सुशोभित-
“ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदम्”
यह ईशावास्योपनिषद् का लोक-विख्यात शान्तिपाठ है। यह इतना प्रसिद्ध है कि अब यह इस उपनिषद् के 18 मंत्रों से भी अधिक लोकश्रुत हो गया है। जबकि आचार्य शंकर ने इस शान्तिपाठ पर भाष्य नहीं किया है। सम्बंध-भाष्य लिखकर उपनिषद् के प्रथम मंत्र की ओर बढ़ गए हैं। किन्तु ईशावास्योपनिषद् पर चर्चा करने वाला ऐसा कोई परवर्ती विद्वान नहीं है, जो इस शान्तिपाठ पर ठिठका न हो, इसकी विस्तार से विवेचना न की हो। ईशावास्योपनिषद् इसी से आरम्भ होकर इसी पर समाप्त हो जाता है। यों आप देखें तो पाएंगे कि शुक्ल-यजुर्वेद के 19 उपनिषदों में से अधिकतर का यही शान्तिपाठ है- ईशावास्य के अलावा बृहदारण्यक, निरालम्ब, जाबाल, परमहंस आदि उपनिषद् इसी से आरम्भ होते हैं।
“ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदम्” : इसमें ‘पूर्ण’ के साथ जो ‘अद:’ और ‘इदम्’ संयुक्त हैं, वे ‘वह’ और ‘यह’ के अर्थ को व्यंजित करते हैं। ‘पूर्णमद:’ यानी “वह पूर्ण है”, ‘पूर्णमिदम्’ यानी “यह भी पूर्ण है।” इन ‘वह’ और ‘यह’ शब्दों का क्या अर्थ करें? शंकर ने तो इस पर मौन साधा, किन्तु अनेक विद्वानों को इस शान्तिपाठ के ‘अद:’ और ‘इदम्’ पर कोई संशय नहीं है। ‘वह’ की व्याख्या वे ‘ब्रह्म’ की तरह करते हैं, ‘यह’ की व्याख्या ‘संसार’ की तरह। प्रकारान्तर से ‘वह’ की व्याख्या वे ‘परब्रह्म’ की तरह करते हैं, ‘यह’ की व्याख्या ‘कार्यब्रह्म’ की तरह। परब्रह्म ‘कारणब्रह्म’ भी कहलाया है, कार्यब्रह्म ‘हिरण्यगर्भ’ भी कहलाया है। ‘यह’ सोपाधिक है, ‘वह’ निरुपाधिक है। ये सब उपनिषदों के पारिभाषिक शब्द हैं और गूढ़ार्थों को प्रकट करने वाले हैं।
ईशावास्योपनिषद् का यह विलक्षण और तेजस्वी शान्तिपाठ अपनी पूर्णता में इस प्रकार है :
“ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदम् पूर्णात्पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।”
इसका अर्थ है :
“वह पूर्ण है। यह भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है। पूर्ण का पूर्णत्व अपने में लीन करके भी पूर्ण का पूर्णत्व पूर्ण ही रहेगा।”
यह सामान्य बुद्धि को झुठलाने वाला कथन है। सामान्य बुद्धि तो यही कहती है कि अगर किसी वस्तु में कुछ जोड़ दें तो जोड़ा हुआ मान उसमें बढ़ जाएगा और किसी वस्तु से कुछ घटा दें तो घटाया हुआ मान उसमें से घट जाएगा। आर्किमिडीज़ का सिद्धांत यही था। अरस्तू और यूक्लिड की तर्कबुद्धि भी इसी के अनुरूप एकरैखिक थी। किन्तु वे पदार्थ के सम्बंध में सही थे। उपनिषद् पदार्थ की सत्ता का विवेचन नहीं करते और जिसका विवेचन करते हैं, उसकी अभिव्यंजना के लिए उन्हें ऐसे ही विरोधाभासों का सामंजस्य अपनी भाषा में करना होता है।
स्वामी आत्मानन्द ने ईशावास्योपनिषद् के अपने भाष्य में इस शान्तिपाठ की तुलना गणित के अनन्तता के सिद्धांत से की है। गणित में दो अनन्त की कल्पना नहीं की जाती, क्योंकि अगर दो अनन्त हुए तो वो एक-दूसरे के विस्तार को बाधित करेंगे, सीमाबद्ध करेंगे। यह अनन्त की अवधारणा को झुठलाने वाली कल्पना होगी। इसलिए एक ही अनन्त होगा, जिसमें से सृष्टि प्रकट होगी और जिसमें सृष्टि विलीन हो जावेगी, किन्तु इससे उसमें कुछ घटेगा-बढ़ेगा नहीं। विज्ञान भी मानता है कि ऊर्जा और द्रव्यमान को न बनाया जा सकता है, न नष्ट किया जा सकता है, केवल उसका रूप बदलता है।
ईशावास्योपनिषद् का यह शान्तिपाठ संकेत करता है कि ऊपर से चाहे जितना अपूर्ण, अशुद्ध, अनित्य दिखलाई देता हो, पूर्ण में से प्रकट होने के कारण यह संसार भी पूर्ण ही है। सामान्यतया, ‘पूर्णमद:’ की घोषणा तो अध्यात्म में सरल मालूम होती है कि “वह पूर्ण है”, किन्तु ‘पूर्णमिदम्’ की घोषणा वास्तविक क्रांति करने वाली है, कि “यह भी पूर्ण है”। यह द्वैतबुद्धि को नष्ट करने वाली है, जो कि उपनिषदों का समस्त-प्रयोजन है।
आगे अपने पहले ही मंत्र में ईशावास्योपनिषद् ने घोषणा कर दी है कि यह समस्त स्थावर-जंगम संसार ईश्वर के द्वारा आच्छादनीय है और ईश्वर की व्याख्या आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में ‘प्रत्यगात्मा’ के अर्थ में की है, जिससे चेतना का यह समस्त औपनिषदिक् विज्ञान अपने आशयों में पूर्ण, पुष्ट और प्रमाणभूत हो जाता है।
“पूर्ण में से अपूर्ण प्रकट नहीं हो सकता, पूर्ण से पूर्ण के निकल जाने के बाद भी वह पूर्ण ही रहता है घटता नहीं है, पूर्ण में पूर्ण के फिर आ मिलने के बाद भी वह पूर्ण ही रहता है बढ़ता नहीं है”- उपनिषदों की यह महान और क्रांतदृष्टा उद्घोषणा अध्यात्म-पथिक का सबसे मूल्यवान पाथेय है, इसमें संशय नहीं!



