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इंडियन एक्सप्रेस हिंदी में सौरभ द्विवेदी द लल्लनटॉप के विलोम नज़र आ रहे हैं!

Quadruple video frames of four interviewees: man in blue shirt, woman with long hair, woman in purple embroidered shirt, man with glasses.

विनीत कुमार-

एक्सप्रेस हिन्दी का यदि ये मॉडल चल निकला तो…

दि इंडियन एक्सप्रेस के नए डिजिटल वेंचर एक्सप्रेस हिन्दी को लगातार देख रहा हूं. इसमें सौरभ द्विवेदी द लल्लनटॉप के विलोम नज़र आ रहे हैं. लीनन-ब्लॉक प्रिंट शर्ट में अपने पेशे के प्रति कहीं ज़्यादा पेशेवर और गंभीर नज़र आ रहे हैं. बाक़ी के मीडियाकर्मियों की प्रस्तुति भी पुराने दौर के दूरदर्शन की तरह है जिसमें विषय की प्रतिबद्धता से अलग भाषाई स्तर पर एक तरह की तटस्थता दिखाई देती है. वहीं प्लेटफॉर्म की पूरी प्रस्तुति में बीबीसी के पुराने स्कूल की पत्रकारिता को आज़माने की कोशिश है.

एक दर्शक के तौर पर हमारे लिए एक्सप्रेस हिन्दी के इस रूप को देखना दिलचस्प है कि जिस अंदाज़ को ख़ुद दूरदर्शन ने सालों पहले ठिकाने लगा दिया और जिस क्लिक-बेट से आक्रांत बीबीसी अपनी ही थाती को संभाल पाने में भरोसा और आत्मविश्वास खोता जा रहा हो, ऐसे दौर में एक्सप्रेस हिन्दी ने इस पैटर्न को अपनाया है. ये मीडिया अध्येता के लिए शोध का एक ज़रूरी विषय बनने जा रहा है.

अपने शुरुआती दौर से ही सरकारी भोंपू नाम से बदनाम होने के बावज़ूद दूरदर्शन की सबसे लोकप्रिय ख़ास बात रही है कि इसने कुछ वर्ष पहले तक पत्रकारिता और मनोरंजन के नाम पर शोर पैदा करने का काम नहीं किया. जब-जब इस बात की आशंका हुई, इसे लेकर एक के बाद एक कमेटी का गठन किया गया और रिपोर्ट में सुझाव प्रस्तावित किए गए. दूसरी तरफ बीबीसी ने अपनी पूरी प्रस्तुति में अपने श्राताओं-दर्शकों को लंबे समय तक एक नागरिक की समझदारी के साथ मीडिया को देखने-समझने की सलाहियत पैदा करने का काम किया, अब चूंकि वो ख़ुद भी मौज़ूदा दौर के पैटर्न से आक्रांत है तो अपनी उन बेहतर चीज़ों को बरक़रार रखने में भरोसा नहीं रख पा रहा जो उसे बाक़ी के कारोबारी मीडिया संस्थानों से अलग करते आए हैं. ख़ैर,

फ़िलहाल एक्सप्रेस हिन्दी की पूरी प्रस्तुति, भाषाई अंदाज, स्क्रीन पर मीडियाकर्मियों की मौज़ूदगी और भाव-भंगिमा..ये सब ठिकाने लगाए जा चुके अंदाज़ को वापस से आज़माने की दिशा में है. आप वीडियो देखना शुरु करते ही ये अंदाज़ा नहीं लगा लेंगे कि ये तो सत्ता के आगे बिछ जा रहे हैं, ये तो सत्ता के आगे हुक्का-पानी लेकर तैनात हो जा रहे हैं. आप थोड़ी देर ठहरकर सुनना-देखना चाहेंगे. इन वीडियो में डर, भय और बदहवास जीवन के बीच से रिवन्यू पैदा करने का मॉडल नहीं तैयार हो रहा और न ही सत्ता के जनसंपर्क विभाग की एक्सटेंशन बनकर काम करने शातिर कोशिश ही. अभी तक की सामग्री में अपने दर्शकों के प्रति एक ख़ास तरह की नैतिक ज़िम्मेदारी का एहसास दिखलाई पड़ता है.

मुझे नहीं पता कि एक्सप्रेस हिन्दी का ये मॉडल कितने समय तक चलेगा और कब विचलन आ जाएगा लेकिन यदि यह चल निकला तो डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बहुत कुछ बदलेगा. सबसे पहले तो एक ऐसी भाषा की तरफ बाक़ी के प्लेटफॉर्म मुड़ेंगे तो असहमति और आक्रामकता, सहमति और चापलूसी, प्रतिरोध और भाषाई हिंसा के फर्क़ को समझ सकेंगे. दूसरा कि पत्रकारिता जो देखते-देखते “कॉस्ट्यूम जर्नलिज़्म” की तरफ जाकर बुरी तरह धंस गयी है, वो सिलसिला थोड़ा थमेगा.

मीडियाकर्मियों को इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि एक तरफ वो जिस हिंसक भाषा का इस्तेमाल करते हैं और दूसरी तरफ अपनी पैकेज को अलग-अलग प्रॉप्स से शो ऑफ करते हैं, इन सबका मीडिया की पढ़ाई कर रहे छात्रों पर कैसा असर पड़ता है! एक बार यदि वो इस असर के बीच खड़े होकर देखें-सोचें तो अफ़सोस और शर्म से माथा झुक जाय कि मैं अपने पेशे के साथ क्या कर रहा हूं!

मैं दिल से चाहता हूं कि एक्सप्रेस हिन्दी का ये मॉडल सफल हो और ये किसी मॉडल पर टिका रहे, इससे एक पेशे के तौर पर, डिजिटल मीडिया के भीतर बहुत कुछ बदलेगा, बेहतर होगा.

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