दहशत के मारे अपनी-अपनी दुकानें बंद कर भाग गए।
इस बारे में जब बिसरख थाने से पता किया गया कि कल अवैध उगाही करते धरे गए दो लोगों का क्या हुआ, तो मालूम चला कि उन्हें छोड़ दिया गया, क्योंकि अथॉरिटी के जेई ने लिखकर दे दिया कि ये दोनों उनके ही आदमी हैं और सही वसूली कर रहे थे।
ऐसे में सवाल है कि अगर वे सही आदमी थे तो उनका आई कार्ड एक्सपायर क्यों था। वे पैसे लेकर जो स्लिप दुकानदारों को दे रहे थे, उसमें नोएडा अथॉरिटी का कोई एक भी चिन्ह क्यों नहीं था। वह एक साधारण भुगतान पर्ची थी, जो पीओएस मशीन से भुगतान के बाद दी जाती है।


क्या यह पैसा अथॉरिटी के पास जाने की बजाय किसी प्राइवेट अकाउंट में जाता है, जहां से ऊंचे-ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के बीच धन का बंदरबांट होता है। सोचिए, एक छोटे से गुटखा, सिगरेट, चाय वाली दुकान से ये 2360 रुपये महीने वसूलते हैं, तो ऐसे लाखों खोखों/गुमटियों से ये कितने अरब रुपये वसूल लेते होंगे। यहां उस स्लिप का स्क्रीनशॉट लगाया जा रहा है, जिसे एक दुकानदार को भुगतान के बाद दिया गया है। ऐसे में कैसे माना जाए कि यह पर्ची अथॉरिटी वालों ने काटी है।
संदिग्ध किस्म के प्राइवेट लोगों के जरिए रेहड़ी-पटरी और सड़क किनारे दुकानदारों से बिना उचित पर्ची के वसूली भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आएगी, तो इसे क्या कहा जाएगा।
इस प्रकरण पर आरटीआई लगाने की ज़रूरत है। नोएडा अथॉरिटी के इस महा भ्रष्टाचार की पोल खोलने की ज़रूरत है। आज इन बेईमानों ने अपनी बेईमानी का आतंक निर्बाध बनाए रखने के लिए एक गरीब की दुकान को बुलडोजर से रौंद दिया। नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन/ सीईओ को ज़रूर श्राप लगेगा। भगवान की लाठी देर से पड़ती है, अक्सर रिटायरमेंट के बाद पड़ती है, लेकिन पड़ती ज़रूर है। जो भी सीईओ है, वह अगर अंधा-बहरा नहीं है, तो गरीब की दुकान को बुलडोज़ किए जाने का उचित मुआवजा दे। आखिर उस गरीब ने उगाही करने आए प्राइवेट लोगों से नोएडा अथॉरिटी का आई कार्ड मांग लिया, तो क्या गुनाह कर दिया। यह सच में जंगल राज है, जहां वसूली करने वालों से आई कार्ड दिखाने को कहने पर दुकान ही बुलडोज़ कर दी जाती है।
हिंदू युवा वाहिनी के मीडिया प्रभारी वरुण उपाध्याय कहते हैं- “ये मामला भ्रष्टाचार का एक अति गंभीर प्रकरण लगता है जिसे शीघ्र ही उचित मंचों व माध्यमों से उठाया जाएगा और उचित पारदर्शी नीति बनाने की मांग की जाएगी ताकि गरीब दुकानदारों का अहित न हो!”
वसूली, बुलडोजर और जवाबदेही का संकट
ग्रेटर नोएडा वेस्ट के आम्रपाली लेजर पार्क के बाहर सामने आया प्रकरण सिर्फ दो लोगों द्वारा की गई कथित उगाही का मामला नहीं है, यह स्थानीय शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता और जवाबदेही पर गहरे सवाल खड़ा करता है। जब आम नागरिक और छोटे दुकानदार अपनी रोजी-रोटी बचाने के लिए पहचान पत्र मांगते हैं और उसके जवाब में उन्हें धौंस, अस्पष्ट रसीदें और अंततः बुलडोजर का सामना करना पड़ता है, तो यह संकेत है कि व्यवस्था कहीं न कहीं नागरिकों के मूल अधिकारों से दूर जा चुकी है।
इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन लोगों को संदिग्ध परिस्थितियों में पकड़ा गया, उन्हें कथित तौर पर एक अधिकारी के लिखित आश्वासन पर छोड़ दिया गया। यदि वसूली वैध थी तो पहचान पत्र एक्सपायर क्यों था, पद और कार्य में असंगति क्यों थी, और रसीद पर अथॉरिटी का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं था। ऐसे बुनियादी सवालों के संतोषजनक जवाब के बिना किसी भी कार्रवाई को वैध ठहराना प्रशासनिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
इससे भी अधिक गंभीर आरोप यह है कि शिकायत करने वाले दुकानदार की गुमटी को बुलडोजर से हटा दिया गया। यदि यह कार्रवाई नियमित अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया का हिस्सा थी, तो क्या उसका समय और चयन संयोग मात्र था, या फिर यह संदेश देने की कोशिश कि व्यवस्था को चुनौती देने की कीमत चुकानी पड़ती है। किसी भी लोकतांत्रिक ढांचे में ऐसी धारणा का बनना खतरनाक है, क्योंकि इससे नागरिकों का भरोसा संस्थाओं से उठने लगता है।
रेहड़ी-पटरी और छोटे दुकानदार शहरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। इनके साथ होने वाली किसी भी कार्रवाई में स्पष्ट नियम, लिखित आदेश, पारदर्शी प्रक्रिया और अपील का अवसर होना चाहिए। यदि वसूली की कोई वैध व्यवस्था है, तो उसके नियम सार्वजनिक होने चाहिए, अधिकृत कर्मियों की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए और भुगतान का हर लेनदेन प्रमाणिक और ट्रैसेबल होना चाहिए। इसके विपरीत, अगर प्राइवेट व्यक्तियों के जरिए वसूली हो रही है और उसकी वैधता संदिग्ध है, तो यह सीधे-सीधे भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।
यह समय है कि संबंधित प्राधिकरण इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए, तथ्यों को सार्वजनिक करे और दोषियों की जिम्मेदारी तय करे। साथ ही, जिस दुकानदार की आजीविका प्रभावित हुई है, उसे उचित राहत और मुआवजा दिया जाए। कानून का शासन तभी अर्थपूर्ण होता है जब वह सबसे कमजोर नागरिक को भी सुरक्षा और न्याय का भरोसा दे सके। यदि यह भरोसा डगमगाता है, तो किसी भी व्यवस्था की नींव कमजोर पड़ जाती है।
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