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नहीं रहे बशीर बद्र साहब, जनाजे में बस बीस 20 लोग शामिल हुए!

Black-and-white head-and-shoulders portrait of a man with glasses and medium-length hair, looking at the camera.

आधुनिक उर्दू ग़ज़ल को आम आदमी के दिलों तक पहुंचाने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र का 28 मई 2026 को भोपाल में निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे। अपनी सहज, सरल और दिल को छू लेने वाली शायरी के कारण बशीर बद्र उर्दू अदब की दुनिया में एक अलग पहचान रखते थे। साहित्य और कला के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया था।

गांव से लेकर देश-दुनिया तक का सफर

बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले के बुकिया गांव (हंसवार के निकट) में हुआ था। उनका वास्तविक नाम सैयद मुहम्मद बशीर था। उनके पिता सैयद मुहम्मद नज़ीर पुलिस विभाग में कार्यरत थे, जिसके कारण परिवार को विभिन्न शहरों में रहना पड़ा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कानपुर और अलीगढ़ में हुई।

उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से उर्दू साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। बाद में मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दीं।

शायरी की दुनिया में अलग पहचान

बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी थी। उन्होंने ग़ज़ल को कठिन और क्लिष्ट भाषा के दायरे से निकालकर आम बोलचाल की भाषा में ढाला। प्रेम, विरह, अकेलापन, रिश्तों की गर्माहट और जिंदगी के छोटे-छोटे अनुभव उनकी रचनाओं का प्रमुख विषय रहे।

उनकी ग़ज़लों में भावनाओं की गहराई के साथ-साथ ऐसी सहजता मिलती है, जिसने उन्हें आम पाठकों और श्रोताओं के बीच बेहद लोकप्रिय बनाया।

प्रमुख कृतियां

बशीर बद्र की कई पुस्तकें और ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें प्रमुख हैं—

  • आमद
  • आहट
  • कुल्लियात-ए-बशीर बद्र
  • उजाले अपनी यादों के
  • इमकान

सम्मान और पुरस्कार

उर्दू साहित्य में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। प्रमुख सम्मानों में शामिल हैं—

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1999)
  • पद्मश्री (1999)
  • उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी सम्मान
  • मीर तकी मीर पुरस्कार

मेरठ दंगों का दर्द और अंतिम वर्ष

वर्ष 1987 के मेरठ दंगों में बशीर बद्र ने अपना घर और जीवनभर की जमा पूंजी खो दी थी। इस त्रासदी ने उन्हें गहरे मानसिक आघात पहुंचाया। इसके बाद उन्होंने भोपाल को अपना स्थायी निवास बनाया।

जीवन के अंतिम वर्षों में वह डिमेंशिया (अल्जाइमर) जैसी बीमारी से जूझ रहे थे। लंबी बीमारी के बाद 28 मई 2026 को भोपाल में उन्होंने अंतिम सांस ली।

शेर जो हमेशा याद रहेंगे

बशीर बद्र के कई शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं और आने वाली पीढ़ियों तक उनकी पहचान बने रहेंगे—

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।”

“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।”

“दुश्मनी लाख सही, खत्म न कीजिए ताल्लुक,
कभी-कभी किसी शख्स को पुकारते भी रहिए।”

बशीर बद्र के निधन के साथ उर्दू शायरी का एक ऐसा दौर समाप्त हुआ है, जिसने भाषा की दीवारों को तोड़कर ग़ज़ल को जन-जन तक पहुंचाया। उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा और संवेदना का स्रोत बनी रहेगी।


मुकेश कुमार-

कल मशहूर शायर बशीर बद्र की अंतिम यात्रा में लगभग 20 लोग शामिल हुए। सोचिए जिसके शेर लाखों लोगों की ज़ुबान पर रहते हैं, उन्हें ऐसी गुमनाम सी विदाई दे दी गई।

Group of men wearing traditional white garments and skullcaps standing with their backs to the camera at night outside.

सोचिए, भोपाल साहित्य और संस्कृति का गढ़ माना जाता है। पता नहीं कितने, लेखक, कवि, शायर, पत्रकार, कलाकार भोपाल में हैं, मगर उनमें से कितनों को लगा कि इस मौक़े पर उन्हें वहाँ होना चाहिए था और कितने पहुँचे?

ये भी सोचिए कि भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी है। विभिन्न राजनीतिक दलों के तमाम लोग वहाँ रहते हैं। मान लेते हैं कि बीजेपी को मुसलमानों से एलर्जी है, नफ़रत है और वह उनके नायकों को भी पसंद नहीं करती, मगर बाक़ी दल क्या कहेंगे?

दरअसल, बशीर साहब पिछले कई सालों से डिमेंशिया से पीड़ित थे। इस वज़ह से भी वे अलगाव का शिकार हो गए थे। लोगों ने आना-जाना लगभग बंद कर दिया था, मगर ऐसा भी नहीं था कि वे हम सबकी स्मृतियों में भी नहीं थे। वे थे, मगर वे किसी के काम के नहीं रह गए थे, इसलिए लोगों को लगा कि अब क्या फ़ायदा।

यानी बशीर सही कहते थे- ये मतलबों के सलाम थे…… आने वाले दिनों में हमें बहुत सी ऐसी पोस्ट देखने को मिलेंगी जिनमें बशीर साहब से अपनी नज़दीकियाँ दिखाई जाएंगी, मगर ये आत्म प्रचार से ज़्यादा कुछ नहीं होंगी। उनमें वे बशीर साहब को नहीं अपने को प्रस्तुत करेंगे


किसी ज़माने में भोपाल में अटल बिहारी बाजपेयी फ़ैन क्लब बना था। बशीर बद्र साहब और मंज़र भोपाल साहब दोनों इसमें शामिल हुए थे।
मैं तब मध्यप्रदेश में ही था। ग्वालियर के सिद्ध कवि और समझौताहीन प्रगतिशील आदरणीय प्रकाश दीक्षित से मैंने कहा, बताइए बशीर साहब को इसकी क्या ज़रूरत थी?
प्रकाश जी ने हँसते हुए कहा- शायर हर काम ज़रूरत से नहीं करता, कुछ बस कर देता है। समाज को शायर की ऐसी नादानियाँ नज़रअंदाज़ कर देनी चाहिए।
देखिए आज उनके जाने के बाद लोगों को सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके अशआर याद आ रहे हैं। उनका लिखा ही उन्हें ज़िंदा रखेगा चाँद तारों के रहने तक।
बशीर बद्र साहब के जनाज़े में बीस लोग थे। क्या फ़र्क़ पड़ता है? बीस जाएँ या बीस हज़ार। मरने वाला अपनी लाफ़ानी सल्तनत का सुल्तान था, रहेगा।
कल मैं मरूँ तो मेरी आख़िरत में शायद इससे भी कम लोग आयें, मैं तो चाहूँगा कि पता ही तब चले सबको जब सब हो चुका हो।
लिखने वाले को कोई लिखे के लिए याद रखे, बहुत है। अक्सर वह ख़ुद भी इससे ज़्यादा उम्मीद नहीं पालता। -अशोक कुमार पांडेय


सय्यद आबिद हुसैन-

कल से सोशल मीडिया पर योजनाबद्ध तरीक़े से यह बात फैलाई जा रही है कि मरहूम पद्मश्री बशीर बद्र साहब के जनाज़े में केवल 20 लोग शामिल हुए। मैं वहाँ मौजूद था इसलिए ज़िम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूँ कि यह दावा सही नहीं है। जनाज़े में लगभग 200 से 250 लोग मौजूद थे। और कब्रिस्तान पहुंचने तक लोगों की तादाद इससे भी ज्यादा बढ़ चुकी थी

हाँ, यह बात अपनी जगह सही है कि बशीर बद्र साहब जैसी बड़ी शख़्सियत के जनाज़े में इससे कहीं ज़्यादा लोग होने चाहिए थे। यह अफ़सोस की बात हो सकती है, लेकिन झूठे आँकड़े फैलाकर पूरे शहर को बदनाम करना भी सही नहीं है।

बहुत से लोग ईद की वजह से शहर से बाहर थे, कई लोगों को ख़बर देर से मिली, और कई लोग त्योहार की व्यस्तताओं में सोशल मीडिया तक नहीं देख पाए। इन बातों को नज़रअंदाज़ करके यह कहना कि वहाँ सिर्फ़ 20 लोग थे, सरासर ग़लत है।

और यह बात भी समझनी चाहिए कि वहाँ केवल उर्दू अदबी हल्क़े के लोग ही नहीं थे। प्रशासन के अधिकारी मौजूद थे, SDM साहब मौजूद थे, पुलिस अधिकारी मौजूद थे, मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी का स्टाफ़ मौजूद था, साहित्यकार, शायर, अहबाब और चाहने वाले भी मौजूद थे।

अगर कोई जानबूझकर ग़लत तस्वीर पेश कर रहा है, तो यह सिर्फ़ किसी एक इदारे या हुकूमत को नहीं, बल्कि पूरे भोपाल की तहज़ीबी पहचान को बदनाम करने की कोशिश है।

जो लोग वहाँ मौजूद थे, उन्हें सच सामने लाना चाहिए। ख़ामोशी कभी-कभी ग़लत बात को मज़बूत कर देती है।

Crowd of men in white traditional clothing gathering outdoors at night near a river with a illuminated mosque in the background.
Nighttime funeral procession with many men in white garments carrying a white coffin along a riverside street.
Nighttime funeral procession with men carrying a white-shrouded coffin through a crowd; a lit mosque in the background.

तथ्य तो यही है।अभी भोपाल की आत्मा मरी नहीं है। सैकड़ों लोग बशीर साब को अंतिम विदाई देने गए थे। यदि दीवाली के दिन कोई ऊपर चला जाए तो लोग घर की पूजा नहीं छोड़ते ।उस दिन तो ईद थी ।

-राजेश बादल

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