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सवाल बहुत कुत्ती चीज़ है, जो जितना डरता है, उसे उतना ही डराता है!

पत्रकार के सवाल पर विदेश सचिव सिबि जार्ज 17 मिनट भाषण के बदले ‘पूरब पश्चिम’ फिल्म का गाना “है प्रीत जहां की रीत सदा” बजा देते तो बेहतर होता!

राकेश कायस्थ-

सवाल बहुत कुत्ती चीज है! नॉर्वे में भारतीय प्रधानमंत्री के प्रेस कांफ्रेंस से भाग खड़े होने का वीडियो पूरी दुनिया भर में वायरल हो रहा है। नरेंद्र मोदी प्रेस के सामने ‘दर्शन देने’ की वैसी ही रस्म निभाने आये थे, जैसा आमतौर पर उनके किसी भी इवेंट में होता है। एक महिला पत्रकार ने पूछा “प्रधानमंत्री जी आप दुनिया के सबसे ज्यादा आज़ाद मीडिया के सवालों के जवाब क्यों नहीं देना चाहते?“

जवाब में जो हुआ उससे करन थापर वाला इंटरव्यू याद आया जहां मोदी ने पहले पानी मांगा था और फिर भर्राये गले से दोस्ती बनी रहे कहकर भागे थे। फर्क इतना था कि मोदी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे और अब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुखिया हैं। कम से कम सवाल से भागने के मामले में ही सही मोदी ने जो कंसिस्टेंसी दिखाई है, उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए।

लेकिन सवाल बहुत कुत्ती चीज़ है, जो जितना डरता है, उसे उतना ही डराता है। मोदी से पूछा गया सवाल विदेश मंत्रालय के अफसरों पर आकर चिपक गया। प्रेस कांफ्रेंस करने आये विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से एक पत्रकार ने पूछ लिया इतने खराब मानवाधिकार रिकॉर्ड को देखते हुए कोई भारत पर भरोसा किस तरह करे।

इसके जवाब में विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने 17 मिनट तक जो कहा उसके बदले वो मनोज कुमार की फिल्म पूरब पश्चिम का गाना “ है प्रीत जहां की रीत सदा “ बजा देते तो ज्यादा बेहतर होता। सुनकर अच्छा लगा कि जॉर्ज ने कहा कि भारतीय संविधान महान हैं और हम गाँधी के देश के लोग हैं। अगर वे चाहते तो ये भी कह सकते थे कि हम पर भरोसा इसलिए कीजिये क्योंकि भारत में अब दीन दयाल जी का एकात्म मानवतावाद लागू हो चुका है और इसी के तहत यूपी के संत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ “त्वरित मोक्ष योजना” चला रहे हैं।

विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज के बयान का भाव कुछ वैसा ही है, जैसा अडानी को बचाने से जुड़े सवाल पर अमेरिका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का था। उनसे पूछा गया था कि क्या आपने अडानी का मामला रफा-दफा करवाने की बात अमेरिकी राष्ट्रपति से की है। जवाब में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि भारत एक महान देश है और हमारी नीति वसुधैव कुटुंबकम की है। जब दो देशों के सर्वोच्च नेता आपस में मिलते हैं तो निजी मामलों पर चर्चा नहीं होती है।

अब ताजा खबर ये है कि अडानी के खिलाफ अमेरिका में भ्रष्टाचार के सारे आरोप वापस ले लिये गये हैं। बदले में भारत के राष्ट्र सेठ ने अमेरिका के विकास के लिए वहां 10 अरब डॉलर के निवेश का एलान किया है। प्रधानमंत्री जी देश से अपील कर रहे हैं कि विदेश मत जाइये क्योंकि डॉलर खर्च होता है और देश की आर्थिक स्थिति खराब है। पांच किलो राशन मुफ्त में पाने वाली जनता करतल ध्वनि से प्रधानमंत्री की अपील का स्वागत कर रही है और राष्ट्र सेठ मजबूत रुपया नहीं बल्कि कमज़ोर डॉलर में दस अरब का दान अमेरिकी अर्थव्यस्था को देने जा रहे हैं।

सवाल बहुत कुत्ती चीज हैं। यहां से नहीं तो वहां से मतलब घूम फिरकर वापस आ ही जाते हैं।


पुष्प रंजन-

सिबी जॉर्ज को ग़ुस्सा क्यों आता है? अरे भाई, इतना ग़ुस्सा ठीक नहीं। थोड़ा कूटनीतिक शालीनता का ध्यान रखिये।

Split-screen image: left shows a young woman speaking into a microphone; right shows a man in a suit speaking at a podium with a flag in the background.

सिबी जॉर्ज अभी भारतीय विदेश मंत्रालय में सेक्रेटरी (वेस्ट) के तौर पर काम कर रहे हैं। वे यूरोप, पश्चिम एशिया और कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के संबंधों की देखरेख करते हैं। 1993 बैच के इंडियन फॉरेन सर्विस के अधिकारी जॉर्ज, इससे पहले जापान, स्विट्जरलैंड, कुवैत, होली सी, लिश्टेनटाइन और मार्शल आइलैंड्स में भारत के राजदूत के तौर पर काम कर चुके हैं।

इतना बेहतरीन कूटनीतिक करियर वाला शख़्स, यदि किसी पत्रकार का जवाब ताव में आकर लठमार तरीके से दे, वह तमीज़ के दायरे में नहीं आता. 1985 तक जेएनयू से निकले, जो भी मेरे मित्र भारतीय विदेश सेवा में रहे, वो भी शायद सिवि जॉर्ज के लहज़े को नापसंद करें।

मुझे पदासीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, और उनकी तत्कालीन समकक्ष चांसलर आंगेला मैर्केल का हनोवर में साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस याद है. तय हो गया था, 10 सवाल भारतीय मीडियाकर्मी आंगेला मैर्केल से पूछेंगे, और उतने ही सवाल जर्मन मीडिया वाले डॉ. मनमोहन सिंह से पूछेंगे। उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में एन. राम, आरती जेरथ भी थीं. दोनों तरफ के पत्रकारों ने मीठे और तीखे, दोनों तरह के सवाल पूछे। तब जर्मन न्यूक्लियर पनडुब्बी का सौदा होना था.

मगर, बात यह है, पीएम मोदी को यदि किसी पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं देना है, तो उसकी स्पष्ट जानकारी विदेश मंत्रालय अपने अतिथि देश की मीडिया को क्यों नहीं पहले से दे देता? आप डिक्लेयर कर दें. फिर भी कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती करे, तो वहां के शासन की ज़िम्मेदारी।

मोदी के दौरे का ढब बंद मुठ्ठी की तरह है. बस, वो इंडियन कम्युनिटी के सामने बिंदास हो जाते हैं, ‘मोदी-मोदी’ के नारे पर बिहँसते हैं. आत्ममुग्ध होते हैं. उन्हें प्रवासी भारतीयों की भीड़, ढोल-नगाड़े, गुड़ी-गुड़ी बातें अच्छी लगती हैं.

सोमवार को नार्वे में PM नरेंद्र मोदी और उनके नॉर्वेजियन समकक्ष जोनास गहर स्टोर संयुक्त बयान मीडिया के समक्ष जारी कर रहे थे. उनकी ब्रीफिंग एक ऐसे प्रारूप में हुई थी, जिसमें प्रश्न-उत्तर सत्र शामिल नहीं था. तभी कमरे में एक आवाज़ गूंजी: “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे आज़ाद प्रेस (मीडिया) से कुछ सवाल क्यों नहीं लेते?”

यह आवाज़ Helle Lyng (हेले ल्यिंग) की थी, जो स्थानीय अखबार ‘Dagsvisen’ की पत्रकार हैं, और इस दौरे को कवर करने वाले मीडिया दल का हिस्सा थीं। बजाय, जवाब देने के पीएम मोदी उसे अनसुना कर आगे बढ़ गए. बाहर निकलते समय न तो किसी नेता ने अपनी चाल धीमी की, और न ही कोई जवाब दिया। वह लिफ्ट तक उनके पीछे-पीछे गईं, जब तक कि लिफ्ट के दरवाज़े बंद नहीं हो गए।

यह मामला मीडिया रूम से निकलकर ऑनलाइन दुनिया में वायरल हो गया। इसके बाद एक तनावपूर्ण प्रेस ब्रीफिंग हुई, जिसके समानांतर सोशल मीडिया पर ट्रोल वॉर छिड़ गया, और साथ ही भारत में भी राजनीतिक बयानबाजी का दौर शुरू हो गया।

फिर शुरू हुआ X पर सवाल जवाब। ‘हम आप पर भरोसा क्यों करें?’ के जवाब में मिला इतिहास का पाठ. नॉर्वे में भारतीय दूतावास ने, लिंग की X पोस्ट का जवाब देते हुए, उन्हें उसी शाम बाद में एक न्यूज़ ब्रीफिंग में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने लिखा, “आपका स्वागत है, आप आएं और अपने सवाल पूछें।” सिबी जॉर्ज एकबार फिर अखाड़े में उतर आये.

हेले ल्यिंग ने कमरे में मौजूद भारतीय अधिकारियों से सीधे सवाल पूछे; यह कमरा अब उसी बहस के लिए एक दूसरा मंच बन गया था। उनके वही सवाल थे, “हम आप पर भरोसा क्यों करें?” और “क्या आप वादा कर सकते हैं कि आप अपने देश में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकेंगे?” उन्होंने इन सवालों के बारे में और ज़्यादा विस्तार से नहीं पूछा।

MEA के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज चाहते, तो आराम से जवाब दे सकते थे। लेकिन, वो अपना हाई ब्लडप्रेशर बढ़ा चुके थे. तमतमाये हुए सिबी जॉर्ज ने कहा, “देश किसे कहते हैं? आज के समय में देश के चार तत्व होते हैं।” “पहला, जनसंख्या; दूसरा, सरकार; तीसरा, संप्रभुता; और चौथा, क्षेत्र। और हमें इस बात पर गर्व है कि हम 5,000 साल पुरानी सभ्यता वाले देश हैं,” उन्होंने 16 मिनट तक अनहद चले अपने जवाब में बहुत कुछ अनावश्यक कहा, जिसकी ज़रूरत नहीं थी।

सिबी जॉर्ज ने भारत के कोविड से निपटने के तरीके को वैश्विक विश्वसनीयता के सबूत के तौर पर पेश किया। “हम किसी गुफा में नहीं छिपे, हमने यह नहीं कहा कि हम दुनिया को नहीं बचाएँगे। हम दुनिया को मदद का हाथ बढ़ाने के लिए आगे आए,” उन्होंने कहा, और इस बात की ओर इशारा किया कि भारत ने लगभग 100 देशों को वैक्सीन सप्लाई की है।

उन्होंने मानव सभ्यता में भारत के योगदान का भी ज़िक्र किया, जिसमें शून्य, शतरंज और योग की खोज, और भारत का कूटनीतिक रिकॉर्ड शामिल है। जॉर्ज ने बताया कि भारत ने 2023 में G20 शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की थी, जिससे अफ्रीकी संघ को G20 की पूर्ण सदस्यता मिलने में मदद मिली; और ‘वॉयस ऑफ़ ग्लोबल साउथ’ शिखर सम्मेलन आयोजित किए, जिनमें 125 देश एक साथ आए। ओस्लो में, मानवाधिकारों से जुड़े सवाल पर, जॉर्ज ने भारत के संवैधानिक ढाँचे का हवाला दिया और बताया कि पिछले चुनावों में लगभग एक अरब मतदाताओं ने हिस्सा लिया था और यह चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ था।

इस दौरे पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। नीदरलैंड्स में यात्रा के पहले चरण के दौरान ही, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा प्रेस कार्यक्रमों में सवालों के जवाब न देने, और भारत में मानवाधिकारों की स्थिति के बारे में सवालों का सामना करना पड़ा था। वहाँ भी, सिबि जॉर्ज ने लगभग उन्हीं तर्कों का इस्तेमाल किया था। नॉर्वे इस मामले में दूसरा पड़ाव बना। हो सकता है, कुछ लोगों को सिवि जॉर्ज का यह कड़क और लठमार अंदाज़े बयाँ पसंद आये. लेकिन, यह कूटनीतिक शालीनता के दायरे से बाहर का व्यवहार है.

Dagsavisen ओस्लो, (नॉर्वे) से प्रकाशित होने वाला एक दैनिक समाचार पत्र है। यह पहले नॉर्वेजियन लेबर पार्टी का मुखपत्र था, लेकिन 1975 से 1999 के बीच समय के साथ इसके संबंध शिथिल होते गए। इसके कई नाम रहे हैं, और 1923 से 1997 तक इसे Arbeiderbladet (आर्बाइडरब्लाडेट) कहा जाता था। Eirik Hoff Lysholm इसके प्रधान संपादक हैं। पता नहीं यह अखबार सिवि जॉर्ज के इस तरह के व्यवहार को किस नुक्ते-नज़र से देखता है.

Dagsavisen की पत्रकार हेले ल्यिंग अब हिट हो चुकी है. उसने राहुल गांधी का इंटरव्यू के लिए मैसेज भेजा है. वो भला क्यों मना करेंगे? राहुल गांधी की अपनी चॉइस होती है, किस पत्रकार से हाथ मिलाएं, किससे बगलगीर होकर फोटऑप दें, और किससे इंटरव्यू के लिए राज़ी हों. लेकिन, सुप्रिया श्रीनेत और जयराम रमेश को ध्यान रखना होगा, यूरोपीय-नॉर्डिक मीडिया राहुल गांधी से भी तीखे सवाल पूछ सकता है. उनकी ट्रेनिंग थोड़ी अलग होती है.

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