प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोगों से एक साल तक “सोना नहीं खरीदने” की अपील के बाद अब इस बयान के पीछे की आर्थिक वजहों पर चर्चा तेज हो गई है। सरकार की ओर से इसे विदेशी मुद्रा बचाने और बढ़ते आयात बिल को नियंत्रित करने की कोशिश बताया जा रहा है, लेकिन सोशल मीडिया और आर्थिक हलकों में इसे देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति और बढ़ती सरकारी देनदारियों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गोल्ड इंपोर्टर है और देश में इस्तेमाल होने वाला ज्यादातर सोना विदेशों से खरीदा जाता है। हाल के महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, रुपये की कमजोरी और पश्चिम एशिया संकट के कारण भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 72 अरब डॉलर का सोना आयात किया, जो कुल आयात बिल का बड़ा हिस्सा है।
इसी बीच सोवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) योजना से जुड़ी सरकारी देनदारियों के आंकड़े भी चर्चा में आ गए हैं। वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 में SGB से जुड़ी सरकारी देनदारी करीब 6,664 करोड़ रुपये थी, जो 2023-24 तक बढ़कर लगभग 68,598 करोड़ रुपये हो गई। यानी सात साल में करीब 930 प्रतिशत की बढ़ोतरी।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि सोने की कीमतों में तेज बढ़ोतरी और रुपये की गिरावट के कारण सरकार पर भविष्य में भुगतान का बोझ लगातार बढ़ रहा है। SGB योजना में निवेशकों को सोने की कीमत बढ़ने का फायदा और 2.5 प्रतिशत सालाना ब्याज भी मिलता है। ऐसे में यदि सोने के दाम लगातार ऊपर जाते हैं तो सरकार की देनदारी भी बढ़ती जाती है।
प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद बाजार में भी इसका असर दिखाई दिया। कई ज्वेलरी कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई और निवेशकों ने इसे सरकार की आर्थिक चिंता का संकेत माना।
हालांकि सरकार समर्थक अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह अपील किसी प्रतिबंध की तरह नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा बचाने की एक आर्थिक सलाह है। उनका तर्क है कि यदि गोल्ड इंपोर्ट कम होगा तो डॉलर की मांग घटेगी और रुपये पर दबाव कम होगा।
वहीं आलोचकों का कहना है कि आम जनता से सोना, पेट्रोल और विदेश यात्रा कम करने की अपील करना इस बात का संकेत है कि सरकार आर्थिक दबाव महसूस कर रही है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल उठाया कि यदि अर्थव्यवस्था मजबूत है तो जनता से बार-बार “त्याग” की अपील क्यों की जा रही है।
ज्वेलरी उद्योग से जुड़े संगठनों ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि भारत में सोना सिर्फ निवेश नहीं बल्कि शादी, परंपरा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा विषय है। ऐसे में लोगों का गोल्ड खरीदना अचानक रुकना मुश्किल है।
सोना कितना सोना है…
प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की है. क्या है वजह, आंकड़ों से समझिए:
अभी हमारा कुल विदेशी मुद्रा भंडार है करीब 690.69 अरब डॉलर, लगभग ₹64 लाख करोड़ रुपये.
2025-26 में लगभग 71.98 अरब डॉलर, करीब 6.4 लाख करोड़ रुपए, का सोना आयात किया गया. सालाना देश में करीब 700 से 800 टन सोना import होता है.
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोने की कीमत 2025 में करीब 60 फीसदी तक उछली, अभी एक किलो सोने की कीमत है करीब 1.52 लाख डॉलर.
भारत में ज्यादातर सोना Switzerland और UAE से आता है.
सोने के बदले हमें डॉलर में भुगतान करना पड़ता है.
सीधी बात है, अगर Gold का आयात घटेगा, तो देश का आयात बिल कम होगा. इससे चालू खाते का दबाव घटेगा, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा और रूपया तेजी से नीचे नहीं जाएगा.
हालांकि रुपये की कीमत सिर्फ सोने से नहीं, बल्कि तेल की कीमत, विदेशी निवेश, exports और दुनिया के हालात से भी तय होती है. -दिबांग, वरिष्ठ पत्रकार

सोना मत ख़रीदो…दरअसल हिसाब गड़बड़ है।
और इस बार कहानी सिर्फ़ सोने की नहीं है। कहानी उस उधार की है… जिसका ब्याज़ अमीर कमाएँगे, और किश्तें तुम भरोगे।
2015 में एक योजना आई Sovereign Gold Bond
महामानव ने कहा ,“मित्रों, तुम सोना मत खरीदो, हमें पैसे दे दो। हम तुम्हारे नाम का सोना मान लेंगे। ऊपर से ढाई प्रतिशत ब्याज़ भी देंगे।”
वाह।
मतलब जनता का पैसा सरकार के पास…और जोखिम?
वो बाद में देखा जाएगा।
अब ज़रा हिसाब सुनिए।
2017 में सरकार पर SGB की देनदारी थी लगभग 6,664 करोड़।
फिर सोने के दाम बढ़ते गए, रुपया गिरता गया, डॉलर महंगा होता गया।और 2023-24 आते आते वही देनदारी पहुँच गई 68,598 करोड़ पर।
930% की छलांग।
सिर्फ़ सात साल में।
ब्रिटिश साम्राज्य इतने तेज़ नहीं फूला, जितनी तेज़ यह देनदारी फूली है।और अब कुल अनुमानित बोझ?लगभग डेढ़ लाख करोड़।
हाँ… वही डेढ़ जिसके पीछे इतनी शून्य लगती हैं कि आम आदमी की पूरी ज़िंदगी कैलकुलेटर बन जाए।
अब पूरा खेल समझिए।
जिसने चार किलो सोना बॉन्ड में खरीदा था…उसका क्या गया?
सोना महंगा हुआ फायदा उसका।ऊपर से 2.5% ब्याज़ अलग।
मतलब शादी भी उसकी… बैंड भी उसका… और बिल कौन भर रहा है? हम आप।
क्योंकि सरकार पैसा पेड़ से नहीं तोड़ती।
सरकार जब ये क़र्ज़ चुकाती है तो,GST से चुकाती है।
पेट्रोल से चुकाती है।
टोल से चुकाती है।
सिलेंडर से चुकाती है।
तुम्हारी सैलरी से चुकाती है।
तुम्हारी चुप्पी से चुकाती है।
कहानी का सबसे ख़तरनाक हिस्सा क्या है जानते हो?
सरकार ने जनता से पैसा लिया सोने के नाम पर…
लेकिन उतना फिजिकल सोना खरीदा ही नहीं गया जितना बॉन्ड बेचे गए।
अब सोना आसमान छू रहा है।
मतलब जिसने उधार लिया था, उसे अब बाज़ार भाव पर लौटाना पड़ेगा।और बाज़ार भाव तय कौन करता है? नोएडा का टॉमी मीडिया नहीं… डॉलर करता है।
यानी एक तरफ़ रुपया कमज़ोर।दूसरी तरफ़ सोना महंगा।तीसरी तरफ़ ब्याज़ अलग।
इसे अर्थशास्त्र में liability कहते हैं।गाँव में इसे कहते हैं “उधार लेकर शादी करना और बाद में खेत बिकना।”
मुझे हँसी तब आती है जब टीवी पर वही लोग कहते हैं, “देश आत्मनिर्भर बन रहा है।”
कौन सा आत्मनिर्भर?
जो देश अपना तेल डॉलर में खरीदता है…सोना डॉलर में खरीदता है…और फिर जनता को रुपये में राष्ट्रवाद बेचता है?
सबसे मज़ेदार बात देखिए।
जब सोना खरीदना था तब कहा गया, “देशहित में डिजिटल गोल्ड लो।”
अब जब लौटाने की बारी आई है तो देशहित अचानक जनहित बन जाएगा।
फिर टैक्स बढ़ेंगे। फिर कोई नई सेस आएगी।
फिर कहा जाएगा, “देश कठिन दौर से गुजर रहा है।”
देश नहीं गुजर रहा महामानव केअंधभक्तों…देश को गुज़ारा जा रहा है।
राजाओं ने युद्ध हारकर खजाने गिरवी रखे थे।
आज लोकतंत्र में वोट जीतने के लिए भविष्य गिरवी रखा जा रहा है।
पहले जनता तलवार देखकर डरती थी, अब EMI देखकर डरती है।
और अंत में सबसे बड़ा सवाल…अगर यह योजना इतनी महान थी तो सोना मत खरीदो की अपील बार-बार क्यों करनी पड़ रही है?
क्योंकि असली डर यह नहीं कि जनता सोना खरीद लेगी। असली डर यह है कि जनता हिसाब समझ गई तो क्या होगा।
याद रखिए… सरकारें कभी अपना पैसा नहीं लगातीं, वे सिर्फ़ जनता के भविष्य पर मुहर लगाती है।
उधार उसने लिया।जोखिम अमीर ने कमाया। और किश्तें हम तुम भरने वाले हैं।
फिर भी अगर तुम्हें लगता है कि राजनीति सिर्फ़ टीवी डिबेट है…
तो अगली बार पेट्रोल भरवाते समय मीटर ज़रूर देखना।
कई बार देश का सबसे बड़ा आर्थिक भाषण पंप मशीन चुपचाप दे रही होती है। -विजय


