संजय कुमार सिंह-
आज के अखबारों की लीड – केरल का मुख्यमंत्री तय होने, सतीशन के मुख्यमंत्री चुने जाने, टकराव और सस्पेंस खत्म होने (टीओआई, एचटी) जैसी सामान्य या राजनीतिक खबर है। यह अंग्रेजी के दो बताए गए अखबारों के साथ दि एशियन एज और देशबन्धु में अलग शीर्षक या बुनियाद के साथ है। आज इस खबर को लीड बनाया जाना महतवपूर्ण है क्योंकि द हिन्दू की लीड के अनुसार, बेमौसम की आंधी के कारण उत्तर प्रदेश में 111 लोगों की मौत हो गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड नहीं है लेकिन मरने वालों की संख्या 117 है।
इंडियन एक्सप्रेस ने लीड के जरिए बताया है कि सरकार विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए विदहोल्डिंग टैक्स कम करने पर विचार कर रही है। नवोदय टाइम्स ने राजधानी दिल्ली की खबर को लीड बनाया है। शीर्षक है, (दिल्ली में) ऑफिस का समय बदला, हफ्ते में दो दिन घर से काम, एक दिन नो कार डे। अमर उजाला की लीड सुप्रीम कोर्ट का यह कहना है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति समिति को स्वतंत्र होना ही नहीं, दिखना भी चाहिए। मुझे लगता है कि इस ज्ञान में ऐसा कुछ भी नहीं है कि इसे लीड बनाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है या कैसी बात कर रहा है यही रेखांकित करना उद्देश्य हो तो अलग बात है।
हालांकि पत्रकारिता का उद्देश्य ऐसा नहीं होना चाहिए और हो भी तो पहले उसे सरकार के कामों पर टिप्पणी करनी चाहिए, उसे रेखांकित करना चाहिए या फिर कुछ नई या खास बात को ही लीड बनाना चाहिए। आज उपर जिन खबरों की चर्चा कर चुका उनके अलावा नीट पेपर लीक का मामला और उससे संबंधित खुलासे ऐसे हैं जो सरकार के काम काज या व्यवस्था की पोल खोलते हैं, आम जनता को प्रभावित करते हैं इसलिए लीड बनाने लायक थे। यह खबर यहां सेकंड लीड है और जाहिर है सोशल मीडिया पर जो सूचनाएं हैं उन्हें यहां महत्व नहीं दिया गया है जबकि वे सही हों तो जरूर बताए और रेखांकित किए जाने चाहिए, गलत है तो बताया जाना चाहिए कि महान सरकार को बदनाम करने के लिए क्या सब फैलाया जा रहा है और अगर पता नहीं है कि सही हैं या गलत तो पता करके बताया जाना चाहिए कि गलत है, सही हो तो कोई बात ही नहीं है। लीड हो ही सकती थी।
बहरहाल जो है सो है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी काफी समय बाद आई है। इसलिए इसका महत्व है और इसीलिए, टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेंड लीड है। इस स्थिति में कलकाता के द टेलीग्राफ की लीड स्थानीय खबर है जो डबल इंजन वाले भारतीय राज्यों (खासकर मुस्लिम मोहल्लों में) डर का प्रतीक बन गए बुल़डोजर को पांच घंटे तक खड़ा रखने की है। अखबार ने लिखा है, ऐसा लगा जैसे इस्तेमाल के लिए नहीं था। जाहिर है, बंगाल में भाजपा की जीत वह जो है, जैसी है या जैसी भी है के बावजूद ऐसा होना या किया जाना भले स्थानीय मामला हो लेकिन अंतरराष्ट्रीय दिलचस्पी और सूचना का मुद्दा तो है ही। ऐसी हालत में चुनाव आयोग ने दिल्ली और देश के 16 राज्यो में तीसरे चरण का एसआईआर कराने का फैसला किया है तो यह भी अंतरारष्ट्रीय स्तर की खबर है।
एसआईआर जिन राज्यों में हो चुका है वहां भले कुछ नहीं होना है पर जो हुआ वह कानूनन सही भी हो तो उसके दुरुपयोग या उसके प्रभाव के बाद उसपर विचार किए जाने की जरूरत है लेकिन ऐसा कुछ किए बगैर आगे बढ़ते जाना – वीर तुम बढ़े चलो तो नहीं ही है। इसलिए, हिन्दुस्तान टाइम्स के साथ दि एशियन एज, नवोदय टाइम्स और देशबन्धु में यह खबर पहले पन्ने पर है।
कुल मिलाकर, स्थितियां ऐसी नहीं हैं कि सरकार की प्रशंसा की जाए या बचाव किया जा सके। उसमें नीट के प्रश्नपत्र लीक होना, सीबीआई की जांच के बावजूद एक साल छ़ोडकर फिर लीक हो जाना, 2024 में छोटे-मोटे लोगों के खिलाफ, कार्रवाई, परीक्षा रद्द नहीं किया जाना, 2026 में परीक्षा रद्द कर दिया जाना और यह खुलासा होना कि पिछली बार के एनटीए डीजी के खिलाफ कोई कार्रवाई तो नहीं ही हुई, उन्हें ईनाम मिला है। लीक में भाजपा नेता का नाम आना, भाजपा नेता का यह स्वीकार करना कि उसके परिवार के पांच लोग चुने गए थे और खुलासा कि 30 लाख रुपए में प्रश्नपत्र खरीदे गए थे और उन्हें ज्यादा पैसे लेकर बेचा गया होगा – एक अवैध धंधे का संकेत देता है। तय है कि पूरे सिस्टम में घुन लग चुका है। इसके साथ सीबीआई, अऱविन्द केजरीवाल, न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से संबंधित मामले, उनकी कार्रवाई, इसमें सीबीआई की भूमिका, सीबीआई के मुखिया की नियुक्ति का मामला, राहुल गांधी का विरोध और पिछले निदेशक को ही सेवा विस्तार दे दिया जाना, इस मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश का व्यावहारिक तौर पर सरकार के साथ रहना या साथ देना बताता है कि पूरा सिस्टम दीमक लगे 12 साल पुराने चौखट जैसा है। ऐसे में नौ में से किसी भी अखबार में पहले पन्ने पर इस मामले में खोजी रिपोर्ट नहीं होना बताता है कि मीडिया सरकार के बचाव में कितनी मेहनत कर रहा है।
इस बीच स्वर्ण कांता मिश्रा का केजरीवाल मामले से अलग होना लेकिन आपराधिक मानहानि की कार्रवाई शुरू करना खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे जैसा है। रिक्लूज नहीं करने का निर्णय और बाद के खुलासों के बाद सिर्फ रिक्लूज करना पर्याप्त नहीं होता उसमें अवमानना की कार्रवाई न्याय व्यवस्था की जबरदस्ती और मनमानी का उदाहरण हो सकता है। इसमें चुनाव आयोग के मुखिया पर सुप्रीम कोर्ट का रुख और आम आदमी पार्टी के खिलाफ सीबीआई का उपयोग बहुत कुछ कहता है। इसकी ईमानदार रिपोर्टिंग नहीं होना लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के ढह जाने का मामला लगता है।


