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सुख-दुख

जो सत्ता सवालों से डरती है, वह धीरे-धीरे नागरिकों से भी डरने लगती है!

Hindi quote about not answering questions, presented on a pink gradient background with a red logo at the top and a smiling woman at the bottom left.

ज्ञानेंद्र अवस्थी-

यही अंतर है लोकतंत्र और प्रबंधित लोकतांत्रिक तमाशे में। एक तरफ़ पत्रकारिता को सत्ता से जवाब मांगने का माध्यम माना जाता है।

दूसरी तरफ़ पत्रकारिता को “एक्सेस”, “मैनेजमेंट” और “इमेज कंट्रोल” में बदल दिया जाता है।

जब एक विदेशी पत्रकार यह कहती है कि “यदि सत्ता में बैठा व्यक्ति सवाल का जवाब नहीं देता, तो मैं बीच में रोककर स्पष्ट जवाब लेने की कोशिश करूंगी — यही मेरा काम है”, तो भारत के करोड़ों लोग इसे असाधारण साहस की तरह देखते हैं।

क्यों? क्योंकि यहाँ पत्रकारिता का सामान्यीकरण ही बदल दिया गया है।

यहाँ प्रेस कॉन्फ्रेंस का मतलब अक्सर पूर्व-निर्धारित प्रश्न, मित्रवत एंकर और बिना प्रतिप्रश्न वाला मंच बन चुका है।

सत्ता से कठिन सवाल पूछना “एंटी-नेशनल”, “एजेंडा”, “नकारात्मकता” या “विकास विरोध” घोषित कर दिया जाता है।

यही कारण है कि भारत लगातार प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नीचे फिसलता गया। यह केवल किसी विदेशी संस्था की रैंकिंग नहीं — बल्कि उस माहौल का प्रतिबिंब है जहाँ:

  • पत्रकारों पर मुकदमे होते हैं,
  • छापे पड़ते हैं,
  • चैनलों पर दबाव बनता है,
  • कॉरपोरेट स्वामित्व संपादकीय स्वतंत्रता को निगलता है,
  • और सत्ता से असहज सवाल पूछने वालों को “देशद्रोही” या “दलाल” बना दिया जाता है।

लोकतंत्र में प्रेस कॉन्फ्रेंस कोई कृपा नहीं होती। वह जवाबदेही की मूल प्रक्रिया होती है।

लेकिन जब सर्वोच्च सत्ता लगातार नियंत्रित संचार, एकतरफा भाषण और मैनेज्ड इंटरव्यू तक सीमित हो जाए, तो समझना चाहिए कि समस्या केवल मीडिया की नहीं — लोकतांत्रिक संस्कृति की है।

क्योंकि स्वतंत्र प्रेस का अर्थ केवल सरकार की प्रशंसा छापना नहीं होता। उसका अर्थ है सत्ता को असुविधाजनक प्रश्नों के सामने खड़ा करना।

और सच यही है — जो सत्ता सवालों से डरती है, वह धीरे-धीरे नागरिकों से भी डरने लगती है।

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सवाल बहुत कुत्ती चीज़ है, जो जितना डरता है, उसे उतना ही डराता है!

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